लोक प्रशासन के विभिन्न दृष्टिकोण या उपागम - Different Approaches to Public Administration
लोक प्रशासन के विभिन्न दृष्टिकोण या उपागम - Different Approaches to Public Administration
लोक प्रशासन के विभिन्न दृष्टिकोण या उपागम
लोक प्रशासन का अध्ययन किस दृष्टि से किया जाए, इसे लेकर भी विद्वानों में मतभेद हैं। अलग अलग विद्वान इसके अध्ययन को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं। जिस कारण लोक प्रशासन के अध्ययन के संबंध में अलग-अलग दृष्टिकोण या उपागम सामने आये। इसमें इन उपागमों/दृष्टिकोणों को परम्परागत और आधुनिक दो वर्गों बांटा गया परम्परागत तथा आधुनिक दृष्टिकोण, परम्परागत दृष्टिकोण इसके अन्तर्गत निम्नलिखित दृष्टिकोणों का अध्ययन किया जायेगा।
1. दार्शनिक दृष्टिकोण
लोक प्रशासन के अध्ययन का यह सबसे प्राचीन उपागम है। यह उपागम इस बात पर बल देता है कि लोक प्रशासन कैसा होना चाहिए? महाभारत का 'शांतिपर्व' प्लेटो की रचना 'रिपब्लिक' हॉब्स की रचना 'लेवियाथन' तथा जॉन लॉक की रचना 'ट्रीटाइज ऑफ सिविल गवर्मेन्ट' में इस दृष्टिकोण की झलक मिलती है।
आधुनिक समय में भी लोक प्रशासन को एक दर्शन के रूप में देखने की आवश्यकता पर अनेक विद्वानों ने बल दिया है। जिसमें मार्शल डिमॉक, क्रिस्टोफर हॉगकिन्सन, चेस्टर बर्नाड, हर्बट साइमन आदि नाम हैं। इन विद्वानों का मानना है कि राज्य की नीतियों को सत्य, निष्ठा एवं कुशलता पूर्वक लागू किया जाना चाहिए। प्रशासन को उन सभी तत्वों की ओर ध्यान देना चाहिए, जिनका समावेश प्रशासकीय क्रिया में होता है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, प्रशासन का संबंध लक्ष्य और साधन दोनों से है। इन दोनों का कुशलतापूर्वक समन्वय ही प्रशासन की उत्कृष्टता की कसौटी है। अर्थात् लोक प्रशासन के दर्शन का प्रायोजन हमारे लक्ष्यों को परिभाषित करना तथा उनकी प्राप्ति के लिए समुचित साधनों की खोज करना है।
लोक प्रशासन का कार्य हमारे सामाजिक और भौतिक पर्यावरण के अविवेकपूर्ण तथ्यों पर मर्यादा लगाकर उन्हें नियंत्रित करना होता है।
दार्शनिक उपागम का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है और यह अपने में सभी प्रकार की प्रशासकीय क्रियाओं को समेट लेता है।
दार्शनिक उपागम की आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि इसमें केवल
लोक प्रशासन के आदर्श स्वरूप का चित्रण किया गया है, अर्थात प्रशासन कैसा होना चाहिए।
लेकिन इससे हमें वास्तविक प्रशासकीय स्थिति का ज्ञान नहीं हो सकता।
2. वैधानिक दृष्टिकोण
इस दृष्टिकोण की जड़ यूरोप की परम्परा में मिलती है। यह एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है। यूरोप में लोक प्रशासन का विकास कानून के अंतर्गत हुआ तथा वहाँ वैधानिक दृष्टि से ही इस विषय के अध्ययन पर बल दिया जाता है। इस उपागम का विकास उस समय हुआ था जब राज्य के कार्य अत्यन्त सरल तथा क्षेत्र अत्यन्त सीमित थे। इस दृष्टिकोण में लोक प्रशासन के अध्ययन को संविधानों में प्रयुक्त भाषा, विधि संहिताओं, प्रकाशित अधिनियमों तथा न्यायिक निकायों में के निर्णयों पर आधारित किया जाता है।
