अंग्रेज और मैसूर राज्य का इतिहास - History of the British and Mysore State
अंग्रेज और मैसूर राज्य का इतिहास - History of the British and Mysore State
पूर्वी तथा पश्चिमी घाटों के संगम पर स्थित मैसूर राज्य का वास्तविक शासक चक्का कृष्ण राज्य था। उसकी निर्बलता का लाभ उठाकर नंद राज तथा देवराज ने मैसूर पर अपना कबजा कर लिया। मैसूर निजाम और मराठों के मध्य विवाद का स्त्रोत था। मराठों ने मैसूर पर लगातार आक्रमण किए और वित्तीय दृष्टि से इसे दिवालिया और राजनैतिक दृष्टि से बहुत कमजोर बना दिया। दूसरी ओर निजामुलमुल्क मैसूर को मुगल प्रदेश मानता था और इस कारण मैसूर को अपनी प्रादेशिक विरासत मानता था।
इसी बीच अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बीच युद्ध शुरू हुआ क्योंकि
त्रिचुरापल्ली पर अधिकार करने के लिए नानराज (नन्द राज) ने अंग्रेजों के साथ संधि
कर ली थी, नानराज
ने अंग्रेजों को छोड़कर फ्रांसीसियों के साथ समझौता कर लिया। मैसूर सेना के परन्तु
बाद में सेनापति हैदर अली को त्रिचुरापल्ली के सैन्य अभियानों के दौरान पर्याप्त
ख्याति मिली। 1758 के बाद जब मराठे मैसूर पर आक्रमण कर रहे
थे तब तक हैदर अली पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गया था। उसने नानराज को पेंशन
देकर पदमुक्त कर दिया तथा मैसूर का शासन अपने हाथों में ले लिया।
हैदर अली का उत्थान
हैदर अली का जन्म 1322 ई० में हुआ हैदर में साहसी व्यक्ति के गुण थे। वह बौधिक दृष्टि से जागरूक था तथा उससे वह योग्यता थी कि वह अवसर का लाभ उठा सके। नानराज से उसकी वीरता से प्रसन्न होकर उसे 500 सिपाहियों की कमान्ड पर नियुक्त कर दिया था।
आगे चलकर हैदर अली ने अपनी सेना को बढ़ावा तथा अपनी सेना का प्रशिक्षण फ्रांसीसियों से कराया कर्नाटक के दूसरे युद्ध में जानराज ने मुहम्मद अली का साथ दिया। मुहम्मद अली ने इस सहायता के बदले त्रियनापल्ली का क्षेत्र देने का वचन दिया। युद्ध के बाद मुहम्मद अली ने इस क्षेत्र को देने से इन्कार कर दिया। मैसूर को विवश होकर कर्नाटक पर आक्रमण करना पड़ अंगेज तथा तंजोर की सेनाएं मोहम्मद अली की सहायता के लिए जा रही थी। 14 अगस्त 1754 ई० को हैदर अली ने इन सेनाओं पर पीछे से आक्रमण करके उन्हें पराजित कर दिया। इस सफलता से प्रसन्न होकर नन्दराज ने हैदर अली को डंडीगुल के क्षेत्र का दीवान नियुक्त कर दिया।
1758 ई0 के पश्चात मैसूर के राजा
तथा मंत्री नानराज में अत्यधिक मतभेद हो गया। राजा की सेना तथा नानराज की सेना के
मध्य युद्ध हुआ जिसमें राजा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसके पश्चात नानराज तथा
उसके आई देवराज में भी मतभेद उत्पन्न हो गया।
हैदर अली की कार्यकुशलता को देखते हुए मैसूर साम्राज्य के तमाम शासन का प्रबंध हैदर अली के हाथों में सौंप दिया गया। हैदर अली ने बड़ी कुशलता से मैसूर के शासन में सुधार लाकर सैनिकों के वेतन का भुगतान कर दिया। कुछ ही समय बाद राज्य की स्थिति पुनः बिगड़ने लगी। सेना के सिपाही हैदर अली के पास आए इस बदलती स्थिति का फायदा उठाकर हैदर अली ने नानराज की पेंशन पर रखकर राज्य का पूरा कार्यभार अपने हाथों में ले लिया। उसने राजा के पद को बनाए रखा तथा स्वयं पद ग्रहण नहीं किया, परन्तु राज्य की वास्तविक शक्ति उसी के हाथ में थी तथा राजा केवल प्रतिछाया मात्र था।
