स्वास्थ्य नियोजन - health planning

स्वास्थ्य नियोजन - health planning

स्वास्थ्य नियोजन - health planning


हर दृष्टि से जनता का स्वस्थ होना समाज व देश के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि स्वास्थ्य से आशय रोगो एवं शारीरिक दुर्बलताओं के अभाव मात्र से ही नहीं है बल्कि शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से मनुष्य का पूरी तरह ठीक होना है। मनुष्य केवल जीना ही नहीं चाहता बल्कि वह स्वस्थ भी रहना चाहता है। स्वास्थ्य का न केवल शारीरिक व मानसिक दृष्टि से ही महत्व होता है बल्कि इसका सांस्कृतिक महत्व भी होता है। किसी भी देश की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए उस देश के व्यक्तियों का स्वास्थ्य स्तर अच्छा होना आवश्यक होता है। वास्तव में किसी भी राष्ट्र की निधि उसके स्वस्थ दीर्घ आयु और कार्यकुशल नागरिक होते हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए तथा भारत में स्वास्थ्य की स्थिति को देखते हुए सबको अच्छी स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराने की कोशिश सरकार द्वारा स्वास्थ्य नियोजन के माध्यम से की गई है।


स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भोर समिति की संस्तुतियों के आधार पर एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन योजनाएँ बनायी गयीं। अक्टूबर, 1943 में भारत सरकार ने एक “स्वास्थ्य सर्वेक्षण और विकास समिति” की नियुक्ति की थी इसके अध्यक्ष तत्कालीन स्वास्थ्य निर्देशक सर जोसेफ भोर (Sir Joseph Bhore) थे। इस समिति को भोर समिति के नाम से जाना गया। यह स्वास्थ्य विकास की एक विस्तृत योजना थी जिसमें भारत की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को पहली बार एकीकृत कसे तथा वैज्ञानिक ढंग से सुलझाने का प्रयास किया गया। भोर समिति की योजना के प्रमुख सिद्धान्त भोर समिति ने अपने प्रतिवेदन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्वास्थ्य विकास संबंधी योजना प्रस्तुत की। समिति का मूल उद्देश्य देश के नागरिको के स्वास्थ्य संबंधी दशाओं में सुधार करनास्वास्थ्य सेवाओं की एक विकेन्द्रीकृत योजना प्रस्तुत करना तथा इन सेवाओं में जनता से अधिकाधिक सहयोग प्राप्तकरना था। भोर समिति की योजना के प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार थे -







1) जनता को उपचारात्मक तथा निरोधात्मक दोनों प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं एवं सुविधाएँ मिलनी चाहिए। जिससे लोग प्रत्यक्षत: लाभान्वित हो सकें। 


2) स्वास्थ्य सेवाएँ जनता के अधिकाधिक नजदीक होनी चाहिए जिससे प्रत्येक व्यक्ति आसानी से इसका लाभ ले सके।


3) स्वास्थ्य से संबंधित संगठन इस प्रकारहों कि जनता आसानी से सहयोग कर सके तथा जनता बिना किसी कठिनाई या संकोच के सहयोग व लाभ प्राप्त कर सके। समिति ने स्वास्थ्य संगठन में अफसरशाही को दूर रखने की बात पर विशेष बल दिया। 


4) स्वास्थ्य कार्यक्रम की योजना ऐसी होनी चाहिए कि उसमें चिकित्सा, औषधि और परिचर्चा से संबंधि समस्त व्यक्ति अपना सही प्रतिनिधित्व कर सके और इस संबंध में बनाई जाने वाली नतियों में उनकी राय अवश्य ली गयी हो।


5) स्वास्थ्य सेवाओं का इस प्रकार प्रबंध करना जिसमें विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ शामिल हो और अपेक्षानुकूल उनका योगदान चिकित्सामें प्राप्त हो सके।


6) जनता की निर्धनता का ध्यान रखते हुए इस प्रकार की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे गरीब से गरीब व्यक्ति भी चिकित्सा व्यय बोझ की असमर्थता के कारण स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं से वंचित न रहे।


7) चिकित्सा संबंधी कार्यक्रमों में महिलाओं बच्चे और मानसिक रोग संबंधी चिकित्सापर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रसार में अधिक बल दिया जाना चाहिए।


8) भोर समिति ने नि:शुल्क चिकित्सा एवं स्वास्थ्यप्रद वातावरण के निर्माण पर बल दिया। समिति के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं का जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, उस योजना के दो भाग हैं- 


(1) अल्पकालीन योजना एवं 


(2) दीर्घकालीन योजना 


अल्पकालीन योजना के अंतर्गत प्रत्येक 40000 की जनसंख्या पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोलने से सम्बंधित प्रावधान किया गया।


दीर्घकालीन योजना के तहत प्रत्येक 10 से 20 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, हर 3 से 5 स्वास्थ्य केन्द्रों पर 150 शैयाओं वाले एक द्वितीयक केन्द्र और जिला स्तर पर 25000 रोगी शैयाओं वाले जिला स्वास्थ्य केन्द्र को स्थापित करने का निर्णय लिया गया।