इस उपागम का अनुसरण सबसे अधिक जर्मनी, फ्रांस तथा बेल्जियम जैसे यूरोपियन देशों में हुआ है। इन देशों में लोक विधि को दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित कर दिया गया है, यथा संवैधानिक विधि तथा प्रशासकीय विधि। इन देशों में राजनीति का अध्ययन प्रधानतः संवैधानिक विधि की दृष्टि से तथा प्रशासन का अध्ययन प्रशासकीय विधि की दृष्टि से किया जाता है। यही कारण है कि इन देशों में उच्च असैनिक अधिकारियों की भर्ती तथा प्रशिक्षण के समय वैधानिक अध्ययन के ऊपर ही अधिक बल दिया जाता है। इस उपागम को इंग्लैण्ड और अमेरिका में भी समर्थन प्राप्त हुआ. इसमें कोई दो राय नहीं कि लोक प्रशासन वैधानिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करता है, अतः उस ढांचे पर प्रकाश डालने के लिए यह उपागम उपयोगी है। परन्तु इस उपागम की एक सीमा यह है कि यह प्रशासन की समाज शास्त्रीय पृष्ठभूमि की सर्वथा उपेक्षा करता है। परिणामस्वरूप प्रशासन का वैधानिक अध्ययन औपचारिक एवं रूढिवादी बन जाता है तथा उसमें प्रशासकीय कार्यकलाप तथा व्यवहार के लिए सजीव आधारों का कोई बोध ही नहीं रह पाता।
3. ऐतिहासिक दृष्टिकोण
लोक प्रशासन के अध्ययन का ऐतिहासिक उपागम भी अति प्राचीन है। भूतकालीन लोक प्रशासन का अध्ययन इसके माध्यम से किया जाता है और सूचनाऐं कालक्रम की दृष्टि से संग्रहीत की जाती हैं तथा उनकी व्याख्या की जाती है। गौरवशाली अतीत से युक्त समाज में यह पद्धति अत्यधिक लोकप्रिय और प्रशासकीय प्रणाली के अनोखेपन को निर्धारित करने में सहायक होती है।
यह दृष्टिकोण वर्तमानकालीन प्रशासकीय संस्थाओं एवं प्रणालियों को पिछले अनुभवों के आधार पर देखने की चेष्टा करता है। वास्तव में अनेक प्रशासकीय संस्थाओं को उनके अतीत के आधार पर ही समझा जा सकता है और यह ऐतिहासिक उपागम द्वारा ही संभव है। उदाहरण के लिए भारत के वर्तमान प्रशासन को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम प्राचीन काल से लेकर अब तक देश में जिस प्रकार प्रशासकीय संस्थाओं का विकास हुआ है उसके बारे में जानकारी प्राप्त करें। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी इस उपागम के माध्यम से प्रशासन की समस्याओं को समझने का प्रयत्न किया गया. प्रशासन के ऐतिहासिक उपागम से मिलता जुलता, संस्मरणात्मक उपागम है। इस उपागम का अर्थ है, प्रसिद्ध तथा वरिष्ठ प्रशासकों के अनुभवों तथा उनके कार्यों के अभिलेख के अध्ययन की प्रणाली ये संस्मरण चाहे स्वयं उन्होंने लिखे हों अथवा दूसरों ने हर स्थिति में इनसे प्रशासकीय समस्याओं तथा निर्णय की प्रक्रिया का वास्तविक और व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है। इसमें एक कठिनाई यह है कि सार्वजनिक कार्यकर्ताओं की जीवन गाथाओं में प्रशासकीय कार्यों की अपेक्षा राजनीतिक महत्व की बातों पर बल दिया जाता है। अतः इस उपागम को उपयोगी बनाने के लिए इस कमी को दूर करना अत्यन्त आवश्यक है।
ऐतिहासिक तथा संस्मरणात्मक दृष्टिकोण प्रशासन के अतीत के आधार पर उसके वर्तमान स्वरूप के कुछ पहलुओं पर भले ही प्रकाश डालता हो, लेकिन वर्तमान प्रशासन के समक्ष कई ऐसी चुनौतियों या समस्याएँ है, जिनका निराकरण केवल अतीत के अनुभव के आधार पर नहीं किया जा सकता। उदाहरणस्वरूप कम्प्यूटर के इस युग में साईबर क्राइम की समस्या। अतः केवल ऐतिहासिक पद्धति के माध्यम से लोक प्रशासन के वर्तमान स्वरूप को समग्र रूप में नहीं समझा जा सकता।
4. संस्थागत संरचनात्मक
