भारत में अंग्रेजों द्वारा वैदेशिक नीति की शुरुआत - The introduction of foreign policy by the British in India

भारत में अंग्रेजों द्वारा वैदेशिक नीति की शुरुआत - The introduction of foreign policy by the British in India

 भारत में अंग्रेजों द्वारा वैदेशिक नीति की शुरुआत - The introduction of foreign policy by the British in India

भारत में अंग्रेजों द्वारा वैदेशिक नीति की शुरुआत

भारत में अंग्रेजों द्वारा साम्राज्य निर्मित करने की प्रक्रिया के क्रम में भारतीय सीमा पर स्थित राज्यों से उनका संबंध स्वाभाविक था। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में पंजाब एवं सिंध को छोड़कर शेष भारत पर अंग्रेजों का नियंत्रण लगभग स्थापित हो गया। पूर्वोत्तर में भारतीय सीमा पर बर्मा भी सामारज्य विस्तार में संलग्न था। लार्ड हेस्टिंग्स ने जब ब्रिटिश सर्वोच्चता के सिद्धान्त का अनुसरण अक्षरशः करना प्रारंभ किया तब बर्मा के साथ कड़ा रुख अपनाना पड़ा। साथ ही अपने नव निर्मित भारतीय साम्राज्य को अन्य यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों से बचाने के लिए भी अंग्रेजों ने एक मजबूत एवं आक्रामक विदेश नीति की शुरूआत की।





प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध (1824 1826 0) -

बर्मा के साथ अंग्रेजों के व्यापारिक संबंध सोलहवीं सदी के अंतिम वर्षों से चले आ रहे थे, परंतु शक्तिशाली बर्मा ने अंग्रेजों को कोई महत्व नहीं दिया। उन्नीसवीं सदी के आरंभ होते ही परिस्थतियाँ बदलीं। अंग्रेज अपनी सफलताओं से महत्वाकांक्षी हो चुके थे तथा बर्मी अपनी विस्तारवादी नीति का अनुकरण कर रहे थे। अराकान एवं असम पर अधिकार को लेकर विवाद प्रारंभ हुआ और अंग्रेजों का बर्मा के साथ युद्ध शुरू हुआ।

प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध के कारण

1824 ई० में प्रारंभ प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध का कारण वर्मा तथा अंग्रेजों के हितों की टकराव था। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में वर्मा के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने के अनेक प्रयत्न किए। अंग्रेजों द्वारा बर्मा भेजे गए दूतों में कैप्टन सिम्स (1795 0), कैप्टन कॉक्स (1797 ई०) पूनः कस्टन सिम्स (1802 ई० तथा 1802 ई०) तथा कैप्टन केनिंग (1809 ई० तथा 1811 ई०) प्रमुख हैं। परंतु शक्तिशाली एवं अहंकारी बर्मा ने इन दूतों को कोई विशेष महत्व नहीं दिया और अंग्रेजों को किसी प्रकार के व्यापारिक या राजनीतिक छूट नहीं दी। अंग्रेज - मराठा संघर्ष के पश्चात अंग्रेजों का मनोबल तथा साम्राज्यवादी मनसा काफी बढ़ चुकी थी। इसलिए दोनो शक्तियों में टकराव अपरिहार्य था।

आंग्ल बर्मा टकराव का दूसरा कारण सीमा विवाद था। बर्मा में आवा को राजधानी के रूप में विकसित कर अलोमपोरा ने वर्मा को एक सामारज्य में परिवर्तित कर दिया। उसने इरावदी नदी क्षेत्र, पेगू, तिनासरीम तथा अराकान क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में बर्मा ने असम तथा मणिपुर पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् सीमा विवाद प्रारंभ हुआ।

अंग्रेजों और बर्मा के बीच तनाव का कारण सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों की समस्या भी थी। अराकान में शोषण एवं दमन से तंग आकर लोग अंग्रेजी साम्राज्य की सीमा में आने लगे। शाहपुरी द्वीप को लेकर प्रारंभ हुआ विवाद भी युद्ध का कारण बना। अंग्रेजों ने बर्मी चुंगी केन्द्र से बचने के लिए टैंक नोफ दरें तथा शाहपुरी देवीप पर अधिकार कर लिया था। इस दद्वीप पर अंग्रेजों ने अपनी पुलिस चौकी बना ली। 1823 ई० में बर्मा ने अंग्रेजों से शाहपुरी द्वीप खाली करने की मांग की, जिसे अंग्रेजों ने अस्वीकार कर दिया। सितम्बर 1823 में बर्मी सेना ने शाहपुरी पर अधिकार करते हुए ढाका तथा मुर्शिदाबाद पर भी आक्रमण की धमकी दे डाली। इस प्रकार तनाव बढ़ता गया एवं संबंध खराब होते गए।

