जलालुद्दीन खिलजी का इतिहास - History of Jalaluddin Khilji

जलालुद्दीन खिलजी का इतिहास - History of Jalaluddin Khilji

 जलालुद्दीन खिलजी का इतिहास  - History of Jalaluddin Khilji

जलालुद्दीन खिलजी

जलालुद्दीन खिलजी ने बलबन तथा उसके उत्तराधिकारियों के काल में मंगोलों का सामना करते हुए एक कुशल सेनापति के रूप में ख्याति अर्जित की थी। सुल्तान कैकुबाद ने उसे आरिज़-ए मुमालिक का पद तथा शायिस्ता खाँ की उपाधि प्रदान की थी। 1290 ईसवी के प्रारम्भ में कैकुबाद के पतन के बाद वह बालक सुल्तान क्यूमर्स का संरक्षक बना किन्तु यह व्यवस्था नितान्त अस्थायी थी। जून, 1290 में जलालुद्दीन खिल्जी सुल्तान क्यूमर्स तथा कैकुबाद की हत्या कर स्वयं जलालुद्दी फिरोज़ शाह के नाम से सुल्तान बन बैठा। असन्तुष्ट इल्बारी अमीरों तथा अपनी प्रजा के तुष्टीकरण के लिए सुल्तान जलालुद्दीन ने सुल्तान बलबन की निरंकुश स्वेच्छाचारी शासन का पोषण करने वाली रक्त एवं लौह की नीति का परित्याग कर दिया।

1202 ईसवी में हलाकू के पौत्र अब्दुल्ला नेतृत्व मंगोलों के आक्रमण को विफल करने के बाद उसने उससे संधि कर उसे वापस लौटने के लिए राजी कर लिया और चंगेज़ खाँ के वंशज उलगू इस्लाम में दीक्षित होने के बाद अपने 4000 समर्थकों के साथ दिल्ली में बसने की अनुमति दे दी।

 




जलालुद्दीन खिलजी के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक अभियान

अलाउद्दीन को मालवा की राजनीतिक अस्थिरता व उसकी अपार धन-सम्पदा की जानकारी प्राप्त हुई और उसने वहां आक्रमण करने की योजना बनाई।

सन् 1293 में अलाउद्दीन ने भिलसा (विदिशा) पर सफल आक्रमण कर अपार धनराशि लूट इस लूट का एक भाग सुल्तान को अर्पित कर उसने पुरस्कार में कड़ा व मानिकपुर के अतिरक्त अवध की सूबेदारी भी प्राप्त कर ली और साथ ही साथ उसे कड़ा व मानिकपुर के राजस्व के शाही भाग को चन्देरी अभियान हेतु सैनिकों की भर्ती के लिए खर्च करने का अधिकार भी प्राप्त हो गया। ली।

कड़ा की देखभाल का दायित्व अपने विश्वस्त अला-उल-मुल्क को सौंपकर अलाउद्दीन फ़रवरी, 1296 में चन्देरी पर आक्रमण करने के बहाने एक विशाल सेना लेकर चन्देरी और भिलसा होते हुए देवगिरि की ओर चल पड़ा। आक्रमणकारी से बचने के लिए देवगिरि के शासक रामचन्द्रदेव के पास किले में छिपने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। अलाउद्दीन ने देवगिरि नगर को जमकर लूटा। 25 दिनों तक देवगिरि अभियान में व्यतीत करने के बाद अलाउद्दीन अथाह धन सम्पदा तथा वार्षिक पेशकश के आश्वासन के साथ तथा रामचन्द्रदेव की पुत्री से विवाह कर उत्तर भारत वापस लौट आया।