उपागम यह उपागम लोक प्रशासन का अध्ययन औपचारिक दृष्टि से करता है। इस दृष्टिकोण के समर्थक सार्वजनिक संस्थाओं के औपचारिक ढांचे तथा उनके कार्यों पर ध्यान देते हैं। दूसरे शब्दों में, इस उपागम के अंतर्गत सरकार के अंगों तथा भागों का अध्ययन किया जाता है, जैसे कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, विभाग, सरकारी निगम, मण्डल और आयोग, बजट बनाने का रचना तंत्र, केन्द्रीय कर्मचारी अभिकरण इत्यादि ।
इस दृष्टिकोण को यांत्रिक दृष्टिकोण भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रशासन को एक यन्त्रवत इकाई मानता है। यह संगठनों के व्यवस्थित विश्लेषण पर आधारित सबसे पुराने निरूपणों में से एक है, इसलिए इसे परम्परागत या शास्त्रीय दृष्टिकोण की भी संज्ञा दी जाती है। हेनरी फेयोल, लूथर गुलिक, एल.एफ. उर्विक, एम. पी. फॉलेट, ए.सी. रैले, जे. डी. मूने आदि विद्वान इस दृष्टिकोण के समर्थक हैं।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, प्रशासन, प्रशासन होता है, चाहे उसके द्वारा किसी प्रकार का कार्य किसी परिप्रेक्ष्य में क्यों न सम्पादित किया जाय। इसमें अतिरिक्त प्रशासकीय पद्धति के महत्वपूर्ण तत्वों तथा सभी प्रशासकीय संरचनाओं में सामान्य विशेषताओं या तत्वों को स्वीकार किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक संगठन के निश्चित सिद्धान्तों का विकास करना है।
हेनरी फेयोल ने अपनी पुस्तक 'जनरल एण्ड इण्डस्ट्रियल एडमिनिस्ट्रेशन' में प्रशासन के पाँच कार्यों नियोजन, संगठन, आदेश, समन्वय एवं नियंत्रण का उल्लेख किया है। इस संदर्भ में व्यापक विश्लेषण लूथर गुलिक और एल0एफ) उर्विक द्वारा 1937 में सम्पादित पेपर्स ऑन द साइन्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन में किया गया। गुलिक ने प्रशासन के कर्तव्यों को पोस्डकॉब शब्द में संग्रहीत किया है जिसका प्रत्येक अक्षर प्रशासन के विशेष कार्य का उल्लेख करता है
Planning
नियोजन संपन्न किये जाने वाले कार्यों का निर्धारण तथा उद्यम के निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्हें संपन्न करने के तरीकों का निर्धारण।
Organization
संगठन बनाना सत्ता के औपचारिक स्वरूप की स्थापना करना तथा उनके माध्यम से निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य को विभिन्न भागों में व्यवस्थित पारिभाषित एवं समन्वित करना ।
Staffing
कर्मचारियों की नियुक्ति करना कर्मचारियों की भर्ती और प्रशिक्षण की व्यवस्था तथा उनके कार्यों के अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करना।
Direction
निर्देशन करना निर्णय लेना और उन्हें विशिष्ट और सामान्य आदेशों और निर्देशों का रूप प्रदान करना।
Coordination
समन्वय कार्य के विभिन्न भागों में पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य
Reporting
प्रतिवेदन कार्य स्थिति के विषय में कार्यपालिका को सूचित करना जिसमें स्वयं को तथा अधीनस्थो को आलेखों, अनुसंधान तथा निरीक्षण के द्वारा सूचित करना।
Budgeting
बजट बनाना आर्थिक योजना, लेखांकन तथा नियंत्रण के रूप में बजट बनाने संबंधित सभी कार्य।
अपने गुण व दोषों के साथ पोस्डकोर्न दृष्टिकोण प्रशासनिक प्रक्रियाओं में एक प्रचलित दृष्टिकोण रहा है।
संस्थात्मक संरचनात्मक दृष्टिकोण की कई दृष्टियों से आलोचना की जाती है
• हरबर्ट साइमन के अनुसार इस दृष्टिकोण में यह स्पष्ट
नहीं होता कि किस विशेष स्थिति में कौन सा सिद्धान्त महत्व देने योग्य है।
उन्होंने प्रशासन के सिद्धान्तों को प्रशासन की कहावतें मात्र कहा है। इस
