इतिहास और अर्थशास्त्र - History and economics
इतिहास और अर्थशास्त्र - History and economics
आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य की जिस प्रकार से भौतिक प्रगति हुई है तथा मानवीय आवश्यकताओं में निरंतर उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, उसके परिणामस्वरूप आर्थिक अध्ययन एक आवश्यकता बन चुका है। सामाजिक विज्ञान के सभी क्षेत्रों में अर्थशास्त्र ही एक ऐसा विज्ञान है जिसकी गणना सामाजिक कल्याण (Social Welfare) व मानवीय प्रगति के लिए अग्रिम श्रेणी में की जाती है।
वास्तविकता तो यह है कि आज की दुनिया की संपूर्ण आर्थिक सरचना (Economic Structure) केवल आर्थिक धुरी के ऊपर विद्यमान है। यदि किसी भी समस्या का गहराई से विश्लेषण किया जाए तो आज की दुनिया में प्रत्येक समस्या के जड़ में आर्थिक कारण ही विद्यमान है। चाहे वह समस्या श्रम और पूंजी के विवाद के रूप में हो, चाहे साम्राज्यवाद और स्वतंत्रता की लड़ाई हो अथवा मनुष्य के प्रादुर्भाव के साथ ही इतिहास का आरंभ हो जाता है। आदि मानव ने अपनी जीविका को चलाने के लिए जैसे जैसे साधनों के खोज में प्रगति की इसके परिणामस्वरूप इतिहास को भी गति, दिशा एवं अर्थ मिलता गया। उस समय आजीविका के साधन ही अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे। समाज की अर्थव्यवस्था ही प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक इतिहास की प्रमुख विषयवस्तु रही है।
पाषाणकालीन मानव की आजीविका का प्रमुख स्रोत आखेट एवं खाद्य संग्रह था। सिंधु घाटी की सभ्यता में विभिन्न स्थलों पर हुए उत्खनन से हमें पता चलता है कि इस सभ्यता की अर्थव्यवस्था व्यापार प्रधान थी।
ऋग्वैदिक काल में कृषि एवं पशुपालन ही स्था के प्रमुख आधार माने गए ह कह सकते हैं कि, इतिहास एवं अर्थशास्त्र की विषयवस्तु में एकरूपता है क्योंकि इतिहास के अध्ययन में की प्रमुखको उपेक्षित नहीं किया जा सकता। उदाहरणार्थ मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अलाउद्दीन खलजी की बाजार व्यवस्था एवं उसके आर्थिक सुधारों को अनदेखा नहीं कर सकते। कुछ प्रमुख इतिहासकार व अर्थशास्त्रियों की कृतियों का अध्ययन आधुनिक भारतीय इतिहास को भली भाँति समझने के लिए आवश्यक है, जैसे दादाभाई नौरोजी द्वारा लिखित पुस्तक (Poverty and Un-British rule in India ) एवं आरसी, दत्त कृति (Economic History of India in the Victorian Age) का अध्ययन अति आवश्यक है। इसी प्रकार आधुनिक भारतीय इतिहास को समझने के लिए एम. जी. रानाडे एवं दिनशाबाचा के आर्थिक विचार भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
1929-30 ई. में आई विश्वव्यापी आर्थिक मंदी आज भी इतिहासकारों के अध्ययन की विषयवस्तु है। इसी प्रकार अर्थशास्त्र में भी 1929-30 में आई आर्थिक मंदी के कारणों का अध्ययन विश्लेषण किया जाता है। अतः उपरोक्त विश्लेषण के परिणामस्वरूप हम प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्शल के शब्दों में कह सकते के साधारण व्यापार में मनुष्य का अध्ययन है। यह व्यक्तिगत और सामाजिक कार्यों के उस भाग का परीक्षण करता है, जिनका भौतिक पदार्थों की प्राप्ति एवं उनके प्रयोग के साथ अत्यंत पनिष्ठ संबंध है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास तथा अर्थशास्त्र में वैसी ही निकटता है जैसा कि इतिहास और राजनीति में दोनों के अध्ययन का विषय मनुष्य व्यवहार ही है। दोनों में भिन्नता केवल इस बात की है कि अर्थशास्त्र में जहां इसके निर्णय विधायक पक्ष) का अध्ययन किया जाता है, वहीं इतिहास इसके उन्नति विधायक (Progress Moping) पहलू का अध्ययन करता है। इसके अतिरिक्त कुछ विषयों में दोनों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ आर्थिक इतिहास एक ऐसा विषय है जिसका अध्ययन इतिहास में तथा विशेष अध्ययन अर्थशास्त्र में किया जाता है।
दोनों की पारस्परिक निर्भरता के संबंध में सर जॉन सीले (John Seeley) महोदय का निम्नलिखित कथन सही प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र के बिना इतिहास नाँव रहित हैं।
समान उद्देश्य
