इतिहास और मुद्राशास्त्र- history and numismatics

इतिहास और मुद्राशास्त्र- history and numismatics

इतिहास और मुद्राशास्त्र- history and numismatics

भारतीय इतिहास में सिक्कों का महत्वपूर्ण स्थान है। सिक्कों पर अंकित लेखों से ही भारतीय लिपि का ज्ञान प्राप्त हुआ। यद्यपि शिताओं तथा स्तंभों पर अशोक की प्रशस्तियाँ खुद भी, परंतु उसे किसी को कुछ पता न चल सका। सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर प्रांत से प्राप्त सिक्कों पर क्रमशः यूनानी तथा खरोष्ठी लिपि थी। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने यूनानी लिपि के आधार पर खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला तैयार की। जिन सिक्कों पर एक और खरोष्ठी लिपि तथा दूसरी ओर ब्राह्मी लिपि पाई गई, उसके सहारे खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला के आधार पर ब्राह्मी लिपि का ज्ञान हो गया। इसका मूल कारण यह था कि दोनों लिपियों में एक ही बात लिखी गई थी। राजा के नाम तथा उपाधि एक से थे अतः खरोष्ठी लिपि को जानकर ब्राह्मी लिपि के अक्षरों का पता लगाना सरल हो गया। यदि सिक्कों पर लेख न खुदे रहते तो शायद भारतीय लिपियों का ज्ञान असंभव था।









पूर्वकालीन घटनाओं पर प्रकाश डालने के लिए मुद्राशास्त्र का उपयोग होता है। प्राचीन एवं मध्यकाल में राज्यारोहण, युद्ध विजय जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों पर नई मुद्राएँ ढाली जाती थीं। उन पर कभी कुछ शब्द अथवा प्रतिमा उत्कीर्ण होती थी। इससे उस काल की लिपि तथा धार्मिक संकल्पनाओं की जानकारी मिलती है। इसी तरह मुद्रा के लिए प्रत्युक्त धातु से तत्कालीन आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। संपन्नता के काल में सोने-चांदी के सिक्के डाले जाते थे। कम मूल्य की मुद्राएँ तांबे की हुआ करती थी। इसी तरह भारत में मिले यूनानी सिक्कों से सातवाहन काल में भारत का विदेशों से व्यापार का पता चलता है। पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त गुप्त काल तथा मुगल काल में प्रचलित स्वर्ग एवं रजत मुद्राएँ तत्कालीन आर्थिक प्रगति तथा संपन्नता की सूचक हैं।






भारतवर्ष में विभिन्न वंश के शासकों ने राजकीय सिक्के तैयार कराण शासकों ने अपने विचारधारा के अनुकूल सिक्कों पर चित्र आदि अंकित करवाए तथा धर्म विश्वास के अनुसार देवी या देवता को उस पर स्थान दिया। सिक्कों तथा मुहरों पर अंकित पशु पक्षी अथवा देवता की आकृति से उस शासक की धार्मिक भावनाएँ ज्ञात हो जाती है।


इस तथ्य में कोई संशय नहीं है कि इतिहासर निर्माण में सिक्के कितने सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त सिक्कों के अध्ययन से विभिन्न काल में भारत में प्रचलित धार्मिक मतों का परिचय भी मिलता है। ये तत्कालीन धार्मिक संप्रदाय तथा राजधर्म की ओर संकेत करते हैं। सिक्कों पर अंकित चित्र (चिह्न) तथा खुदे हुए लेखों से उस काल में प्रचलित धार्मिक मत के विषय में अनेक बात कही जा सकती है। भारत के सबसे प्राचीन सिक्कों (कार्यापण) पर जो चिह्न रहे हैं वे सब किसी न किसी उस राजवंश, स्थान, श्रेणी (संघ) अथवा सुनार से संबंध रखते हैं जिन्होंने मुद्राओं का निर्माण किया था। उन चिह्नों से धर्म की कोई निश्चित बातें नहीं कहीं जा सकती किंतु चक्र से सूर्य वृषभ से शैवमत एवं स्वस्तिक से ब्राह्मण धर्म का अनुमान लगाया जा सकता है। सिक्कों के अध्ययन से इतिहास तथा धर्म-संबंधी तथ्यों की चर्चा की जा चुकी है। इनसे कुछ ऐसे तथ्यों का पता लगता है जो साधारणतया मालूम नहीं होते, परंतु सूक्ष्म रूप से विचार करने पर प्रकट हो जाते हैं। इसका ज्ञान हो जाना चाहिए कि सिक्के किस अवसर पर तैयार किए गए थे। कार्यापण पर जो चिह्न मिलते हैं, उनका संबंध स्थान तथा श्रेणी विशेष से था। उन्हीं सिक्कों पर मेरु पर्वत का चिह्न मुद्रा के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। यह एक प्रकार से सिद्ध हो चुका है कि 'मेरु पर्वत मौर्यवंश का राज्य चिह्न था। इसको उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के शासकों ने भी अपनाया। पश्चिम भारत के शक राजाओं ने मेरु पर्वत को मध्य में रखकर सूर्य तथा चन्द्र से सीमित कर दिया। इस छो तक यह चिह्न विभिन्न राजवंशों के सिक्कों पर स्थान पाता रहा। अतः इन विवरणों से भली भांति यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राशास्त्र इतिहास का सहायकशास्त्र है एवं दोनों पनिष्ठ रूप से संबंधित है।