दृष्टिकोण से सम्बन्धित सभी विचारकों में प्रबन्ध की ओर झुकाव नजर आता है। वे केवल
प्रबंध की समस्याओं से चिन्तित थे न कि प्रबंध तथा व्यक्तियों से संबंधित अन्य
संगठनात्मक समस्याओं के विषय से।
यह एक संकुचित विचार है जो संगठन में उनके व्यक्तियों को उनके साथियों से अलग रखकर निरीक्षण करने परबल देता है। यह कार्य करने वाले मनुष्यों की अपेक्षा कार्य के विषय में अधिक चिन्तित है।
इस दृष्टिकोण से लोक प्रशासन के अर्थ एवं क्षेत्र का पूरा बोध नहीं होता और न ही लोक प्रशासकों के मार्गदर्शन की दृष्टि से उनका महत्व है। उपर्युक्त कमियों के बाद भी संस्थागत संरचनात्मक दृष्टिकोण की पूर्णतः उपेक्षा नहीं की जा सकती।
इस दृष्टिकोण ने ही सर्वप्रथम इस बात पर बल दिया कि प्रशासन को एक स्वतन्त्र क्रिया मानकर उसका बौद्धिक अन्वेषण किया जाना चाहिए।
• सबसे पहले इस दृष्टिकोण ने ही प्रशासन के क्षेत्र में अवधारणाओं और शब्दावली पर बल दिया, जो इस क्षेत्र के परवर्ती शोध का आधार बनी।
इस दृष्टिकोण की कमियों ने संगठन तथा उसके व्यवहार के भावी शोध की प्रेरणा प्रदान की। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि संस्थागत संरचनात्मक दृष्टिकोण लोक प्रशासन का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। किन्तु इस उपागम से किसी संगठन के व्यावहारिक रूप का सही ज्ञान नहीं होता।
आधुनिक दृष्टिकोण इसके अन्तर्गत निम्नलिखित दृष्टिकोणों का अध्ययन किया जायेगा।
1. वैज्ञानिक अथवा तकनीकी दृष्टिकोण बीसवीं सदी के आरंभ में संयुक्त राज्य अमेरिका के वैज्ञानिक प्रबन्ध आंदोलन' ने लोक प्रशासन के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक उपागम के प्रयोग को शामिल किया। वैज्ञानिक प्रबन्ध वस्तुतः उस प्रयास का परिणाम था जिसके द्वारा सरकार के कार्यों के परिचालन में वैज्ञानिक चिन्तन को लागू किया गया। इस आंदोलन का सूत्रपात एफडब्ल्यू) टेलर नामक एक इंजीनियर ने किया था। कालान्तर में अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या में पर्याप्त रूप से वृद्धि हो गयी जो यह मानते थे कि मनुष्यों के प्रबन्ध का कार्य, यथार्थ में एक वैज्ञानिक कार्य है जिसके लिए ज्ञान का एक निकाय निर्मित किया जा सकता है। यह ज्ञान कम या अधिक मात्रा में पूर्ण हो सकता है और यह पर्यवेक्षण तथा अनुभव के विश्लेषण पर आधारित होता है। इस ज्ञान के चार भाग हैं, पहला- उन कार्यों का विश्लेषण जिन्हें करने के लिए लोगों को कहा जाता है, दूसरा व्यक्तियों का उन कार्यों के साथ समायोजन, तीसरा- मानवीय अनुभव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर कार्यों को व्यवस्थित तथा सह-वर्णित करना तथा चौथा निर्धारित कार्यों का प्रत्येक समूह के साथ समायोजन। इसके अंतर्गत नेतृत्व, संचार, सहभाग तथा मनोबल को शामिल किया जा सकता है।
प्रबन्ध के अध्ययन का प्रारम्भ व्यापार के साथ हुआ था, परन्तु अब उसका प्रयोग बड़ी मात्रा में लोक कार्यों के प्रबन्ध के लिए भी किया जाने लगा है। उदाहरण के लिए, अब मुख्य कार्यपालिका के लिए जनरल मैनेजर तथा व्यवस्थापिका के लिए संचालक मण्डल शब्दावलियों को प्रयुक्त किया जाने लगा है। स्पष्टत: इन शब्दावलियों को लोक प्रशासन के अध्ययन में नूतन प्रवृतियों का परिचायक समझा जाना चाहिए।
