सुल्तान के रूप में अलाउद्दीन का इतिहास - History of Alauddin as Sultan

सुल्तान के रूप में अलाउद्दीन का इतिहास - History of Alauddin as Sultan

 सुल्तान के रूप में अलाउद्दीन का इतिहास - History of Alauddin as Sultan

सुल्तान के रूप में अलाउद्दीन

भिलसा तथा देवगिरि के अभियानों के बाद अलाउद्दीन का अगला अभियान दिल्ली का तख्त हासिल करना था। बूढे और शिथिल सुल्तान के प्रति बढ़ते हुए असन्तोष से दिल्ली के तख्त तक पहुंचने की उसकी राह आसान होती जा रही थी। अलाउद्दीन के प्रति अनुरक्त सुल्तान को अहमद चप ने उसके गुपचुप देवगिरि अभियान का हवाला देकर उससे सावधान रहने की सलाह भी दी थी पर सुल्तान का अपने भतीजे की वफादारी पर भरोसा ज्यों का त्यों बना रहा। अपने भाई अलमास बेग के माध्यम से अलाउद्दीन ने सुल्तान से देवगिरि अभियान गुप्त रखने की क्षमा मांगी और उसे कड़ा आने का निमन्त्रण दिया जिसे उसने स्वीकार कर लिया। कड़ा में सुल्तान को देवगिरि की लूट सौंपे जाने का वादा किया गया था।

अलमास बेग ने सुल्तान को इस बात के लिए भी राजी कर लिया कि वह मानिकपुर में अलाउद्दीन से बिना अपने सैनिकों को साथ लिए बिना अकेला मिलें। दूसरी ओर अलाउद्दीन सुल्तान का विधिवत स्वागत करने के बहाने अपनी सेना के साथ था। सुल्तान से मिलते ही अलाउद्दीन के अधिकारियों, मुहम्मद सलीम और इख्तियारुद्दीन हुद ने सुल्तान पर हमला कर दिया। सुल्तान अपने सभी अनुचरों के साथ मारा गया। दिल्ली में 22 अक्टूबर, 1296 को बलबन के लालमहल में अलाउद्दीन की विधिवत ताजपोशी हुई।

 




अलाउद्दीन का राजत्व का सिद्धान्त

अलाउद्दीन छल-कपट, विद्रोह, तलवार और सोने के बल पर सुल्तान बना था। उसको अमीरों का समर्थन दौलत के बल पर खरीदना पड़ा था और प्रजा को उसने तलवार के जोर पर अपना सुल्तान मानने के लिए विवश किया था। अलाउद्दीन की ताजपोशी को उलेमा वर्ग का समर्थन भी प्राप्त नहीं था। इन परिस्थितियों में उसका अस्तित्व सदैव खतरे में था।

अलाउद्दीन ने बलबन के राजत्व के दैविक सिद्धान्त का पोषण किया। उसने शासक को ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित किया। अलाउद्दीन ने अमीरों की शक्ति व प्रतिष्ठा में कमी की। उसने जलाली अमीरों का पूर्णतया दमन कर दिया और अपने वफादार अमीरों की शक्तियों को भी नियन्त्रित किया गुप्तचरों का जाल बिछाकर अमीरों के आपस में मिलने-जुलने, वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने आदि पर उसने राज्य का नियन्त्रण स्थापित किया। विद्रोह व षडयन्त्र करने वालों का समूल विनाश कर उसने सभी को भविष्य में विद्रोह करने का दुःसाहस करने से रोक दिया। अलाउद्दीन ने उलेमा वर्ग की भी उपेक्षा की।

अलाउद्दीन चूंकि शासक को ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था इसलिए धर्म के नाम पर उलेमा वर्ग द्वारा राजकाज में हस्तक्षेप करना उसे स्वीकार्य नहीं था। उसने राज्य पर से धर्म का नियन्त्रण हटा दिया। अलाउद्दीन ने खलीफ़ा से खिलअल अथवा उपाधि प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया।





अलाउद्दीन की बाज़ार नियन्त्रण की नीति

बाज़ार नियन्त्रण की नीति लागू करने का कारण

खैरुल मजालिस के लेखक शेख नासिरुद्दीन ने अलाउद्दीन की बाजार नियन्त्रण की नीति को जन-कल्याण हेतु उठाया गया कदम बताया है। परन्तु इस दावे में सत्य का लेशमात्र भी नहीं है। तत्कालीन राजनीतिक अस्थिरता, मुद्रा अवमूल्यन, शाही खजाने में धन की कमी के बावजूद सैनिक खर्च में सीमातिरेक वृद्धि की आवश्यकता ने अलाउद्दीन को इस जटिल, कठिन और लगभग अव्यावहारिक नीति को अपनाने के लिए प्रेरित किया था।

