इतिहास और प्रतिमाशास्त्र - History and iconography

इतिहास और प्रतिमाशास्त्र - History and iconography

इतिहास और प्रतिमाशास्त्र - History and iconography


प्रतिमाशास्त्र द्वारा प्राचीन भारतीय धार्मिक स्थिति एवं कला पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। भारत का प्राण धर्म ही है। अतएव साहित्यिक रचना में धार्मिक चर्चा की उपलब्धि स्वाभाविक है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के धार्मिक इतिहास को जानने में प्रतिभाशास्त्र का विशेष योगदान है। मठ अथवा मंदिरों के समस्त विषयों की चर्चा करें तो उससे किसी भी प्रतिमा के लक्षण का परिज्ञान हो जाता है। प्राचीन साहित्य की कई रचनाओं के रचयिता ऋषि कहे गए हैं। उन रचनाओं में प्रतिमा लक्षण की चर्चा है। अतएव ऋषियों को मूर्तिशास्त्र का जन्मदाता कह सकते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कला एवं धर्म का शोधपरक अध्ययन के लिए प्रतिमाशास्त्र का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए प्रतिमाशास्त्र को इतिहास का सहायक विषय कहा जाता है।








प्रतिमाशास्त्र की जानकारी पुराणों आगम तथा तंत्र साहित्य में हो जाती है। पुराणों में मत्स्यपुराण के अंतर्गत मूर्तिविज्ञान की विस्तृत चर्चा की गई है। इसके दस अध्यायों में मूर्तियों की बनावट एवं माप आदि का वर्णन है। मूलतः यह सत्य है कि मूर्ति से पूर्व प्रतीक का पूजन होता था, जैसे शालिग्राम, शिवलिंग आदि मत्स्यपुराण में शिव के मनुष्याकार प्रतिमा संबंधी विवरण प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया गया है। अग्निपुराण का विस्तृत वर्णन भी पठनीय है। कुल सोलह अध्यायों में तेरह अध्याय प्रतिमा निर्माण की चर्चा करते हैं। इसमें वैष्णव एवं शैव मूर्तियों के अतिरिक्त सूर्य तथा देवियों की प्रतिमा-संबंधी विवरण मिलता है। इस प्रसंग में विष्णुधर्मोत्तर पुराण द्वारा विश्लेषणात्मक से विस्तारपूर्वक बहुत ही सुंदर रीति से प्रतिमा निर्माण पर प्रकाश डाला गया है।





प्रसिद्ध विद्वान श्री गोपीनाथ राव ने आगम साहित्य का सविस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। पुराणों के सदृश इस ग्रंथसमूह में वास्तु एवं दक्षण कला का वर्णन है। भारतीय संस्कृति में दो स्वरूप से पूजा का विधान है। वैदिकी तथा तांत्रिकी प्रथम प्रकार में यश तथा अग्नि में हवन की परिपाटी है तथा तांत्रिकी से में यंत्र का पूजन तथा मंत्र उच्चारण होता है। तंत्र शब्द शास्त्र का भी बोधक है, अतः वैष्णव, शैव तथा शक्ति तंत्र का उल्लेख मिलता है। [वैष्णव मत का संकलन पंचरात्र संहिता में तथा शैव उपदेशों का संग्रह आगम में मिलता है। कालांतर में तंत्र का सीधा संबंध शक्तिमत से मान लिया गया। तंत्र साहित्य भी प्रतिमा निर्माण का एक प्रधान स्रोत है जिसका समुचित अध्ययन न हो पाया है। तंत्र साहित्य भी लंबाचीदा है। उनका अनुशीलन ब्राह्मण देवी देवता की प्रतिमा पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्रतिमाशास्त्र, इतिहास का सहायक विषय है एवं दोनों आपस में घनिष्ठ रूप से संबंधित है।