पंचवर्षीय योजनाओं के प्रारंभ किये जाने के बाद स्वाथ्य के क्षेत्र में नियोजित प्रयासों का शुभारंभ हुआ। आरंभ के तीनों पंचवर्षीय योजनाओं में प्राथमिक स्वास्थ्य, केन्द्रों की स्थापना तथा उनको प्रभावपूर्ण बनाने के लिए कार्य किए गए। 1951 में क्षय रोग नियंत्रण अभियान प्रारंभ किया गया। 1953 में मलेरिया नियंत्रण अभियान आरंभ किया गया। 1954 में घेंघा रोग (Goiter) नियंत्रण अभियान आरंभ किया गया। 1954-55 में कुष्ठ रोग निवारण अभियान शुरू किया गया। 1953 में फाइलेरिया नियंत्रण के लिए कार्यक्रम चलाया गया। 1958 में मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया और 1962 में चेचक उन्मूलन अभियान शुरू किया। चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण सुविधाओं का प्रसारस्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और उपचारात्मक तथा निरोधात्मक दोनों तरह की सेवाओं का विस्तार किया गया। पांचवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इन्हीं कार्यक्रमों को सुदृढ़ तरीके से लागू किया गया तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को और अधि प्रभावशाली बनाने की कोशिश की गई। इसी दौरान न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया गया तथा गर्भवती माताओं तथा बच्चों में कुपोषण की कमीं को न्यूनतम करने एवं उसको दूर करने की कोशिश की गयी।

छठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयं सेवकों की नियुक्ति करने का प्रावधान किया गया जिसके तहत एक हजार जनसंख्या पर एक स्वास्थ्य स्वयं सेवक रखने की व्यवस्था की गई। 


इस योजना में संक्रामक रोगों को रोकने, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाने, बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं की नियुक्ति कर उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने पर बल दिया गया। सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान प्रत्येक गाँव में जिनकी जनसंख्या 1 हजार के आस-पास थी। सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयं सेवक की नियुक्ति की गई। प्रत्येक पाँच हजार की जनसंख्या पर एक स्वास्थ्य उपकेन्द्र तथा 30 हजार की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना का प्रावधान किया गया। साथ ही साथ एक लाख की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना का भी प्रावधान किया गया। ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम को आयोजित करने, नगरीय सेवाओं में वृद्धि करने तथा संक्रामक रोगों पर नियंत्रण करने के लिए इस योजना में बल दिया गया।


आठवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य नियोजन के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को आधुनिक स्वरूप प्रदान करने, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लागू करवाने हेतु योजना बनानाएवं क्रियान्वित करना, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को जनजातीय आबादी वाले क्षेत्रों में स्थापित करने पर बल देना, गंभीर बीमारियाँ जैसे- मलेरिया, कालाजार एवं जैपनीज बुखार, कुष्ठरोग निवारण एवं रोकथाम एड्स नियंत्रण, कैंसर की रोकथाम एवं पल्स पोलियों जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए जन जागरूकता अभियान चलाना, इत्यादि प्रयास किये गये। आठवीं पंचवर्षीय योजना के क्रियान्वयन के दौरान यह भी देखा गया कि जन्म दर (CBR ) एवं मृत्युदर (CDR) 37 और 129 (1971) से 29.9 एवं 80 हो गयी। जीवन प्रत्याशा में बढ़ोतरी महसूस की गयी तथा 2000 ई. तक "सभी के लिए स्वास्थ्य” की परिकल्पना भी की गयी। इस योजना के दौरान टी. वी. रोकथाम, अंधापन को रोकने का अभियान तथा आयोडीन की कमी को पूरा करने वाले कार्यक्रमों का क्रियान्वयन भी किया गया। जिससे इन बीमारियों पर काफी हद तक नियंत्रण एवं प्रभावी रूप से रोकथाम संभव हो पाया है। 

नौवीं पंचवर्षीय योजना में विभिन्न प्रयासों के माध्यम से जन्म दर (CBR ) 1996-2001 में, 24.10 से 2011-16 तक 21.14 लाने की कोशिश की गई मृत्युदर (CDR) 8.99 से घटकर 7.48 तक पहुँचने की संभावना की गयी। यह भी माना गया कि शिशु मृत्युदर पुरूषों के लिए 63 से 38 और महिलाओं के लिए 64 से घटकर 39 हो जाएगी। यह भी कोशिश की गई गई कि जीवन प्रत्याक्षा भी लगभग बढ़े तथा 60 की आयु में महिलाओं से संबंधित जितने भी कार्यक्रम चलाये गये हैं उससे उनकी गुणवत्ता में सुधार हुआ है।











दसवीं पंचवर्षीय योजना में जीवन प्रत्याशा 1951 में 36.7 वर्ष से बढ़ाकर इसमें 64.6 वर्ष होने की उम्मीद की जा रही थी। उसी प्रकार जन्मदर (CBR ) 40.8 से घटाकर 26.1 तथा मृत्युदर (CDR) घटाकर 8.7 होने की संभावना व्यक्त की जा रही थी। शिशु मृत्युदर (IMR) भी 146 से घटकर 70 तक होने की उम्मीद थी। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM National Rural Health Mission) जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएँ, ग्रामीण जनसंख्या को उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य सेवा अतंरालों को भरने, स्वास्थ्य क्षेत्र में विकेन्द्रीतकृत योजना को सुगम बनाने और अंतर क्षेत्रीय समस्पता लाने के लिए 2005 में शुरू किया गया बेहतर अवसंरचना, मानव शक्ति, दवाओं और उपकरणों की उपलब्धता और विभिन्न स्तरों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार स्वास्थ्य मानव संसाधन के संवर्धन स्वास्थ्य सेवा सुपुर्वी में सुधार और बहिरंग रोगी विभाग ( OPD, Out Patient door) जैसी सेवाओं में भी वृद्धि की गई है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की मूल अवधि 2012 तक यानी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना तक थीं, जिसे 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के लिए 5 वर्षो तक विस्तारित किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के प्रस्तावित लक्ष्य शिशु मृत्युदर (IMR) में कमी करके उसे प्रति हजार जीवित जन्म पर 30 से नीचे लाना, मातृत्व मृत्यु अनुपात (MMR) को प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 100 से नीचे लाना तथा सकल प्रजनन दर (TFR ) को 2.1 पर लाना शामिल है।