इतिहास और पुरालेखशास्त्र - History and Epigraphy

इतिहास और पुरालेखशास्त्र - History and Epigraphy

इतिहास और पुरालेखशास्त्र - History and Epigraphy

अभिलेख पुरालेख एवं ताम्रपत्र इतिहास निर्माण के लिए अत्यंत उपयुक्त एवं विश्वसनीय साधन माने जाते हैं। प्राचीनकाल में महत्वपूर्ण घटनाएँ अभिलेखों में उत्कीर्ण की जाती थीं। वे लेख संक्षेप में होने के बावजूद उन पर दर्ज सूचनाएँ स्पष्ट रूप से एवं निःसंदिग्ध तरीके से तथा बिना किसी काठपीट के होती हैं। उन पर घटना के साथ काल भी दर्ज होता था। अतः यह प्रमाण समकालीन होने से अत्यंत विश्वसनीय माना जाता है। किंतु अभिलेखों के निर्माण के लिए लिपि का ज्ञान होना अति आवश्यक था अतः संक्षेप में पुरालिपि शास्त्र पर विचार करना उचित होगा।





पुरालिपि शास्त्र बड़ा ही हृदयग्राही और शिक्षाप्रद विषय है। यह लेखन कला का अध्यकर्ता है।। सभ्यता की प्रगति में लेखन कला मनुष्य को पशु से अलग करती है। यही मनुष्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जातीय धरोहर के परिरक्षण, संवर्द्धन और संप्रेषण का साधन देता है। यह उन महत्वपूर्ण आविष्कारों में से है जिससे मानव नियंति का निर्माण हुआ है क्योंकि संस्कृति के विस्तार और ज्ञान के प्रसार का यह सबसे स्थायी साधन सिद्ध हुई है। ज्ञान की साधना के क्रम में मानवीय प्रयास के सही मूल्यांकन के लिए इस कला की उत्पत्ति और विकास का इतिहास जानना चांछनीय है।






भारत में पाए गए, प्राचीन लेखन के सभी अवशेष पत्थर पर है। प्राचीन ब्राह्मण साहित्य और ग्रंथ पत्रों, छाल तथा बाद में हाथ से बनाए गए कागज पर लिखे जाते थे। इस प्रकार के अस्थिर और नर पदार्थों की रक्षा सुदीर्घ काल तक नहीं की जा सकती। पुरानी हस्तलिखित प्रतियाँ कुछ समय बाद नष्ट हो आती थी और नई पीढ़ी के लिए उनकी प्रतिलिपि कर ली जाती थी। इस प्रकार लिपि भी समयानुसार बदलती रहती थी।


इस प्रकार देश की परम्पराएँ, विदेशी लेखकों के साक्ष्य साहित्यिक प्रमाण तथा अवशिष्ट लेख सभी भारत में लेखन की अति प्राचीनता को सिद्ध करते हैं। यह प्राचीनता ईसा पूर्व की चोधी सहस्राब्दी तक जाती है। प्राचीनतम भारतीय लेखन के उदाहरण सुमेर मिस्र और एलाम के उदाहरणों के समकालीन ठहरते हैं।


लेखन के लिए सामग्री का चुनाव दो बातों पर निर्भर था (1) देश के विभिन्न भागों में उपयुक्त सामग्री की सुलभता, यद्यपि जब एक सामग्री देश के एक भाग में प्रचलित हो जाती है तो वह भागों में पहुंच ही जाती है तथा (2) अभिलेखों की प्रकृति उदाहरणार्थ लंबी-लंबी पुस्तकें तथा साधारण पत्र लचीले कोमल तथा शीघ्र नष्ट होने वाली सामग्री पर तथा धार्मिक अनुशासन राजाओं की प्रशस्तियाँ, व्यावहारिक लेख इत्यादि पत्थर, ताँबा, लोहा, चाँदी जैसी चिरस्थायी वस्तुओं पर उत्कीर्ण किए जाते थे। ये सामग्रियाँ उपयुक्त विवरण के साथ नीचे निर्दिष्ट की गई है।