इस दृष्टिकोण के समर्थक प्रशासन से सम्बद्ध समस्याओं के ऊपर वैज्ञानिक ढंग से विचार करते हैं तथा वे उन समस्याओं का समाधान उन यंत्रों के माध्यम से खोजने का प्रयत्न करते है जिनका प्रयोग वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है।
2. व्यवहारवादी दृष्टिकोण लोक प्रशासन के अध्ययन में व्यवहारवादी उपागम इस विषय के परम्परागत उपागम के प्रति असंतोष के फलस्वरूप विकसित हुआ। यद्यपि इस उपागम का आरम्भ मानव सम्बन्ध आंदोलन के साथ ही 1930 तथा 1940 वाले दशक में हुआ, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसकी महत्ता काफी बढ़ गयी और उसने लोक प्रशासन के मुख्य उपागम का दर्जा प्राप्त कर लिया।
लोक प्रशासन के क्षेत्र में व्यवहारवादी उपागम को विकसित करने का
मुख्य श्रेय हर्बट साइमन को जाता है। इसके अतिरिक्त पीटर एम) ब्लान, मेंटून,
वेडनर, रिग्स, एलम,
राबर्ट ए0 डॉहल आदि का नाम भी इसके
समर्थकों में लिया जा सकता है। इस विषय पर शुरू में लिखी गयी पुस्तकों में साइमन की पुस्तक *एडमिनिस्ट्रेटिव विहेवियर' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त 1950 में साइमन तथा उसके दो सहयोगियों द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन' प्रकाशित होने के बाद इस उपागम का प्रभाव और बढ गया।
3. पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण इस उपागम का उद्-भव तृतीय विश्व की प्रशासनिक समस्याओं के अध्ययन के संदर्भ में हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनेक देश औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए। उनके समक्ष जन आकाक्षाओं की पूर्ति हेतु राष्ट्र निर्माण तथा सामाजिक आर्थिक परिवर्तन की बड़ी चुनौती थी। पश्चिमी विद्वानों ने जो इन देशों में बहुत से देशों के सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे थे, अनुभव किया कि पश्चिमी संगठनात्मक प्रतिमान तृतीय विश्व के समाजों में वास्तविकता की व्याख्या करने में असफल थे। इसी संदर्भ में पारिस्थितकीय दृष्टिकोण का विकास हुआ।
यह दृष्टिकोण इस मान्यता पर आधारित है कि प्रशासन एक निश्चित परिवेश या वातावरण में रहकर कार्य करता है। प्रशासन उस परिवेश को प्रभावित करता है तथा स्वयं उससे प्रभावित भी होता है। अतः प्रशासन को समझने के लिए दोनों के बीच की पारस्परिक क्रिया को समझना आवश्यक है।
'पारिस्थितिकीय' शब्द जीव विज्ञान से लिया गया है जो जीवों तथा उनके परिवेश के अर्न्तसंबंधों की व्याख्या करता है। जिस प्रकार एक पौधे के विकास के लिए एक विशेष प्रकार की जलवायु मिट्टी, नमी तथा तापमान आदि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार किसी समाज का विकास उसके अपने इतिहास, आर्थिक संरचना, मूल्यों, राजनतिक व्यवस्था आदि से जुड़ा होता है। अतः लोक प्रशासन की प्रकृति तथा समस्याओं को समझने के लिए उस सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है जिसमें प्रशासन कार्य करता है।
जे. एम. गॉस, राबर्ट ए. डाहल तथा राबर्ट ए. मर्टन ने लोक प्रशासन के अध्ययन में इस दृष्टिकोण की शुरूआत की थी, लेकिन इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण योगदान एफ0डब्ल्यू) रिग्स का रहा है। रिम्स के अनुसार प्रत्येक समाज की अपनी कुछ विलक्षण विशेषताएँ होती हैं, जो उसकी उप व्यवस्थाओं को प्रभावित करती है। चूंकि पश्चिमी देशों का समाजिक-आर्थिक परिवेश तृतीय विश्व के देशों से भिन्न रहा है, इसलिए विकसित देशों के लिए निर्मित सिद्धान्त या प्रतिमान तृतीय विश्व के देशों में लागू नहीं होते, इसलिए रिम्स ने तृतीय विश्व के देशों के संदर्भ में प्रशासनिक व्यवस्थाओं के विश्लेषणात्मक ढाँचे को विस्तृत किया है।
