भारत में स्वास्थ्य नीति - Indian health policy
भारत में स्वास्थ्य नीति - Indian health policy
भारत में स्वास्थ्य नीति का इतिहास काफी पुराना है। मिश्रित अर्थव्यवस्था के मार्ग का चयन करने के उपरांत सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं एवं उससे जुड़ी आधारभूत संरचना के विकास पर बहुत जोर दिया। आजादी से पूर्व बनी भोर समिति (1946) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि कोई भी व्यक्ति निवारक या उपचारात्मक प्रीवेंटिव या क्यूरेटिव) चिकित्सा सुविधा से भुगतान क्षमतान होने के कारण वंचित नही होना चाहिये।
प्रथम दो पंचवर्षीय योजना की समीक्षा व भविष्य की योजना के लिये 1959 मे मुदालियर समिति गठित की गई थी, मुदालियर समिति ने ग्रामीण क्षेत्र मे डाक्टरों व चिकित्साकर्मियों को आकर्षित करने के लिये सेवाशर्तो मे सुधार के प्रस्ताव दिये थे। 1963 मे चढ्ढा कमेटी ने स्वास्थ्य व परिवार नियोजन सेवाओं को एकीकृत करने व प्रति 10000 की आबादी पर एक पुरुष व एक महिला बहुउद्देशीय स्वास्थ्यकर्मी की नियुक्ति की अनुशंसा की थी। 1973 में करतार सिन्ह कमेटी ने भी एक उद्देशीय महिला व पुरूष स्वास्थ्य कर्मी को बहुउद्देशीय में रूपांतरित कर व ग्रामीण प्राथमिक हेल्थ केअर से एकीकृत कर प्रति 10 से 12 हजार ग्रामीण आबादी पर एक बहुउद्देशीय स्वास्थकर्मी की नियुक्ति की अनुशंसा की थी।
1977 मे श्रीवास्तव समिति ने ग्रामीण आधार वाले युवाओ को तीन माह का प्रशिक्षण देकर सामुदायिक स्वास्थकर्मी के नये केडर बनाने की अनुशंसा की थी। 1978 की विश्व स्वास्थ्य असेम्बली की “ अल्मा अता घोषणा “ जिसमे सबके लिये वर्ष 2000 तक स्वास्थ्य का लक्ष्य निर्धारित किया गया था तथा विभिन्न समितियो की अनुशंसाओ के आधार पर 1983 मे देश की पहली स्वास्थ्य नीति घोषित की गई थी. विकेंद्रित हेल्थ केअर प्रणाली, कम खर्चीली स्वास्थ्य सेवाएं, गैरव्यवसायिक दृष्टिकोण व सामुदायिक भागीदारी पहली स्वास्थ्य नीति के आधार तत्व थे तथा प्रति 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र व 5000 की आबादी पर एक उपकेंद्र का लक्ष्य रखा गया था। (उपाध्याय: 2015)
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