 





कछार में उत्पन्न राजनीतिक परिस्थति ने ऑरल बर्मा युद्ध में तात्कालिक कारण की भूमिका निभायी।

कछार के शासक गोविन्द चंद्र को आंतरिक विद्रोह के कारण राज्य छोड़कर भागना पड़ा। गोविन्द चन्द्र ने अपना आंतरिक शासन अंग्रेजों के हाथ में दे दिया तथा 10 हजार रु० वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया। इसी प्रकार अंग्रेजों ने जयन्तिया के पहाड़ी राज्य पर अपना अधिकार स्थापित किया। वर्मा ने अपनी एक सेना कछार भेजी और दूसरी टूकड़ी को शाहपुरी द्वीप पर एमहर्स्ट इस अवसर की तलाश में था। उसने बर्मा को आक्रांता घोषित करते हुए 24 फरवरी 1824 ई० को बर्मा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

युद्ध

इस प्रकार उपरोक्त कारणों से प्रथम आंग्ल- बर्मा युद्ध प्रारंभ हो गया। बर्मा सैनिक दृष्टि से अंग्रेजी सेना से कमजोर था। परंतु बर्मा की भौगोलिक स्थिति तथा बर्मी सैनिकों की रणनीति बर्मा के पक्ष में थी। बर्मा घने जंगल, दलदल, पहाड़ियों तथा इरावदी, सिवांता एवं सालवीन नदी घाटियों के कारण बाह्य आक्रमण से प्राकृतिक रूप से सुरक्षित था। अंग्रेजों के लिए ये बाधाऐं थी। अंग्रेजों ने दो तरफ से आक्रमण की योजना बनाई। एक सेना उत्तर पूर्व से स्थल मार्ग से भेजी गई जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर के उन प्रदेशों पर प्रभुत्व स्थापित करना था, जिस पर बर्मा ने निगत वर्षों में अधिकार किया था। दूसरी सेना समुद्री मार्ग से रंगून पर अधिकार करने के लिए भेजी गई।

बर्मा के राजा ने सेनापति महाबुंदेला को दक्षिण बुलाया जो 60000 सैनिकों के साथ रंगून के समीप पहुंचा। परंतु दिसम्बर 1824 ई० में पराजित हो गया। महाबुंदेला को पीछे हटना पड़ा। उसने दोनोबेब में मोर्चा संभाला जहां अप्रैल 1825 0 तक अंग्रेजों को रोका। परंतु अचानक गोली लगने से उसकी मृत्यु हो गई और बर्मी सेना ने पीछे हटना प्रारंभ कर दिया। बर्मा के लिए बुंदेला की मृत्यु एक अपूरणीय क्षति थी। कैम्पबेल ने 25 अप्रैल को निचला बर्मा या दक्षिणी बर्मा की राजधानी प्रोम पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजी सेना ने वर्षा का मौसम यहीं बिताया। अंग्रेजों ने बर्मा के साथ वार्ता प्रारंभ की परंतु युद्ध भी चलता रहा। अंग्रेजी सेना बर्मा की राजधानी आवा से केवल 60 मील दूर यांडबू तक पहुंच गई। बर्मियों ने अब संधि का प्रस्ताव भेजा। बर्मा के शासक पंगियोदयो तथा ब्रिटिश भारतीय सरकार के बीच 26 फरवरी, 1826 0 को याण्डबू की संधि हो गई। इस प्रकार प्रथम आंग्ल हुआ। बर्मा युद्ध समाप्त

 




याण्डबू की संधि, 26 फरवरी 1826 ई०

इस संधि के प्रावधान या शर्ते निम्नांकित थी

1. अंग्रेजों ने युद्ध में हुई क्षति की पूर्ति के लिए वर्मा पर एक करोड़ रुपये थोप दिये, जिसे बर्मा ने किस्तों में देने का वचन दिया।

2.अंग्रेजों ने बर्मा से अराकान, तिनसरीम, येह, तवाय तथा मर्गी का क्षेत्र ले लिया। 

3.बर्मा ने असम, कछार तथा जयन्तिया में हस्तक्षेप नहीं करने का वचन दिया।

4. मणिपुर को स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया और बर्मा ने यह स्वीकार किया कि मणिपुर से पलायन कर गया शासक गंभीर सिंह के आने पर उसे राजा के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