रिम्स ने वृहद स्तर पर मुख्य व्यवस्थाओं को श्रेणीबद्ध किया तथा उन श्रेणियों को प्रशासन जैसी सूक्ष्म या छोटी उप-व्यवस्थाओं पर लागू करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने श्रेणीकरण के लिए व्यापक व्यवस्थाओं को लिया तथा विकासशील समाजों में परिवर्तन की व्याख्या करने के लिए तीन आदर्श रूपों- बहुकार्यात्मक, अल्पकार्यात्मक तथा समपार्श्वय को विकसित किया। उनके अनुसार, एक बहुकार्यात्मक समाज में एक अकेला संगठन या संरचना बहुत से कार्य करती है। इसके विरूद्ध एक अल्पकार्यात्मक समाज में निश्चित कार्य करने के लिए अलग-अलग संरचनाएँ बनाई जाती हैं। परन्तु इन दोनों के बीच में अनेक ऐसे समाज हैं, जिनमें बहुकार्यात्मक तथा अल्पकार्यात्मक समाज दोनों की विशेषताएँ लगभग समान पायी जाती हैं। ऐसे समाजों को समपार्श्वीय कहा जाता है।
रिग्स इस बात पर बल देता है कि कोई भी समाज पूर्ण रूप से बहुकार्यात्मक या अल्पकार्यात्मक नहीं कहा जा सकता। सामान्यतः सभी समाज प्रकृति में संक्रमणकालीन होते हैं। प्रत्येक समाज चाहे वह बहुकार्यात्मक है या अल्पकार्यात्मक, उसका चरित्र विभिन्न संरचनाओं एवं उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों की प्रकृति पर निर्भर करता है।
अपने विश्लेषण में रिग्स ने बहुकार्यात्मक तथा अल्पकार्यात्मक प्रारूपों का विकासशील देशों के समपाश्र्चय वस्तु स्थिति की व्याख्या करने के साधन के रूप में प्रयोग किया है।
4. घटना या प्रकरण पद्धति लोक प्रशासन की अध्ययन पद्धतियों में घटना या प्रकरण पद्धति एक अमेरिकी देन है। घटना या प्रकरण का अर्थ है- प्रशासन की कोई भी विशिष्ट समस्या जो किसी प्रशासकीय अधिकारी को हल करनी पड़ी हो तथा वास्तव में हल कर ली गयी हो। इस प्रकार की समस्या का अध्ययन करने के लिए घटना की परिस्थितियों का अभिलेख तैयार कर लिया जाता है। साथ ही यह ब्यौरा संग्रह किया जाता है कि निर्णय करने के लिए किन प्रक्रियाओं का आश्रय लिया गया और क्या कदम उठाये गये तथा जो भी निर्णय लिया गया, उसका तार्किक आधार क्या था? इसके उपरान्त परिणामों के आधार पर निर्णय का मूल्यांकन किया जाता है।
1940 में संयुक्त राज्य अमेरिका की सामाजिक अनुसंधान परिषद की लोक प्रशासन समिति ने घटना अध्ययन प्रकाशित करने का कार्य आरम्भ किया। अब तक नीति निर्माण, पुनर्संगठन तथा ऐसे ही अन्यअनके समस्याओं से सम्बद्ध कई घटनाओं की अध्ययन प्रकाशित की जा चुकी हैं।
इस पद्धति के अनुगामियों के मन में यह आशा है कि लोक प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में घटना अध्ययन किये जाने के उपरान्त प्रशासन के विषय में अनुभवसिद्ध सिद्धान्तों का प्रतिपादन सम्भव हो जायेगा तथा शायद यह भी मुमकिन हो जायेगा कि ये घटना अध्ययन न्यायिक प्रथाओं और दृष्टान्तों की भांति सही समाधान खोजने के काम में प्रशासक के लिए सहायक सिद्ध हो सके।
लेकिन इस पद्धति की भी अपनी सीमायें हैं। किसी घटना या प्रकरण विशेष के अध्ययन के आधार पर ही किसी सर्वमान्य या सर्वकालिक सिद्धान्त का प्रतिपादन संभव नहीं है। यही कारण है कि यह उपागम अभी तक लोक प्रशासन के अध्ययन का प्रमुख उपागम नहीं हो सका है।
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