इतिहास और पुरातत्वशास्त्र - History and Archeology

इतिहास और पुरातत्वशास्त्र - History and Archeology

इतिहास और पुरातत्वशास्त्र - History and Archeology


 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में पुरातत्व एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में विकसित हुआ है यद्यपि स्वतंत्र विषय के रूप में इसे मान्यता प्राप्त करना अभी भी शेष है। पुरातत्व शब्द वास्तव में अंग्रेजी के आयलॉजी का समानार्थी है। अंग्रेजी का जी यूनानी भाषा के आया (Archacos + lorus) से निर्मित है जिसका शाब्दिक अर्थ पुरातन ज्ञान है। पुरातत्व का विषय के रूप में विकास पुरावशेषों के संकलन एवं अध्ययन से प्रारंभ होता है। समय के प्रवाह के साथ इसका एवं विषय विस्तार में परिवर्तन तथा परिवर्धन होता गया। पुरातत्व को अब प्रायः इतिहास के पुनर्निर्माण के निमित्त पुरावशेषों का वैज्ञानिक अध्ययन कहकर परिभाषित करते है। यह मानव संस्कृति एवं इतिहास को एक नवीन आयाम प्रदान करता है, विशेषतः कालक्रम तथा संस्कृति के परिप्रेक्ष में लिपि की उत्पत्ति के पूर्व का संपूर्ण इतिहास जो प्रागैतिहास के अंतर्गत आता है, उसका एक मात्र आधार पुरातत्व है।





पुरातत्व तथा इतिहास दोनों का मूल उद्देश्य मानव के विकास का अध्ययन करना है इसीलिए दोनों अत्यंत सन्निकट है। दोनों की पद्धति भी समान है तथा कालानुक्रम (Chronology) उनकी आधारशिला है। पुरातत्व इतिहास का पूरक भी है। जहाँ इतिहास की गति अवरुद्ध हो जाती है वहाँ पुरातत्व ही प्रागैतिहास के माध्यम से इतिहास को आगे बढ़ाता है। इतिहास के संपूर्ण खोत प्रमाणों पर आधारित होते हैं। जबकि मानव के विकास के इतिहास में लिपि का आविर्भाव लगभग तीन हजार वर्षों पूर्व ही हुआ है जो मानव के विकास के संपूर्ण काल का प्रतिशत से भी कम है। 99.9 प्रतिशत से भी अधिक काल प्रागैतिहास के अंतर्गत आता है जिसका स्रोत मात्र पुरातत्व है। यहाँ यह कहना अनुचित

नहीं होगा कि मानव विकास के इतिहास में प्रागैतिहासिक काल अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि आधुनिक विकास की आधारशिला का निर्माण इसी समय हुआ था। पशुपालन एवं कृषि मृद-भाण्ड तथा चक्के आदि का आविष्कार भी इसी काल में हुआ था।


प्रागैतिहासिक एवं आयेतिहासिक काल के इतिहास लेखन के लिए जानकारी उपलब्ध कराने वाले शास्त्र के रूप में पुरातत्वशाध का अत्यंत महत्व है। अति प्राचीन सभ्यता की लिखित जानकारी उपलब्ध न होने से उस काल की वस्तुओं, अवशेषों को खोजना उत्खनन कर पुरातन वस्तुओं के अवशेष इकट्ठा करना, उन पर वैज्ञानिक पद्धति से प्रक्रिया कर उनका काल निर्धारण करना पुरातत्वशास्त्र की कक्षा है। पुरातन सभ्यता के प्रदेश में उत्खनन से प्राचीन वस्तुओं के अवशेष प्राप्त किए जाते हैं। पर अथवा विभिन्न धातुओं के छोटे बड़े हथियार मिट्टी के बर्तन, खपरैलों के टुकड़े, मूर्तियों के भग्नावशेष मणि जैसी विभिन्न वस्तुएँ उत्खनन में साथ लगती है। उन पर वैज्ञानिक प्रक्रिया कर पता किया जाता है कि ये किस कालखंड की हो सकती हैं, उनका उपयोग किस बात के लिए किया जाता होगा, इसी तरह की वस्तुएँ क्या अन्य भी पाई जाती हैं, इन प्रश्नों के उत्तर वैज्ञानिक ढंग से खोज कर प्राचीन काल के मानव जीवन का चित्र रेखांकित करने में सहायता मिलती है। इसी तरह मंदिर प्राचीन इमारतें, गुफाएँ, स्तूप, गढ़ियाँ आदि भूस्तर पर ध्वस्त अवशेषों का अध्ययन भी इस शाख की कक्षा में आता है। इससे पूर्वकालीन जीवनशैली की जानकारी मिलती है।









ब्रिटिश शासकों ने भारत की प्राचीन सभ्यता की खोज करने के लिए 1861 ई. में अलेक्जेंडर कनियम नामक पुरातत्वविद की नियुक्ति की थी और बाद में इस कार्य में गति लाने के लिए लॉर्ड कर्जन के शासन काल में एक स्वतंत्र विभाग स्थापित किया गया। इस दृष्टि से प्राचीन भारतीय सभ्यता की खोज का श्रेय ब्रिटिश शासकों को देना होगा। सिंधु सभ्यता पर प्रकाश डालने का मौलिक कार्य सर जॉन मार्शल एवं डॉ. राखालदास बॅनर्जी ने किया। बीसवीं सदी में पुरातत्वविदों की पौढ़ी यहाँ तैयार हुई केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर पुरातत्व विभाग कार्यरत है तथा प्रागैतिहासिक काल के मानव जीवन की खोज की जा रही है। शासकीय पुरातत्व विभाग जैसा ही मूल्यवान कार्य डेक्कन कॉलेज, पुणे का पुरातत्व विभाग एवं सागर विश्वविद्यालय का प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग कर रहा है। वर्तमान में समुद्री पुरातत्व (Navel archeology) का भी अध्ययन हो रहा है। अनेक स्थानों पर समुद्र तल में स्थित पुरावशेषों की खोज करने के प्रयास चल रहे हैं। इसी से द्वारिका की खोज हुई है। पुरातत्ववेत्ता पुरातन अवशेषों का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए हवाई छायाचित्रण (Aerial Photography) जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग कर रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि पुरातत्व के बिना इतिहास का सम्यक् ज्ञान संभव ही नहीं है।