5. बर्मा तथा भारत एक दूसरे के साथ दूतों का आदान-प्रदान करेंगे।

6. दोनों के मध्य एक व्यापारिक संधि की जाएगी, जो दोनों के लिए लाभप्रद होगी।

7. दोनों ने एक दूसरे का मित्र होने का वायदा किया।

8. ब्रिटिश रेजिडेण्ट आवा में नियुक्त किया गया। इस प्रकार यह संधि स्पष्टतः अंग्रेजों के पक्ष में थी।

प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध के परिणाम -

इस प्रकार प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध याण्डबू की संधि से समाप्त हुआ। इस युद्ध के परिणामस्वरूप ब्रिटिश रेजिडेण्ट मेजर बनीं की आवा में नियुक्ति हुई। इस युद्ध के कारण अंग्रेजों को बर्मा में सीमित अर्थों में लाभ प्राप्त हुए। राजदरबार में हस्तक्षेप करना शुरू किया। व्यापारिक संधि के द्वारा अनेक अर्थिक लाभ सुरक्षित किए। बर्मा से पूर्वोत्तर क्षेत्र के अधिकृत सभी क्षेत्र अंग्रेजों ने अपने भारतीय साम्राज्य में मिला लिया। जंगल तथा पहाड़ी क्षेत्र की आर्थिक एवं सामरिक महत्व अंग्रेजों की समझ में आ गई और भविष्य में इस क्षेत्र पर पूर्णतः अधिकार की योजना बनानी प्रारंभ कर दी।

 



द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध -

प्रथम आंग्ल बर्मा युद्ध की मिश्रित सफलता के पश्चात अंग्रेज काफी उत्साहित थे। 1837 ई० में बर्मा के नये शासक थारावादी की नीति तथा सिंध पंजाब विजय से उत्साहित अंग्रेजों की नीति के कारण शीघ्र ही बर्मा में हितों का टकराव प्रारंभ दुद्वितीय आंग्ल- बर्मा युद्ध प्रारंभ हो गया। हुआ और डलहौजी के शासनकाल में

द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध के कारण

याण्डबू की संधि दूद्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध का मूल कारण साबित हुई। इस संधि से अंग्रेजों को बर्मा में बढ़त मिली, परंतु बर्मा पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं हुआ। इसलिए अंग्रेज इस संधि से बढ़कर कुछ और अधिक प्राप्त करना चाहते थे। दूसरी तरफ बर्मा राज दरबार तथा जनता दोनों ही इस संधि से खुश नहीं थे। बर्मा के नये शासक थोरावादी (1837) 1845 ई०) ने बर्मी परम्परा का हवाला देते हुए इस संधि को अस्वीकार कर दिया। बर्मी परम्परा के अनुसार नया राजा पुरानी संधियों तथा समझौतों को स्वीकृति प्रदान करता था। पुराने समझौते स्वतः लागू नहीं माने जाते थे। आंग्ल बर्मा युद्ध का दूसरा कारण दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिका और फ्रांस का बढ़ता प्रभाव और उससे उत्पन्न ब्रिटिश आशंका थी। 1840 के दशक में एक बार पुनः अमेरिका तथा फ्रांस की नजर दक्षिण पूर्व एशिया तथा सुदूर पूर्व पर पड़ी। अंग्रेजों ने चीने में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। बर्मा समुद्र से जुड़ा हुआ था तथा चीन एवं भारतीय साम्राज्य के लिए खतरा बन सकता था।

 




ऐसी परिस्थति डलहौजी का भारत में गवर्नर जनरल बनकर आना युद्ध प्रारंभ करने का अवसर बना। डलहौजी घोर साम्राज्यवादी था। उसने भारत में साम्राज्य निर्माण की प्रक्रिया को पूर्ण किया और उसके बाद पड़ोसी देश बर्मा पर नजर डाली। वर्मा और अंग्रेजों के संबंध 1837 ई० के बाद दिन प्रतिदिन खराब हो रहे थे। विवाद का कारण आर्थिक था। बर्मा से व्यापार में जुड़े व्यापारियों की शिकायत थी कि बर्मी अधिकारी निर्धारित कर के अतिरिक्त कर लेते हैं तथा नजराना की मांग करते हैं।

