भारत का आर्थिक इतिहास - Economic history of India

भारत का आर्थिक इतिहास - Economic history of India

 भारत का आर्थिक इतिहास - Economic history of India

आर्थिक इतिहास का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है इतिहास के इस क्षेत्र का समुचित अध्ययन अभी नहीं हो पाया है। आर्थिक इतिहास को महत्वपूर्ण बनाने में कोदोरसे, काम्ते, बर्कले तथा कार्ल मार्क्स का सर्वाधिक योगदान रहा है। कार्ल मार्क्स द्वारा इतिहास की आर्थिक व्याख्या ने इतिहास के इस क्षेत्र पर विचार के लिए विद्वानों को बाध्य किया। समाज के प्रादुर्भाव के साथ ही अर्थतंत्र की समस्याएँ उदित हो गई थीं। व्यक्ति और समाज ने अपनी आजीविका के संसाधनों को किस प्रकार ढूंदा और समय के साथ इसका किस प्रकार विकास हुआ, इसका ज्ञान आवश्यक है। इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के बाद समाज के अर्थतंत्र पर विद्वानों ने सोचना शुरू किया। सबसे पहले आर. एच. टानी व एलीन पावर ने आर्थिक इतिहास लिखा विलियम ऐसे ने आर्थिक इतिहास के स्वरूप के विषय में लिखा है कि मनुष्य ने आजीविका के साधनों के उत्पादन में अधिकतम संतोष प्राप्त करने के लिए क्या किया यही आर्थिक इतिहास है। वास्तव में अर्थ का क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। यह तो मात्र उसका एक पहलू है। आदिकाल से व्यक्ति एकाकी एवं व्यक्तिवादी नहीं रहा है। व्यक्ति किसी न किसी रूप में संगठन एवं सामूहिकता के तथ्यों से संचालित होता रहा है। किसी भी वस्तु के उत्पादन में सर्वप्रथम संसाधन अम और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। यहाँ से अर्थतंत्र का इतिहास शुरू हो जाता है। आज आर्थिक इतिहास के अंतर्गत आजीविका के साधन, कृषि, उद्योग, व्यापार, यातायात के साधन, भू राजस्व आदि विषयों का अध्ययन होता है। जी. एन. क्लार्क के अनुसार आधुनिक युग में आर्थिक इतिहास ने इतिहास के अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत एक उच्च स्थान प्राप्त कर लिया है।








बैंकों का अध्ययन इतिहास क्षेत्र के अंतर्गत आता है। सर जॉन क्लैफम ने बैंक ऑफ इंग्लैंड तथा इ. टी. मैकडेरमोट ने वेस्टर्न रेलवे का इतिहास लिखा है मिस सदरलैंड ने अठारहवीं सदी का व्यापारी तथा रिचर्ड पेरीज ने वेस्ट इण्डिया फारच्यून लिखकर आर्थिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आर्थिक इतिहास के अंतर्गत आजीविका के साधन, कृषि, यातायात के साधन, उद्योग व्यापार आदि विषयों का अध्ययन होता है। डारविन ने आर्थिक इतिहास को अस्तित्व के लिए संघर्ष तथा कार्ल मार्क्स ने आर्थिक नियतिवाद के सिद्धांतों का प्रतिपादन करके विषय को रोचक एवं आकर्षक बनाने का प्रयास किया है। 1917 की रूस की राज्यक्रांति के बाद आर्थिक इतिहास का महत्व द्रुत गति से बढ़ता जा रहा है। मार्क्सवादी विचारों प्रभावित अनेक भारतीय विद्वानों ने आर्थिक इतिहासकार की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन किया है। हिरेन मुखर्जी, रजनी पामदत्त, कोसाम्बी तथा इरफान हबीच ने आर्थिक इतिहास लेखन को एक नवीन दिशा प्रदान की है।





आधुनिक आर्थिक सिद्धांत का आधार गणित तथा सख्यिकी है, परंतु इतिहास में इन सिद्धांतों का प्रयोग इतिहास को अरुचिकर बना देगा। इतिहास को अर्थपूर्ण बनाने के लिए इनका कम से कम उपयोग आवश्यक है। गणित तथा सांख्यिकी का अधिक प्रयोग इतिहासकार को कैची तथा गोंद शैली (Scissor and Cum Cut and Paste) के लिए विवश कर देगा। संभावना है कि इतिहास अपना अस्तित्व खो बैठेगा। वैज्ञानिक इतिहासकारों ने भी प्रतिरोध की आवश्यकता की अनुभूति की है। आर्थिक इतिहास साक्ष्यों के आधार पर उपयोगी तथा बोधगम्य होना चाहिए इतिहासकारों से यहाँ अपेक्षा की जाती है। आर्थिक इतिहास के अनेक पहलू अब विकसित होते जा रहे हैं और कुछ तो अभी बिल्कुल अछूते है। आर्थिक इतिहास के समग्र पहलुओं पर चिंतन एवं लेखन होना चाहिए। जी. एन. क्लार्क का विचार है कि तकनीकी यंत्रों तथा कारखानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस वस्तु का उत्पादन सामूहिकता तथा संगठन का परिणाम है। वास्तव में उस वस्तु के उत्पादन में संसाधन अपनी भूमिका अदा करते हैं। स्पष्ट है कि वस्त्र उत्पादन में किसान, कोयला, मशीन, श्रम तथा पूँजी के पारस्परिक सहयोग की अपेक्षा होती है। इतिहासकार का दायित्व है कि वह आर्थिक इतिहास के सभी पक्षों पर विचार करे। श्रम के साथ ही उसे पूँजी एवं पूजीपतियों पर भी विचार करना होगा। इसी प्रकार उसे बैंक एवं बैंकिंग व्यवस्था का भी इतिहास लिखना होगा तभी आर्थिक इतिहास का अध्ययन आगे बढ़ सकेगा।