विशाल सेना के सैनिकों को नकद वेतन का भुगतान करने के लिए राजकोष में सीमित धन था। सैनिकों की क्रय क्षमता के अनुरूप उनके जीवन से जुड़ी सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियन्त्र रखने के लिए अलाउद्दीन ने बाज़ार नियन्त्रण की नीति अपनाई थी। ज़ियाउद्दीन बनी की फ़तवा-ए-जहांदारी के अनुसार इस नीति का उद्देश्य राज्य पर मंगोल आक्रमणों के संकट को जड़ से समाप्त करने के लिए एक विशाल सेना का सीमित संसाधन में खर्च चलाना था। इसके अतिरिक्त आन्तरिक विद्रोहों का दमन करने के लिए तथा साम्राज्य का विस्तार करने के लिए भी अलाउद्दीन को अपने नियन्त्रण में एक विशाल और स्थायी सेना की आवश्यकता थी।

 




मूल्य नियन्त्रण

मध्यकालीन इतिहास में अलाउद्दीन पहला शासक था जिसने सुनियोजित आर्थिक नीति अपनाई थी। मुद्रा अवमूल्यन के कारण वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे थे। मंगोल आक्रमणों के कारण आयातित घोड़ों की कीमत बहुत बढ़ गई थी। आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी हो रही थी। इन विषम परिस्थितियों में सैनिकों की क्रय क्षमता के अनुरूप उनके जीवन से जुड़ी सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियन्त्र रखने के लिए अलाउद्दीन ने बाज़ार नियन्त्रण की नीति अपनाई थी। उसने खाद्यानों, कपड़ों, घोड़ों, गुलामों, बांदियों आदि सभी मूल्य निर्धारित किए गए। खाद्यानों में गेहूँ 7.5 जीतल प्रति मन चावल 5 जीतल प्रति मन, नमक 2 जीतल प्रति मन और शक्कर 1.25 जीतल प्रति सैर पर बेची जानी निश्चित की गई। अच्छा सूती कपड़ा 1 टंके में 20 गज़ और मोटा कपड़ा 1 टंके में 40 गज, सूती चादर का दाम 10 जीतल प्रति नग निर्धारित हुआ किन्तु रेशमी कपड़ा काफी महंगा रहा। मवेशियों के बाजार में अच्छे घोड़े का दाम 100 से 120 टंका, मध्यम श्रेणी के घोड़े का 80 से 90 टंका और टट्टू का दाम 10 से 20 टंका रखा गया। घोड़ों की तुलना में गुलाम और बांदियों की कीमत बहुत कम रखी गई थी। अलाउद्दीन ने बाज़ार से बिचौलियों और दलालों की उपस्थिति लगभग समाप्त कर दी थी। बाजार नियन्त्रण की नीति लागू किए जाने से लेकर अलाउद्दीन की मृत्यु तक वस्तुओं के दाम स्थिर रहे।

बाज़ार नियन्त्रण की व्यवस्था

बाज़ारों का नियन्त्रण दीवान-ए-रियासत करता था। मलिक याकूब इस विभाग का अध्यक्ष था। अलाउद्दीन ने विभिन्न आवश्यक वस्तुओं के लिए चार अलग-अलग बाज़ार स्थापित किए थे। ये थे खाद्यान्न बाज़ार, निर्मित वस्तुओं का बाज़ार (सराय-ए-अदल), सामान्य वस्तुओं का बाज़ार, मवेशियों, गुलाम तथा बांदियों का बाजार प्रत्येक बाज़ार एक शुहना-ए मण्डी के नियन्त्रण में होता था। सभी व्यापारियों का पंजीकरण किया जाता था और सुल्तान तक रोजाना बाजार की गतिविधियों की सूचना पहुँचाने का दायित्व शुहना, बरीद तथा मुशियों का था। महंगी तथा आयातित किन्तु आवश्यक वस्तुओं को कम कीमत पर उपलब्ध कराए जाने के लिए सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जाती थी किन्तु इसके लिए खरीदार को परवाना रईस (अनुज्ञप्ति अधिकारी) से परमिट प्राप्त करना होता था। अलाउद्दीन ने संकटकालीन स्थिति से निपटने के लिए बड़ी संख्या में राजकीय गोदामों में खाद्यान्न जमा करने की व्यवस्था की थी। अकाल, बाद आदि प्राकृतिक विपदाओं की स्थिति में खाद्यान्न की कमी की आपूर्ति इन्हीं सरकारी गोदामों में जमा खाद्यान्न से की जाती थी।

 




अलाउद्दीन का विजय अभियान

उत्तर भारत की विजय

1. सन् 1298 के उत्तरार्ध में नुसरत खाँ तथा उलुग खाँ को गुजरात अभियान का दायित्व सौंपा गया जिन्होंने वहां के शासक कर्ण बघेला को उसके विश्वासघाती मन्त्री माधव की सहायता से पराजित किया और उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ पर अधिकार कर लिया।

2. रणथम्भौर पर विजय प्राप्त करने में सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी असफल रहा था। बाद में हम्मीरदेव के विश्वासघाती मन्त्री रनमल को अपने पक्ष में कर सुल्तान ने किले पर सन् 1301 में अधिकार कर लिया।