डलहौजी ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और अंग्रेज नागरिकों की सुरक्षा की वचनवद्धता को दोहराया। अंग्रेजों ने शेफर्ड एवं लुइस कम्पनी के बकाया राशि की मांग वर्मा दरबार से की। इसी बीच अंग्रेजों ने बर्मा के शाही जहाज को अधिकृत कर लिया। डलहौजी ने रंगून के गवर्नर को हटाने, क्षमा मांगने तथा अप्रैल 1852 ई० तक ई00000 पौंड की राशि देने की मांग की। साथ ही युद्ध की पूरी तैयारी कर सेनापति जनरल गॉडविन को सेना के साथ बर्मा भेज दिया। बर्मी दरबार कि कर्तव्य 'विमूढ़ हो गया। 1852 ई० में गॉडविन ने पूरी ताकत से युद्ध प्रारंभ कर दिया।

 



द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध 1852 ई०

इस प्रकार आपने देखा कि विभिन्न राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक तथा अन्तर्राष्ट्रीय कारणों से द्वितीय आंग्ल युद्ध प्रारंभ करते बर्मा युद्ध प्रारंभ हुआ। जनरल गॉडविन तथा एडमिरल आस्टेन ने मर्तबान पर अधिकार कर लिया। पगोड़ा को ध्वस्त कर दिया गया। हुए इरावदी डेल्टा के पश्चिम उत्तर में स्थित बसीन पर अधिकार कर लिया गया। सितम्बर में डलहौजी रंगून पहुंच गया। प्रोम पर अंग्रेजों ने अक्टूबर तथा पेगू पर नवम्बर में अधिकार कर लिया। इस प्रकार अंग्रेजों ने शीघ्रता से निचले या दक्षिणी बर्मा पर अधिकार कर लिया। डलहौजी बर्मा पर उस समय अधिकार नहीं करना चाहता था। इसकी मनसा थी कि बर्मा औपचारिक रूप से संधि कर निचले बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य के समर्पित कर दें। परंतु बर्मा ने ऐसा करने से अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप डलहौजी ने एक पक्षीय घोषणा करते हुए 10 दिसम्बर 1852 को पेगू अर्थात् निचले बर्मा को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया और युद्ध समाप्त घोषित कर दिया गया। इस प्रकार द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध केवल आठ महीने में समाप्त हो गया।

द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध के परिणाम

द्वितीय आंग्ल बर्मा युद्ध के परिणामस्वरूप पेगू अथवा निचला बर्मा से ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया गया। इस विलय के पश्चात ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की सीमा सालवीन नदी के किनारे तक विस्तृत हो गई। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण बंगाल की खाड़ी तथा पूर्वी समुद्र तट पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया। शेष बचा बर्मी क्षेत्र समुद्र मार्ग से वंचित हो गया। नव अधिकृत राज्य का कमिश्नर मेजर आर्थर फायर को नियुक्त किया गया। नव नियुक्त कमिश्नर ने कैप्टन फीच की सहायता से प्रशासनिक सुधार प्रारंभ किया। इस प्रकार डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति सफल रही और भविष्य में सम्पूर्ण बर्मा पर अधिकार करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि बर्मा पर भविष्य में अंग्रेज ही अधिकार करेंगे ।

 



तृतीय आंग्ल बर्मा युद्ध

अभी तक आपने अध्ययन किया कि 1852 ई० निचले बर्मा पर अंग्रेजों के अधिकार के पश्चात दोनों के संबंध सुधरने लगे और ऐसा लग रहा था कि ब्रिटिश भारतीय प्रशासन तथा बर्मा के संबंध मधुर रहेंगे। परंतु अंग्रेजों की लालची निगाहें बर्मा पर थी जो 1885 ई० आते आते पुनः युद्ध के कगार पर पहुंच गई और एक निर्णायक युद्ध हुआ जिसमें उद्देश्य था सम्पूर्ण बर्मा पर अधिकार ।