उद्देश्य की दृष्टि से भी इतिहास और अर्थशास्त्र का सहसंबंध सिद्ध होता है इतिहास का उद्देश्य सामाजिक कल्याण है। इतिहास के अध्ययन में हम अपने अतीत की घटनाओं का अध्ययन करके एवं उनका विश्लेषण कर वर्तमान को सुखी बना सकते हैं तथा अतीत की भूलों को न दोहराकर भविष्य के लिए कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त कर हम सामाजिक कल्याण की ओर अग्रसर होते हैं। इसी प्रकार अर्थशास्त्र का उद्देश्य आर्थिक कल्याण करना है।
मार्शल के मतानुसार “अर्थशास्त्री के सम्मुख जो नैतिक मान्यता सदैव रहनी चाहिए वह यह है कि उत्पादन तथा मौद्रिक व्यवस्थाएं दोनों ही इस प्रकार से संगठित की जाए ताकि एक सुसंस्कृत व उत्कृष्ट जीवन के लिए भौतिक साधन उपलब्ध हो सकें राज्य की नीति आर्थिक अवस्थाओं पर निर्भर उदाहरण स्वरूप अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसके लिए उसे भारी संख्या में सैनिकों की भर्ती की आवश्यकता पड़ी। किंतु उसके इस कदम से राज्य पर आर्थिक दबाव पड़ता, क्योंकि इतने सारे सैनिकों को पारिश्रमिक देना पड़ता। अतः उसने इस समय एक अर्थशास्त्री की भाँति सोचते हुए अपने साम्राज्य विस्तार की नीति के लिए वस्तुओं के मूल्यों को नियंत्रित किया, अर्थात् कम कर दिया, ताकि सैनिकों को पारिश्रमिक देने का अतिरिक आर्थिक भार राज्य पर न पड़े 18वीं सदी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रांति हुई उसके परिणामस्वरूप ही इन देशों ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की नीति अपनाई।
ऐतिहासिक घटनाएँ आर्थिक गतिविधियों का परिणाम अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही पटित हुई है। स्पेन की गणतंत्रीय सरकार ने श्रमिक वर्ग के हित में 1935 ई. में जब कानून बनाने का प्रयत्न किया तो सामंत वर्ग, वर्च के पादरी ओर सेना ने जनरल फ्रेंको के नेतृत्व में संगठित होकर गणतीय सरकार का तख्ता पलट दिया। इसी प्रकार 1930 ई. की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के परिणामस्वरूप हिटलर का उदय तथा द्वितीय विश्वयुद्ध की भूमिका तैयार हुई समाजवाद, उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद जैसी विचारधाराओं की उत्पत्ति के मूल में प्रमुख कारण आर्थिक गतिविधियों हो रही हैं।
इतिहास की अर्थशास्त्र को देन
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक की व्यवस्था अथवा आर्थिक नीतियों का अवलोकन हम इतिहास के अंतर्गत करते हैं। वर्तमान के अर्थशास्त्रों इन अध्ययनों का लाभ उठाकर वर्तमान अर्थशास्त्र संबंधी नीतियों का निर्धारण करते हैं। ऐतिहासिक अर्थव्यवस्थाओं का ज हमारे आर्थिक नियोजन का प्रमुख आधार बन गया है। रूस की क्रांति 1917 ई. के पश्चात् वहाँ पर अपनाई गई आर्थिक नियोजन प्रणाली से प्रेरणा लेकर भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का प्रारंभ किया गया।
अर्थशास्त्र की इतिहास को देन
कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र को इतिहास की आधारशिला माना है। उनके शब्दों में इतिहास की व्याख्या केवल आर्थिक घटनाओं के माध्यम से की जा सकती है। किसी भी शासन व्यवस्था के संबंध में सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए, यह सदैव आवश्यक है कि देश की तत्कालीन आर्थिक घटनाओं और दशाओं का ज्ञान हो।"
इतिहास की दिशा एवं गति को प्रभावित करने में अर्थव्यवस्था की भूमिका को देखते हुए वर्तमान में आर्थिक इतिहास के लेखन पर विशेष बल दिया जा रहा है। अर्थशास्त्र में भी आर्थिक विचारों का इतिहास और विभिन्न देशों के आर्थिक इतिहास का अध्ययन किया जाने लगा है। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि इतिहास तथा अर्थशास्त्र एक-दूसरे से पनिष्ठ रूप से सह हैं। अर्थशास्त्र के सही मूल्यांकन के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है तथा इतिहास के सही मूल्यांकन के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान आवश्यक है। वर्तमान में अंत: अनुशासनात्मक आगम (Interdisciplinary approach) के तहत एक अर्थशास्त्री आज इतिहास का अवलोकन कर अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकता है। वास्तव में वे दोनों विषय एक-दूसरे के पूरक है। फलस्वरूप इन दोनों के संबंध में यह कथन सही होता है कि अर्थशास्त्र के बिना इतिहास नाव रहित है और इतिहास बिना अर्थशास्त्र फलविहीन है।"
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