प्रथम मैसूर युद्ध
यूरोप में चल रहे सप्तवर्षीय युद्ध के कारण दक्षिण में अंग्रेज तथा फ्रांसीसियों के संबंध बिगड़ गए हैदर अली ने 4000 घुड़सवार अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों की मदद के लिए भेजा। हैदर अली तथा अंग्रेजों के बीच शत्रुता का प्रमुख कारण दक्षिण भारत की राजनीति थी तैयार पृष्ठभूमि में युद्ध की आशंका तब और बढ़ा दी जब यह अफवाह फैली कि हैदर निजाम अली के साथ मिलकर कर्नाटक में प्रवेश करने वाला है। इससे अंग्रेज घबरा गए तथा निजाम अली को अपनी तरफ कर लिया 1766 में अंग्रेजों तक निजाम के बीच एक संधि हो गई। माधव राव पहले से ही मैसूर के क्षेत्र में लूटपाट करने में लगा हुआ था। अतः निजाम, मराठों तथा अंग्रेजों के मध्य एक संधि हुई। फलस्वरूप इस त्रिगुट ने हैदर अली पर आक्रमण कर दिया। हैदर अली इससे निराश नहीं हुआ। उसने स्थिति का बड़ी बहादुरी से सामना किया। वह अच्छी तरह से यह जानता था कि ये तीनों शक्तियों अपने हितों के कारण एक दूसरे के साथ हुई है अत: उन्हें अलग भी किया जा सकता है। हैदर अली ने कूटनीतिक चाल चलनी शुरू कर दी। उसने निजाम की भूमि की लालच देकर तथा मराठों को धन देकर अपने में मिला लिया। इस प्रकार राजनीति एक बार फिर से हैदर अली की ओर मुड गई। हैदर अली और निजाम की सेनाओं ने कर्नाटक में प्रवेश किया। दोनों सेनाओं के बीच कई झगड़े हुई लेकिन इसका कोई निर्णय नहीं निकल पाया। इसी बीच निजाम ने हैदर अली का साथ छोड़ दिया परन्तु कुछ ही समय बाद युद्ध की नियती हैदर के पक्ष में मुड़ने लगी। उसकी एक के बाद एक सफलताओं से घबराकर अंग्रेजों ने उससे संधि कर ली। इस संधि के मुख्य बिन्दु थे :
1.दोनों पक्षों ने एक दूसरे के विजित प्रदेशों को लौटा दिया।।
2.कोलार का भंडार हैदर को प्राप्त हुआ।
3. तीसरी संधि आने वाले समय के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हुई। क्योंकि यही संधि दूसरे आंग्ल मैसूर सुद्ध का एक कारण बनी इस संधि की शर्तों के अनुसार, यदि कोई भी बाहरी शक्ति इन दोनों में से किसी के प्रदेश पर आक्रमण करती है तो इन्हें एक दूसरे का साथ देना होगा।
द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध (1780-84)
1780 में हैदर अली को अंग्रेजों से दूसरा युद्ध लड़ना
पड़ा । वस्तुत हैदर अली की हुई शक्ति तथा दक्षिण भारतीय राजनीति में उसके बढ़ते हुए
प्रभाव से अंग्रेज भयभीत हो चुके थे। अंग्रेजों के हैदर अली तथा फ्रासीसियों के
बीच की मित्रतो भी पंसद नहीं थी। वह मैसूर राज्य को मराठों की सहायता से बफर स्टेट
में बदलना चाहते थे। मद्रास की सन्धि में यह स्पष्ट रूप से लिखा हुआ था। कि यदि
दोनों में से किसी के क्षेत्र पर भी यदि कोई भी बाहरी शक्ति आक्रमण करती है तो
उन्हें एक दूसरे का साथ देना होगा। परन्तु जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया तो
संधि की शर्त के अनुसारे अंग्रेजों ने हैदर का साथ नहीं दिया। 1780 में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरुआत उस समय हुई जब हैदर अली ने
कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया । अंग्रेजों ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया
क्योंकि कर्नाटक का नवाब अंग्रेजों का मित्र था। कर्नल बैली के नेतृत्व में एक फौज
अंग्रेजों ने पहले से ही कर्नाटक की रक्षा के लिए वहाँ छोड़ रखी थी। हैदर ने बैलों
के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना को बुरी तरह पराजित किया तथा कर्नल बैली बन्दी बना
लिया गया। आगे बढ़ते हुए हैदर अली ने अर्कार्ट पर अधिकार कर लिया जो उस समय कर्नाटक
की राजधारी थी। हैदर की इन विजयों ने अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को उनके न्यूनतम
बिन्दु तक पहुंचा दिया।
हैदर अली की इन विजयों पर रोक लगाने के लिए आयरकूट को एक विशाल सेना के साथ मा भेजा गया। जून 1782 में हैदर तथा फ्रांसीसी सेना का मुकाबला आयरकूट के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना से हुआ। परन्तु यह युद्ध अनिर्णायक रहा। युद्ध के दौरान ही 1782 ई० में हैदर अली की मृत्यु हो गई। अब मैसूर को बचाने का पूरा दायित्व हैदर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी टीपू पर आ गया था। टीपू ने यह युदध जारी रखा। परन्तु यूरोप में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के बीच 1784 से हुए। शांति समझौते के कारण टीपू को फ्रांस से सहायती मिलनी बन्द हो गई। इसी समय वारेन हेस्टिंग ने मदास प्रेसीडेन्सी की सहायता की। अब दोनों पक्षों को यह लगने लगा कि युदध को जारी रखना उनके परस्पर हितों में नहीं है अतः दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया। इस संधि को मंगलौर की संधि कहा जाता है।
इस समझौते के अनुसार दो पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेश को वापस कर दिया। अग्रेजो ने टीपू से मित्रतापूर्ण संबंध रखने तक कठिनाई के समय उसकी सहायता करने का वचन दिया ।
तृतीय ऑग्ल मैसूर यूद्व ( 1970-92 )
मंगलौर की संधि अंग्रेजों के लिए बहुत अपमानजनक थी । यह संधि टीपू की
कूटनीतिक सफलता थी । इस संधि ने उसकी शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बढ़ा दिया थी । अतः
तृतीय कर्नाटक युद्ध के बीज इस संधि में ही छुपे इस संधि ने टीपू को जो प्रतिष्ठा
प्रदान की उसकी वजह से वो अधिक आक्रमक हो गया। दिसम्बर 1789 को
टीपू ने ट्रावन्कोर पर आक्रमण कर दिया कार्नवालिस का विचार था कि टीपू से युद्ध
अनिवार्य है । कार्नवालिस टीपू की बढ़ती हुई शक्ति तथा फ्रांसीसियों से उसकी
मित्रता से भयभीत था । अतः कार्नवालिस भी युदेव का बहाना तलाश कर रहा था ।
कार्नवालिस ने सबसे पहले बंगलौर का किला जिता तथा बाद में उसकी मरम्मत कराकर सेरिंगपट्रम को और बढ़ा जो मैसूर राज्य की राजधानी थी। निजाम के दस हजार सैनिको ने भी कार्नवालिस की मदद की। परन्तु अंग्रेजों को सफलता प्राप्त नहीं हुई तथा वाध्य होकर उन्हें वापस बंगलौर जाना पड़ा। कार्नवालिस, सिरंगपट्टम के अपने विफेल आक्रमण के बाद जब बंगलौर पहुंचा तब टीपू का एक दूत समझौते के लिए मिला । परन्तु कुछ कारणों से वार्ता नहीं हो पाई । कार्नवीलिस ने युदेव को आग बढ़ाते हुए मराठों को उत्तर पश्चिम के क्षेत्रों अधिकार करने के लिए भेजा निजाम की सेना उत्तर पूर्व की ओर बढ़ी । अब अंग्रेजों ने कोयम्बटूर पर अपना अधिकार कर लिया । युव की नियेती अपने विपरीत जाते हुए देख टीपू ने फिर से समझौते की पेशकश की । इस संधि को संरिंगपट्टम की संधि कहा गया ।
