परीक्षणात्मक शोध - experimental research
परीक्षणात्मक शोध - experimental research
परीक्षणात्मक शोध अध्ययनों का सृजन कारक सम्बन्धों की स्थापना के लिए किया गया है। यह विधि दो अथवा उससे अधिक परिवर्तियों के मध्य सम्बन्ध से संबंधित होती है और शोधकर्ता संभावित सम्बन्ध के चरित्र को विश्लेषित करने के लिए एक अथवा अधिक उपकल्पनाओं का नियोजन करता है। परीक्षण एक नियोजित घटना होती है और इसका प्रयोग शोधकर्ता द्वारा उपकल्पना के लिए प्रासंगिक प्रमाण के संकलन में किया जाता है। सामान्यत: परीक्षण की मुख्य रूप से तीन विशेषताएँ होती हैं -
• पहली, एक स्वतंत्र परिवर्ती में बदलाव किया जाता है।
• दूसरी स्वतंत्र परिवर्ती के अलावा दूसरे सभी परिवर्ती स्थिर रखे जाते हैं और
• तीसरी, स्वतंत्र परिवर्ती के बदलाव पर आश्रित परिवर्ती पर प्रभाव को परिलक्षित किया जाता है।
परीक्षण में स्वतंत्र परिवर्ती और आश्रित परिवर्ती आवश्यक होते हैं। स्वतंत्र परिवर्ती में परीक्षणकर्ता द्वारा बदलाव अथवा परिवर्तन लाया जाता है। आश्रित परिवर्ती पर परिवर्तनों के प्रभाव को परिलक्षित किया जाता है और उसका निरीक्षण परीक्षणकर्ता द्वारा किया जाता है लेकिन उसमें कोई बदलाव नहीं लाया जाता है।
परीक्षणात्मक शोध को कारक सम्बन्धों के परीक्षण हेतु नियोजित किया जाता है। कारक सम्बन्धों से आशय दो परिवर्तियों के मध्य सम्बन्ध से है जहाँ एक परिवर्ती (विशेषता) X, दूसरे परिवर्ती (विशेषता) Y को निर्धारित करता है। उदाहरणस्वरूप, यदि शोधकर्ता महिलाओं के एक ऐसे समूह की, जिन्हें उपेक्षित (X) किया गया था, की उससे तुलना करके जिन्हें उपेक्षित नहीं किया गया था, इस कारक सम्बन्ध का परीक्षण करना चाहता है कि उपेक्षित नजरिए (X) से आत्मसम्मान में गिरावट (Y) आती है, तो उसके द्वारा दोनों समूहों को X के लिए संवर्धन के समय में अथवा उसके उपरांत Y के संदर्भ में मापा जाना चाहिए। कारक सम्बन्ध के परीक्षण के लिए प्रयोग किए जाने वाले अनेक परीक्षणात्मक अध्ययनों के बारे में बात करने से पूर्व कारकता” की संकल्पना को जान लेना महत्वपूर्ण होता है। जे. एस. मिल (1930) के अनुसार, 'कारण किसी चीज के अंतिम कारण के संदर्भ के बिना स्वयं एक परिघटना होता है।” वे आगे कहते हैं, 'कारकता मात्र एकसमान पूर्ववर्ती है। यद्यपि 'कारण' और 'कारकता' का यह विवरण सामाजिक विज्ञान सहित अनेक विज्ञानों में न्यूनाधिक स्वीकृत है परंतु फिर भी अवधारणाओं के बारे में संशय है खासकर तब जब आप 'पहले कारण', उसके बाद के कारण और 'अंतिम कारण' के बारे में सोचते हैं। इसके परिणामस्वरूप वैज्ञानिक व्याख्या में भी शब्द 'कारण' का अनेक मापनों में अक्सर संदेह हो जाता है।'
मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि पूर्ववर्ती घटना (कारण) और पूर्ववर्ती घटना द्वारा होने वाली उत्तरोत्तर घटनाएँ (प्रभाव) कारक सम्बन्ध रचती है। वैज्ञानिक शोध मुख्य रूप से किसी प्रभाव जरूरी और पर्याप्त स्थितियों की तलाश करता है जबकि सहजबोध से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि एक कारण उस प्रभाव के लिए पूर्ण विवरण प्रस्तुत कर सकता है जिसके बारे में शोधकर्ता मुश्किल से ही ये विचार करता है कि एक कारण अथवा स्थिति किसी प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए जरूरी और पर्याप्त दोनों हो सकती है, अपितु उसकी दिलचस्पी 'प्रभावों' अथवा 'घटनाओं' की बहुरूपता को संज्ञान में लाने में होती है।
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