इतिहास और समाजशास्त्र - History and sociology
इतिहास और समाजशास्त्र - History and sociology
मानवविज्ञान में सामाजिक मानवविज्ञान जिस प्रकार से इतिहास से सहसंबंधित है ठीक उसी प्रकार समाजशास्त्र भी इतिहास से घनिष्ठ रूप से सहसंबंधित है। 20 वीं सदी में अधिकांश इतिहासकारों ने सामाजिक इतिहास की ओर विशेष ध्यान देना आरंभ किया है। यद्यपि इतिहास में मानवीय कार्य व्यापार का अध्ययन किया जाता है तथापि इतिहास का विकास व्यक्तियों तथा राष्ट्रों से नहीं, बल्कि विभिन्न युगीन समाजों से हुआ है। अतः इतिहास की प्रमुख आधारशिला समाज को ही माना जाता है। ट्रेवेलियन महोदय के अनुसार सामाजिक इतिहास के तहत अतीत में मनुष्यों के दैनिक जीवन परिवार का स्वरूप, आर्थिक सहसंबंध गृहस्थ जीवन, श्रमिकों की दशा, सांस्कृतिक जीवन प्रकृति के प्रति मानवीय दृष्टिकोण, सामान्य परिस्थितियों में उत्पन्न धर्म, साहित्य, संगीत, शिक्षा एवं साहित्य का अध्ययन किया जाता है।
इस प्रकार सामाजिक इतिहास को अत्यधिक लोकप्रिय बनाने का श्रेय ट्रेवेलियन महोदय को जाता है। ट्रेवेलियन महोदय द्वारा सामाजिक इतिहास की यह परिभाषा समाजशास्त्र की भी परिभाषा प्रतीत होती है। समाजशास्त्र में भी एक सामाजिक प्राणी के रूप में मानव का उसके समाज के साथ अंतसंबधों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः समाजशास्त्र का विकास सामाजिक इतिहास के परिवेश में हुआ है। सामाजिक विकास तथा परिवर्तन की गतियों का अध्ययन समाजशास्त्र के माध्यम से प्रारंभ हुआ है।
काम्टे (Comte) महोदय के अनुसार "इतिहास सामाजिक भौतिकशास्त्र है, जिसके तहत मानवीय व्यवहार के सामान्य नियमों का अध्ययन किया जाता है। मानवीय व्यवहार के सामान्य नियमों का अध्ययन एक समाजशास्त्री भी समाजशास्त्र के तहत करता है। अतः मानव मानव का सामाजिक व्यवहार एवं उसके सामाजिक क्रियाकलाप आदि सभी इतिहास के साथ-साथ समाजशास्त्र के अध्ययन की भी मुख्य विषय वस्तु हैं। इस दृष्टि से इतिहास एवं समाजशास्त्र एक दूसरे से संबद्ध प्रतीत होते हैं।
1870 ई. से व प्रथम विश्व युद्ध के वर्षों से ही सामाजिक विज्ञान के विषयों का आरंभ होता है। ये इस विश्वास पर आधारित हैं कि मानव जीवन की व्याख्या निवैयक्तिक और व्यवस्थित प्रणाली से की जा सकती है। मैक्स वेबर महोदय का मानना है कि यदि मनुष्य का संपूर्ण रूप में सरलता से अध्ययन नहीं किया जा सकता तो मानव अस्तित्व के विभिन्न वर्गों सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक पक्ष को समष्टि से निकालकर अलग-अलग समझा जा सकता है। वेबर महोदय की प्रमुख रुचि समाजशास्त्र में थी, जिसमें मनुष्य का सामाजिक जीवन के रूप में अध्ययन किया जाता है। यह मनुष्य को उसके सामाजिक अस्तित्व तथा उसकी संपूर्ण अंतसंबंद्धता में समझने के प्रयास के रूप में इतिहास के सबसे निकट है।
टायन्त्री महोदय के अनुसार भी इतिहास का निर्माण सामाजिक अणुतत्वों से हुआ है। महोदव ने भी मनुष्य की परिभाषा वर्ग संघर्ष के आधार पर की और यह दावा किया कि मनुष्य वर्ग के सदस्य की तरह सामूहिक रूप से कार्य करते हैं और उनके समान मूल्य होते हैं। फ्रँक वैन आल्स्ट महोदय ने मार्क्स की उक्त परिभाषा के संदर्भ में लिखा है "मनुष्य का समाज के सदस्य के रूप में अध्ययन का यह प्रयास एक सीमा तक इतिहासकार भी करते हैं। इसी सादृश्य के कारण इतिहास और समाजशास्त्र एक दूसरे का अतिव्यापन करते हुए दृष्टिगत होते हैं और वस्तुतः जर्मनी में इतिहास ही समाजशास्त्र बन जाता
वर्तमान में इतिहासकार अतीत के समाज को एक समाजशास्त्री की भाँति समग्र रूप में समझने का प्रयास करते हैं, ताकि आधुनिक समाज के व्यवहार को भी अतीत के परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके। पालवर्थ महोदय के अनुसार संस्कृति और संस्थाओं का इतिहास समाजशास्त्र को समझने और उसकी सामग्री जुटाने में सहायक होता है। आर्नाल्ड टायन्बी (Amold Toynbe) ने सामाजिक अणुतत्वों से इतिहास का निर्माण तो माना ही है, साथ ही अपनी सर्वप्रसिद्ध कृति 'ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री' में सभ्यता को ऐतिहासिक अध्ययन की प्रमुख इकाई माना है।
विभिन्न सभ्यताओं के उत्थान एवं पतन में एक इतिहासकार जब राजनैतिक एवं आर्थिक कारकों के अलावा सामाजिक कारकों का अध्ययन करता है तो उसे समाजशास्त्रियों के तत्संबंधी निष्कर्षों से विशेष लाभ मिलता है, क्योंकि सभ्यताओं के उत्थान व पतन का मूल्यांकन एक समाजशास्त्री द्वारा बेहतर ढंग से किया जा सकता है। वर्तमान में एक इतिहासकार अंत: अनुशासनात्मक उपागम (Interdisciplinary Approach) के तहत बेहतर परिणाम पाने के लिए अपने ऐतिहासिक अध्ययन में सामाजिक संगठन के सिद्धांत पर समाजशास्त्रियों के निष्कर्षों का लाभ उठाते हुए अपनी सामग्री को संयोजित करता है। यही नहीं, समाजशास्त्री भी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न सामाजिक अंतर्संबंधों को समझने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार इतिहास और समाजशास्त्र एक दूसरे से घनिष्ठतः सहसंबंधित प्रतीत होते हैं।
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