3. अलाउद्दीन द्वारा मेवाइ अभियान के पीछे अनुपम सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध राणा रतन सिंह की रानी पद्मिनी को अपने अधिकार में करने की लालसा मानी जाती है। सन् 1303 में अलाउद्दीन ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर घेरा डाला। पाँच महीने के घेरे के बाद संसाधनों की कमी के कारण रतन सिंह और उसके सैनिकों ने किले से बाहर निकल कर युद्ध किया और सभी वीरगति को प्राप्त हुए।

4. सन् 1305 में आइन-उल-मुल्क मुल्तानी के नेतृत्व में सुल्तान की सेना ने मालवा के शासक महलकदेव को पराजित कर मार डाला और माण्डू, धार व चन्देरी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद जालौर के शासक कान्हणदेव ने आइन-उल-मुल्क मुल्तानी के समक्ष बिना युद्ध किए आत्म-समर्पण कर दिया।

5. 1309 में अलाउद्दीन ने स्वयं अभियान का नेतृत्व कर मारवाड़ के शासक शीतलदेव को पराजित कर व उसको मार कर सिवाना के किले पर अधिकार कर लिया।

दक्षिण भारत की विजय

सुल्तान अलाउद्दीन के दक्षिण अभियानों की सफलता का मुख्य श्रेय नाइब मलिक काफूर को जाता है।1307 में मलिक काफूर ने रामचन्द्रदेव को पराजित किया और भारी लूट के साथ उसे सपरिवार वह दिल्ली से आया। सुल्तान की आधीनता स्वीकार करने के बाद रामचन्द्रदेव को न केवल उसका राज्य उसे वापस किया गया अपितु उसे पाय रायन' की उपाधि और नवसारी का क्षेत्र भी प्रदान किया गया।

वारंगल (तेलंगाना) के शासक प्रतापरुद्रदेव ने सन् 1303 में अपने विरुद्ध मलिक काफूर के अभियान को विफल कर दिया था। नवम्बर, 1309 में एक बार फिर मलिक काफूर वारंगल अभियान का नेतृत्व प्रदान किया गया। वारंगल दुर्ग को काफूर ने घेर लिया। एक समय तक प्रतिरोध करने के बाद प्रतापरुद्रदेव ने काफूर के समक्ष सन्धि प्रस्ताव रखा जिसे काफूर ने स्वीकार कर लिया। प्रचुर मात्रा में धन और प्रतापरुद्रदेव द्वारा वार्षिक खिराज दिए जाने के आश्वासन के साथ काफूर दिल्ली लौट आया।

 





सन् 1310 में अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को तीसरी बार दक्षिण विजय के लिए भेजा। इस बार के अभियान का उद्देश्य धन प्राप्ति के अतिरिक्त होयसल (वारसमुद्र) राज्य के शासक वीर बल्लाल को दिल्ली सल्तनत के आधीन करना था। वीर बल्लाल को पराजित कर मलिक काफूर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहा।

सुदूर दक्षिण में स्थित मदुरा राज्य में सुन्दर पाण्ड्य तथा वीर पाण्ड्य के मध्य हो रहे गृहयुद्ध में सुन्दर पाण्ड्य ने होयसम अभियान के दौरान मलिक काफूर से सहायता मांगी मलिक काफूर ने मदुरा पर आक्रमण कर दिया।

सन् 1309 में रामचन्द्रदेव की मृत्यु के बाद शंकरदेव देवगिरि का शासक बना। शंकरदेव ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। सन् 1313 मे मलिक काफूर ने शंकरदेव को परास्त कर मार डाला और दक्षिण में राचूर, गुलबर्गा, मुदगल सहित विशाल क्षेत्र को जीत लिया।

 




एक शासक के रूप में अलाउद्दीन का आंकलन

अलाउद्दीन ने अपनी बाजार नियन्त्रण नीति, उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत की विजयों से मध्यकालीन भारतीय इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। दिल्ली का कोई और सुल्तान उसकी व्यावहारिक बुद्धि, उसका रण कौशल, उसकी दूरदर्शिता और अपनी महत्वाकांक्षाओं को साकार रूप देने की क्षमता में उसका मुकाबला नहीं कर सकता। वह पहला सुल्तान था जिसने धर्म को यथासम्भव राजनीति से अलग रखने में सफलता प्राप्त की थी।

वह एक महान भवन तथा नगर निर्माता था। अमीर खुसरो तथा जियाउद्दीन बर्नी जैसे समकालीन इतिहासकारों ने उसके शासन की उपलब्धियों का विस्तार से उल्लेख किया है। किन्तु अलाउद्दीन एक क्रूर, कृतघ्न, स्वार्थी, शक्की, निरंकुश तथा विलासी शासक था। राज्य की समस्त शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर उसने अपने उत्तराधिकारियों को अयोग्य बना दिया था। उसने किसानों पर करों का बोझ इतना बढ़ा दिया कि उनका जीना दूभर हो गया। उसकी बाजार नियन्त्रण की भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है किन्तु यह भी सत्य है कि इससे आम आदमी का कोई भला नहीं हुआ और व्यापार तथा वाणिज्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अपने वंश के पतन के लिए मुख्य रूप से स्वयं अलाउद्दीन ही उत्तरदायी था। किन्तु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का सबसे महत्वपूर्ण शासक था।