सुल्तान मुहम्मद तुगलक का इतिहास - History of Sultan Muhammad Tughlaq

सुल्तान मुहम्मद तुगलक का इतिहास - History of Sultan Muhammad Tughlaq

 सुल्तान मुहम्मद तुगलक का इतिहास -  History of Sultan Muhammad Tughlaq

सुल्तान मुहम्मद तुगलक

दोआब में कर वृद्धि

मुहम्मद तुगलक एक सुशिक्षित, बुद्धिमान तथा मौलिक प्रतिभा का धनी व्यक्ति था। उसका उद्देश्य समस्त राज्य में एक सी राजस्व व्यवस्था स्थापित करना था। सत्तारूढ होने के कुछ ही समय बाद (सन् 1325 में) मुहम्मद तुगलक ने दोआब में कर वृद्धि करने का निर्णय लिया। जियाउद्दीन बर्नी के अनुसार दो दशक पूर्व दोआब के हिन्दुओं ने मंगोल अली बेग और तार्ताक को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया था इसलिए मुहम्मद तुगलक कर वृधि के बहाने वहां के निवासियों को सबक सिखाना चाहता था। बर्नी के अनुसार यह कर वृद्धि पूर्व कर से 10 से 20 गुनी थी परन्तु इस कथन में अतिशयोक्ति का पुट है। वास्तव में मुहम्मद तुगलक ने गृहकर तथा चराई कर के रूप में नए अबवाब (भू-राजस्व के अतिरिक्त अन्य कर) लगाए थे जोकि पूर्व निर्धारित कर के 1/20 से लेकर 1/10 तक थे। इस योजना के कार्यान्वयन का समय उपयुक्त नहीं। क्योंकि अनावृष्टि के कारण वहां के किसान पहले से निर्धारित कर चुकाने की भी स्थिति में नहीं थे।

 




दोआब वासियों ने करों की अदायगी से इंकार किया बरन, डलमऊ और कन्नौज में किसान विद्रोह हुए। सुल्तान ने स्वयं अभियान का नेतृत्व कर उनका दमन किया। सुल्तान को बहुत देर बाद समझ में आया कि किसानों के दमन से उसका राजस्व बढ़ने के स्थान पर घट रहा है। उसने भूल-सुधार के रूप में अकाल पीड़ितों को राहत, लगान वसूली पर रोक, किसानों को ऋण, सिंचाई के लिए कुओं का निर्माण आदि के आदेश दिए पर जन-धन की अपार हानि के कारण तब तक दोआब उजड़ चुका था।

राजधानी परिवर्तन

दक्षिण में साम्राज्य विस्तार के कारण अब दिल्ली से पूरी सल्तनत पर शासन कर पाना कठिन हो गया था। मुहम्मद तुगलक एक ऐसे स्थान को अपनी राजधानी बनाना चाहता था जो उसकी सल्तनत के केन्द्र में स्थित हो। दौलताबाद नगर (पुराना नाम देवगिरि) दिल्ली, गुजरात, लखनौती, सतगांव, सुनारगांव, वारंगल, वारसमुद्र, साबर और कम्पिला से लगभग एक समान दूरी पर था। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत धन-धान्य से परिपूर्ण था और वहां अपेक्षाकृत शान्ति भी स्थापित थी। सन् 1327 में सुल्तान में विशेषज्ञों से परामर्श किए बिना राजधानी परिवर्तन का ऐतिहासिक किन्तु मूर्खतापूर्ण निर्णय ले लिया।

इब्न बतूता ने सुल्तान पर आरोप लगाया है कि दिल्ली वासियों को उसकी गुप्त पत्रों के माध्यम से भर्त्सना करने का दण्ड, राजधानी परिवर्तन और दिल्ली से निर्वासन के रूप में दिया गया था। इस अव्यावहारिक निर्णय के विनाशकारी परिणाम हुए। इब्न बतूता के सन् 1334 के वृतान्त से ज्ञात होता है कि सुल्तान, दिल्ली के सभी निवासियों को दौलताबाद नहीं ले गया था। अपने मूर्खतापूर्ण निर्णय के विनाशकारी परिणाम देखने के बाद सन् 1337 में सुल्तान ने फिर से दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया लेकिन इस दस वर्ष की अवधि के दौरान इतने व्यापक जन स्थानान्तरण ने अकल्पनीय कठिनाइयां उत्पन्न की, इसमें हजारों लोग मारे गए, अपरिमित आर्थिक हानि हुई तथा सुल्तान सदैव के लिए उपहास और भर्त्सना का पात्र बन गया।

 