सेरिंगपट्टम की संधि की प्रमुख शर्ते निम्न थी। टीपू को लगभग आधा राज्य त्याग देना पड़ा जिसे ब्रिटिश निजाम तथा मराठों के बीच बॉट दिया गया। हैदर के काल से चले आ रहे युदव बन्दियों को उसे छोड़ना पड़ा । टीपू को युदव हर्जाने के रूप में 30 लाख रूपया देना पड़ा। यही नहीं उसे बन्धक के रूप में अपने दो पुत्रों मुइनुद्दीन तथा अब्दुल खालिक को अंग्रेजों को सौंपना पड़ा ।
चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)
1798 में जॉनशोर के स्थान पर वेलेजली भारत आया। उसे यह डर था कि फ्रांसिसी टीप के साथ मिलकर भारत में अंग्रेजी शक्ति समाप्त करने में सफल न हो जाएं। ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए उसने कूटनीतिक चाल चलनी शुरू कर दी। इस खतरे से निपटने के लिए वैलेजली ने जिस हथियार का इस्तेमाल किया उसे सहायक संधि कहते है।
हैदराबाद तथा अवध के पश्चात वेलेजली के सामने दो और राज्यों को अधीन बनाने की समस्या थी। एक मैसूर तथा दूसरा मराठों का राज्य/वैलेजली ने 1799 में टीपू के सामने सहायक संधि का प्रस्ताव रखा जिसे टीपू ने अस्वीकार कर दिया। वेलेजली ने टीपू पर यह आरोप लगाया कि वह फ्रांसिसीयाँ अरब तथा तर्क शासक के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्व षडयंत्र कर रहा है।
वेलेजली ने अपने भाई आर्थर वेलेजली के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना को टीपू के राज्य पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया । बम्बई की सेनाओं ने मैसूर पर पश्चिम की ओर से आक्रमण किया । मलावस्सी में टीपू की पराजय हुई। अब टीपू ने सिरंगापट्टम के दुर्ग की घेरबंदी कर टीपू के सामने एक शर्त रखी इस शर्त में राज्य की आधा भाग तथा 20 लाख पौड की मांग थी। टीपू इस पर सहमत नहीं हुआ तथा अंग्रेजो की शर्त मानने से इन्कार कर दिया। अब अंग्रेजो ने टीपू सुलतान के मंत्री पुरनैया पण्डित के साथ मिलकर टीपू के विरुद्व षडयंत्र रचा। यही नहीं टीपू का सेनापति कमरुद्दीन खाँ तथा दीवान मीर सादिक भी अंग्रेजो से जा मिले इस षडयंत्र के परिणामस्वरूप अंग्रेज दुर्ग में प्रवेश करने में सफल हुए। टीपू ने बहुत बहादुरी से युद्ध किया । परन्तु विश्वासघात के कारण लड़ते लड़ते वह शहीद हो गया ।
सारांश
इस प्रकार वेलेजली को आशा से कहीं अधिक सफलता मिली । अब उसके पास
पूरा मैसूर राज्य आ चुका था । वैलेजली ने मैसूर के उपजाऊ क्षेत्रों जैसी काकीनाडा
का पश्चिम क्षेत्र कोयमबटूर का दक्षिणी क्षेत्र पूर्वी जिला तथा सिरंगपट्टम का
दूर्ग अपने शासन में मिला लिया । मैसूर के कुछ क्षेत्र निजाम को उसकी सहायता के
बदले दे दिए गए। शेष छोटा शिथिल राज्य मैसूर के वंशानुगत वाडियार राजा को दे दिया
गया । इंग्लैण्ड में इस विजय पर अत्यंत खुशी प्रकट की गई ।
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