सामान्य रूप से अभिलेखों के दो प्रकार थे (1) राजकीय या आधिकारिक (2) लौकिक या व्यक्तिगत प्राचीन भारतीय अभिलेखों का वर्गीकरण इन शीर्षकों के अंतर्गत हो सकता है। बाद के धर्मशास्त्र ग्रंथ भी इस वर्गीकरण को पुष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए स्मृतिचन्द्रिका में उद्धृत बसिष्ठ कहते हैं 'लेख दो प्रकार के हैं, लौकिक (लोगों के) और राजकीय (राजाओं के संग्रहकार के रूप में उद्धृत कुछ लेखकों का वसिष्ठ से मतैक्य है, वे दो भागों में लेखों (अभिलेखों को विभाजित करते हैं (1) राजकीय और जनपदीय (जनपद संबंधी राजकीय लेख या तो स्वयं राजाओं द्वारा या उनके सामतों प्रांतीय शासको तथा उच्च मंत्रियों द्वारा लिखवाए जाते थे जिन्हें ऐसा करने का अधिकार था। लौकिक लेखों के लिए जनसाधारण उत्तरदायी थे। यद्यपि अनेक अंशों में वे राजकीय लेखों का अनुसरण करते थे। राजकीय लेख पुनः चार भागों में विभाजित किए जाते थे।


(1) शासन (मध्यकाल में भूमिदानपत्र के अर्थ में इसका प्रयोग होता था)


(2) जयपत्र व्यावहारिक निर्णय)


(3) आदेश


(4) प्रज्ञापन पत्र (घोषणा)


अशोक का कलिंग शिलालेख कलिंग युद्ध की जानकारी देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। इस तरह उत्कीर्ण लेख स्तंभाँ, किलों, मंदिरों आदि पर मिलते हैं। ताम्रपत्र अर्थात् ताँबे के पतरे पर लिखा गया लेख, मुख्य रूप से आज्ञापत्र, वचनपत्र, दानपत्र के रूप में होता है। कभी-कभी उन पर घटनाएँ भी दर्ज होती हैं।








इन शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण शब्द ब्राह्मी, खरोष्टी जैसी प्राचीन लिपियों में होते हैं। इन लिपियों की जानकारी के बिना उनका अर्थ स्पष्ट नहीं होता। ब्राह्मी लिपि का स्पष्टीकरण इंग्लिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन काल में ब्रिटिश अधिकारी जेम्स प्रिन्सेप नामक अभिलेखशास्त्री ने परिश्रमपूर्वक किया। उसने और उसके बाद आए विशेषज्ञों ने अनेक अभिलेखों एवं ताम्रपत्रों का अर्थ स्पष्ट किया। मध्ययुगीन भारत के कुछ उत्कीर्ण लेख पर्शियन भाषा में भी मिलते हैं। आज भी किसी इमारत का शिलान्यास करते समय अथवा किसी परियोजना की बुनियाद रखते समय अथवा उद्घाटन करते समय संगमरमर पर उस प्रसंग की तिथि की और किसके हाथों शिलान्यास हुआ इसकी स्पष्ट जानकारी दर्ज होती है। कल के इतिहास लेखन के लिए यह नि.संदिग्ध प्रमाण है। भारत में बड़े पैमाने पर इस तरह के उत्कीर्ण लेख प्राप्त हुए हैं एवं उन्हें एकत्रित तथा संकलित करने का कार्य पुरातत्वविदों में किया है।






पत्थर और तांबे पर के जो प्राचीनतम अभिलेख प्राप्त हुए हैं वे स्वाभाविक और सरल है। उनमें कोई नियमबद्ध वाक्यपद्धति, शैली स्वरूप या विषय नहीं था। कालांतर में भारतीय लिपि विज्ञान द्वारा कपितय सिद्धांतों का विकास हुआ जिससे उसका स्वरूप और विषय नियंत्रित होता था। लेखकों और खोदने वालों ने साधारणतः इस प्रकार से विकसित सिद्धांतों का अनुसरण किया। इस विकास का कारण साहित्यिक, धार्मिक और व्यावहारिक आवश्यकताएँ थी। अतः स्पष्ट है कि इतिहास एवं अभिलेखशास्त्र एक ही सिक्के के दो पहलू