सांकेतिक मुद्रा

सुल्तान की प्रवृत्ति नए-नए प्रयोग करने की पहले से ही थी। अपने राजकोष में अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप सोने-चांदी की पर्याप्त मात्रा के अभाव की स्थिति में उसने सांकेतिक मुद्रा का प्रयोग किया। 13 वीं शताब्दी में चीन और ईरान में सांकेतिक मुद्रा का प्रयोग किया जा चुका था। चीन में कागज़ की सांकेतिक मुद्रा का प्रयोग सफल रहा था। मुहम्मद तुगलक ने चाँदी के टके के स्थान पर पीतल और तांबे की सांकेतिक मुद्रा जारी करने का आदेश दिया। सुल्तान ने सांकेतिक मुद्राओं के ढाले जाने में इस प्रकार की कोई सावधानी नहीं बरती कि जाली सिक्कों को सांकेतिक मुद्रा के रूप में बाज़ार में चलाया न जा सके। बर्नी के अनुसार हिन्दुओं के घर जाली सिक्के ढालने वाली टकसाल बन गए परन्तु सत्य तो यह है कि सुल्तान की असावधानी का लाभ अनेक अवसरवादियों ने उठाया और अपने वाले हुए तांबे और पीतल के सिक्के चांदी के टके के रूप में बाजार में चलाए। जब जाली सिक्कों से बाजार पटने के कारण आर्थिक जीवन ठप्प पड़ने लगा तो सुल्तान ने सांकेतिक मुद्राओं का चलन रोक्ने तथा जाली सिक्कों के बदले राज्य की और से उनकी तील के बराबर चाँदी लौटाए जाने का आदेश दिया। जाली सिक्कों के बदले राज्य की ओर से चाँदी लेने के लिए तुगलकाबाद में जाली सिक्कों का पहाड़ खड़ा हो गया किन्तु सुल्तान ने बिना कोई आपत्ति उठाए राजकोष से उनका भुगतान करा दिया। इस प्रकार अपने जल्दबाजी वाले अव्यावहारिक निर्णय से राजकोष और अपनी प्रतिष्ठा, दोनों को ही सुल्तान ने एक साथ कभी भी न भर पाने वाली चोट पहुंचाई।


खुरासान तथा कराचल पर विजय की योजना

1. मुहम्मद तुगलक को जामशीरीन मंगोल ने खुरासान तथा ईराक की राजनीतिक अस्थिरता की जानकारी दी थी। इन क्षेत्रों की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर मुहम्मद तुगलक ने उन पर विजय प्राप्त कर अपने साम्राज्य में मिलाने की महत्वाकांक्षी किन्तु अव्यावहारिक योजना बनाई बनों के अनुसार उसने इसके लिए न केवल 370000 की सेना संगठित की अपितु इन सैनिकों को एक वर्ष के अग्रिम वेतन का भुगतान भी कर दिया शीघ्र ही सुल्तान को अपनी योजना की अव्यावहारिकता समझ में आ गई और उसने भारी नुक्सान उठाकर अभियान शुरू होने से पहले ही उसको रद्द कर दिया।

2. सन् 1337 में मुहम्मद तुगलक ने कांगड़ा मै नगरकोट पर विजय प्राप्त की थी। इस विजय से उत्साहित होकर उसने करावल विजय की योजना बनाई गॉर्डन ब्राउन के अनुसार यह मध्य हिमालय में स्थित कुल्लू तथा कांगड़ा का क्षेत्र था जब कि मेहंदी हुसेन इसे कुमाऊँ तथा गढ़वाल मानते हैं। फरिश्ता के अनुसार चूंकि कराचल हिन्दुस्तान और चीन के मध्य में स्थित था इसलिए यह अभियान उसके द्वारा चीन पर विजय प्राप्त करने हेतु सैनिक अभियान का पूर्वाभ्यास था।

इब्न बतूता के अनुसार लौटते समय वर्षा और बीमारी से जूझ रही खुसरी मलिक की सेना पर पहाड़ियों पर छिपे हमलावरों ने आक्रमण कर उसे लूटा और उसे लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। इस सेना के मुट्ठी भर अधिकारी और सैनिक अपनी जान बचाकर वापस आ सके।

 


 



खुरासान तथा कराचल पर विजय की योजना

1. मुहम्मद तुगलक को जामशीरीन मंगोल ने खुरासान तथा ईराक की राजनीतिक अस्थिरता की जानकारी दी थी। इन क्षेत्रों की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर मुहम्मद तुगलक ने उन पर विजय प्राप्त कर अपने साम्राज्य में मिलाने की महत्वाकांक्षी किन्तु अव्यावहारिक योजना बनाई बनों के अनुसार उसने इसके लिए न केवल 370000 की सेना संगठित की अपितु इन सैनिकों को एक वर्ष के अग्रिम वेतन का भुगतान भी कर दिया शीघ्र ही सुल्तान को अपनी योजना की अव्यावहारिकता समझ में आ गई और उसने भारी नुक्सान उठाकर अभियान शुरू होने से पहले ही उसको रद्द कर दिया।

 

2. सन् 1337 में मुहम्मद तुगलक ने कांगड़ा मै नगरकोट पर विजय प्राप्त की थी। इस विजय से उत्साहित होकर उसने करावल विजय की योजना बनाई गॉर्डन ब्राउन के अनुसार यह मध्य हिमालय में स्थित कुल्लू तथा कांगड़ा का क्षेत्र था जब कि मेहंदी हुसेन इसे कुमाऊँ तथा गढ़वाल मानते हैं। फरिश्ता के अनुसार चूंकि कराचल हिन्दुस्तान और चीन के मध्य में स्थित था इसलिए यह अभियान उसके द्वारा चीन पर विजय प्राप्त करने हेतु सैनिक अभियान का पूर्वाभ्यास था।

 

इब्न बतूता के अनुसार लौटते समय वर्षा और बीमारी से जूझ रही खुसरी मलिक की सेना पर पहाड़ियों पर छिपे हमलावरों ने आक्रमण कर उसे लूटा और उसे लगभग पूरी तरह नष्ट कर दिया। इस सेना के मुट्ठी भर अधिकारी और सैनिक अपनी जान बचाकर वापस आ सके।