तृतीय आंग्ल बर्मा - युद्ध के कारण

1878 0 तकू वर्मा एवं आरतीय साम्राज्य के बीच संबंध सामान्य रहे। इसी वर्ष मिन्डन की मृत्यु हो गई और भारतीय परिस्थितियां भी परिवर्तित हो गई। वर्मा का शासक बना थीबा, जो काफी उत्साही एवं साहसी था। भारत में गवर्नर जनरल लिटन ने अग्रगामी साम्राज्यवादी नीति प्रारंभ कर रखी थी। इसलिए अंग्रेजों ने वर्मा के नये शासक के समक्ष नयी मांगे रखी थांबा ने राज दरबार में जूते उतारकर प्रवेश करने की परम्परा को समाप्त कूरने की मांग को छोड़कर सभी सुविधाएँ प्रदान कर दी। 1879 ई० में थीचा पूर राज दरबार के कुछ व्यक्तियों की हत्या के आरोप लगे। लिटन के निर्देश पर ब्रिटिश रेजिडेण्ट ने राजा को विरोध प्रदर्शित करते हुए एक पत्र लिखा। वर्मा ने इस पत्र को महत्व नहीं दिया। बर्मा स्थित अंग्रेजों ने मांग की कि सम्पूर्ण वर्मा पर अधिकार कर लिया जाय। ब्रिटिश भारतीय प्रशासन ने यह मांग स्वीकार नहीं की, परंतु बर्मा एवं अंग्रेजों के संबंध खराब होने लगे ब्रिटिश राजदूत ने मांडले छोड़ दिया।

थोवा की वैदेशिक नीति से अंग्रेज खुश नहीं थे। वह अन्य यूरोपीय शक्तियों से संबंध स्थापित करना चाहता था। 1883 0 में उसने एक दूत मण्डल कास भेजा। अंग्रेजों ने स्पष्ट कर दिया कि यह मिशन केवल व्यापारिक होता चाहिए। 1885 0 में हुई विश्दय व्यापारिक संधि को भी अंग्रेजों ने रोका की दृष्टि से देखना शुरू कर किया। इस समय भारतीय गवर्नर जनरल ने फांसीसी प्रभुत्व को रोकने की ठान ली और इसके लिए सम्पूर्ण वर्मा पर अधिकार करना आवश्यक था। 1885 ई० आते आतें अंग्रेजों और बर्मा के संबंध काफी खराब हो चुके थे। दोनों ही पक्ष युदध चाह रहे थे तथा बहाने तलाश में थे। वर्मा मणिपुर सीमा विवाद ने यह अवसर प्रदान किया। सीमांकन आयोग दवारा 1881 ई० से निर्धारित सीमा को बर्मा ने मानने से इनकार कर दिया तथा स्थापित पत्थरों को उखाड़ने की धमकी दे डाली। बर्मा के इस संभावित आक्रमण के विरुदव अंग्रेजों ने मणिपुर को समर्थन देने का वायदा किया।

 





वर्मा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, इसलिए लग रहा था कि युद्ध टल गया। परंतु बर्मा में स्थित बम्बई-बर्मा व्यापारिक कॉरपोरेशन का विवाद प्रारंभ हो गया। यह कम्पनी जंगल के केको काम करती थी। के अधिकारियों ने इस कम्पनी पर 10 लाख रु० कर चोरी तथा बेइमानी का आरोप लगाया। आरोप सिद्ध होने पर वर्मा सरकार ने ठेका रद्द न करके केवल 23,59,066.00 रु0 का जुर्माना लगाया जो चार किश्तों में दिया जाना था। कम्पनी ने भारत सरकार से रक्षा की मांग करते हुए हस्तक्षेप का आग्रह किया भारत सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए अंग्रेज कमिश्नर को भेजा। उसने वर्मा दरबार से इस जुर्माने को रद्द करने तथा मामला भारत के गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को सौंपने की मांग की बर्मा दरबार द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकृत करने पर 22 अक्टूबर 1885 ई० को अनेक मांगे रखी गयी।

 

मार्गों को मानने की सीमा 10 नवम्बर तय की गयी। बर्मा दरबार से 9 नवम्बर को उसका उत्तर मिला जिसमें कहा गया कि राज दरबार कम्पनी की प्रार्थना पर विचार करेगा। दूसरी तरफ गवर्नर जनरल डफरिन ने युदध की तैयारी प्रारंभ कर दी थी। उसने बर्मा पर मागे नहीं मानने का आरोप लगाते हुए 9 नवम्बर 1885 ई० को ही युद्ध की घोषणा कर दी। उधर बर्मा के शासक ने भी युद्ध प्रारंभ कर दियो।




तृतीय आंग्ल बर्मा युद्ध की लड़ाईयां

इस प्रकार आपने अध्ययन किया कि 1852 ई० के बाद अंग्रेजों की अनुचित मांगों के मानने के बावजूद भी बर्मा पर 1885 ई० में दबाव बनाकर उसकी आंतरिक एवं विदेश नीति पर नियंत्रण का प्रयास अंग्रेजों ने किया और असफल होने पर युद्ध की घोषणा कर दी। शीघ्र ही अंग्रेजों ने मांडले पर अधिकार कर लिया तथा वर्मा के शासक थीवा में आत्मसमर्पण कर दिया। अपने ही महल में बन्दी के रूप में रहा, जिसे बाद में महाराष्ट्र के रत्नागिरी नामक स्थान पर राजनीतिक कैदी के रूप में रखा गया। 01 जनवरी 1886 ई० उपरि बर्मा को भी ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी गयी। इस प्रकार सम्पूर्ण बर्मा पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया। इस प्रकार यह निर्णायक युद्ध दो महीने के अंदर ही समाप्त हो गया।

 

तृतीय आंग्ल बर्मा युद्ध के परिणाम -

 

तृतीय आंग्ल बर्मा युद्ध जो 1885 ई० में लड़ा गया काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ। उपरि बर्मा को अधिकृत कर लिया गया जिससे सम्पूर्ण बर्मा पर अंग्रेजों का एकाधिकार स्थापित हो गया। अंग्रेजों ने रंगून की बर्मा की नई राजधानी बनाई। इस समय ब्रिटिश साम्राज्य की सीमा चीन तक विस्तृत हो गई। वर्मा को भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य में एक राज्य का दर्जा दिया गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण पूर्वी भारतीय समुद्र तट तथा बंगाल की खाड़ी पर अंग्रेजों का अधिकार पूर्ण हो गया।

बर्मा नीति की आलोचना

इस प्रकार उपरोक्त विवरण में आपने अध्ययन किया कि अंग्रेजों ने धीरे धीरे सम्पूर्ण बर्मा पर अधिकार कर लिया। बर्मा के साथ हुए तीन युद्धों में व्यय की गई राशि भारतीय राजस्व से दी गई जिससे भारत का शोषण बढ़ा। बर्मा का भारतीय साम्राज्य में विलय अंग्रेजों की लालची प्रवृत्ति तथा नंगा साम्राज्यवाद का जीता जागता उदाहरण है। अंग्रेजों ने फ्रांसीसी प्रभुत्व का बहाना बनाकर अपने आर्थिक लाभ के लिए बर्मा पर अधिकार किया। पी०ई० रावर्ट्स का कहना कि अंग्रेजों ने पूरब के इस 'अर्दध सम्य' क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के "सम्य बनाने के मिशन" का उदाहरण है।

विलय के पश्चात बर्मा की स्थिति

अंग्रेजों ने 1886 ई० में बर्मा पर अधिकार करने के पश्चात उसे ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया और एक प्रांत का दर्जा दिया। लगभग एक दशक तक बर्मा में गुरिल्ला युद्ध तथा विद्रोह चलते रहे। सीमा पर स्थित जनजातियों जैसे शान तथा शिन का विरोध काफी समय तक चला। परंतु धीरे धीरे अंग्रेजों ने अपनी लोकप्रिय नीतियों के कारण बर्मा में शांति स्थापित कर ली। 1935 ई० के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत बर्मा को एक अलग प्रांत बनाने की घोषणा की गई। इस प्रावधान के अंतर्गत वर्मा को 1 अप्रैल 1937 ई० को भारत से अलग करते हुए अलग औपनिवेशिक राज्य की श्रेणी में रखा गया। इस प्रकार बर्मा की इंगलैण्ड प्रत्यक्ष प्रशासन तथा शोषण प्रारंभ हुआ।

विलय के पश्चात बर्मा की स्थिति

अंग्रेजों ने 1886 ई० में बर्मा पर अधिकार करने के पश्चात उसे ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया और एक प्रांत का दर्जा दिया। लगभग एक दशक तक बर्मा में गुरिल्ला युद्ध तथा विद्रोह चलते रहे। सीमा पर स्थित जनजातियों जैसे शान तथा शिन का विरोध काफी समय तक चला। परंतु धीरे धीरे अंग्रेजों ने अपनी लोकप्रिय नीतियों के कारण बर्मा में शांति स्थापित कर ली। 1935 ई० के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत बर्मा को एक अलग प्रांत बनाने की घोषणा की गई। इस प्रावधान के अंतर्गत वर्मा को 1 अप्रैल 1937 ई० को भारत से अलग करते हुए अलग औपनिवेशिक राज्य की श्रेणी में रखा गया। इस प्रकार बर्मा की इंगलैण्ड प्रत्यक्ष प्रशासन तथा शोषण प्रारंभ हुआ।