इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या ( मार्क्सवादी सिद्धांत) - Materialistic Interpretation of History (Marxist Theory)
इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या ( मार्क्सवादी सिद्धांत) - Materialistic Interpretation of History (Marxist Theory)
इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या ( मार्क्सवादी सिद्धांत)
कार्ल मार्क्स के समाजवादी विषयक विचार
कार्ल मार्क्स की विचारधारा पर फांसीसी समाजवादी विचारकों सेंट साइमन, चार्ल्स
फुरिए, लुई ब्लां तथा ब्रिटिश समाजवादी विचारक राबर्ट ओवेन
के चिन्तन का भी प्रभाव पड़ा था। अठारहवीं शताब्दी के अन्त में हुई औद्योगिक
क्रान्ति ने समस्त विश्व के और विशेषकर पाश्चात्य समाज और अर्थ व्यवस्था के स्वरूप
में आमूल परिवर्तन कर दिया था। औद्योगिक क्रान्ति ने समाज में पूंजीपति एवं मजदूर
वर्ग को जन्म दिया। आर्थिक विषमता बढ़ने के साथ-साथ पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर
वर्ग का अनवरत शोषण होने लगा। मार्क्स की विचारधारा पर इस बदली हुई सामाजिक और
आर्थिक व्यवस्था का भी गहन प्रभाव पड़ा था। मार्क्स अपने पूर्ववर्ती जर्मन
दार्शनिक हीगेल के द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद से प्रभावित था जिसने कि यह प्रतिपादित
किया था कि समाज का विकास संघर्ष के माध्यम से ही होता है।
प्रथम इण्टरनेशनल
समाजवादी आन्दोलन के इतिहास की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटना ब्रिटिश, फ्रांसीसी, बेलजियन तथा स्विस मजदूर संगठनों को एकजुट करके 1864 में स्थापित प्रथम इण्टरनेशनल की स्थापना थी जो कि कार्ल मार्क्स की देन थी। प्रथम इण्टरनेशनल' में मार्क्स ने मजदूरों की ओर से दिए गए अपने भाषण में इस समिति के सिद्धान्तों और लक्ष्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की। मार्क्स ने मज़दूर वर्गों का आवाहन किया कि वो अपनी मुक्ति की लड़ाई स्वयं लड़ें। मज़दूर वर्ग के संघर्ष में विश्व व्यापी चरित्र पर बल दिया गया। इस इण्टरनेशनल का लक्ष्य शासक वर्ग का सम्पूर्ण उन्मूलन घोषित किया गया। प्रथम इण्टरनेशनल को उसकी स्थापना के समय से ही तत्कालीन सरकारों ने अपने लिए एक खतरा माना और उसके दमन के अनेक प्रयास किए गए। अनेक देशों में उसे अवैध घोषित कर दिया गया। इसने अपने अल्पकालीन जीवन (1864 से 1875) के दौरान यूरोप और उत्तरी अमेरिका के मज़दूर आन्दोलनों पर गहरा प्रभाव डाला।
कार्ल मार्क्स की मृत्यु 1883 में हो गई थी किन्तु 1889
में आयोजित द्वितीय इण्टरनेशनल' उसी के
प्रयासों की अगली कड़ी थी।
कार्ल मार्क्स की रचनाएं
कार्ल मार्क्स की अनेक रचनाओं में हम 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो (सह-लेखक-फ्रेडरिक एन्गेल्स), दास कैपिटल' तथा 'दि जर्मन आइडियोलोजी' को उसकी प्रमुख कह सकते हैं। 'दास कैपिटल' के प्रथम खण्ड का सर्वप्रथम प्रकाशन 1867 में रचनाएं हुआ। मार्क्स की मृत्यु के उपरान्त उसके द्वारा छोड़ी गई पाण्डुलिपियों के आधार पर एन्गेल्स ने उसके शेष दो खण्डों का प्रकाशन करवाया। इनके अतिरिक्त उसने ऐन इन्ट्रोडक्शन टु ए क्रिटीक ऑफ़ हीगेलियन फ़िलॉसफी ऑफ राइट्स' (1843) 'पॉवर्टी ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी- ए क्रिटीक ऑफ़ प्राउडहॉन' (1847), डिस्कोर्स अपॉन दि क्वेश्चन ऑफ़ फ्री एक्सचेन्ज' (1848) 'क्लास स्ट्रगल इन फांस 1848-50 (1850), 'होली फ़ैमिली', 'ऐन इन्ट्रोडक्शन टु क्रिटीक ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनॅमी' (1859), 'वैल्यू, प्राइस एण्ड प्रॉफ़िट', 'होली फैमिली' आदि की भी रचना की है। एक पत्रकार के रूप में मार्क्स ने 'न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून', 'दि स्पेक्टेटर में विचारोतेजक लेख लिखे तथा 'एनसाइक्लोपीडिया अमेरिकाना में भी उसके अनेक लेख सम्मिलित किए गए हैं।
वर्ग संघर्ष और इतिहास की भौतिकतावादी व्याख्या
वर्ग संघर्ष
प्रसिद्ध ब्रिटिश विचारक बटॅण्ड रसेल अपनी पुस्तक प्रपोज्ड रोड टु फ्रीडम में लिखता है। समाजवाद उन्नीसवीं शताब्दी के दर्शन का एक प्रेरक बल था जिसने कि मानव जाति को एक श्रेष्ठतर व्यवस्था देने के लिए कल्पनाशीलता के साथ ठोस रूप से व्यावहारिक प्रयास किया था। मार्क्स ने समाजवाद के सिद्धान्तों और उसके उद्देश्यों, उनकी उत्पत्ति की ऐतिहासिक अनिवार्यता एवं प्राप्ति के तरीकों तथा नए समाजवादी समाज की रूपरेखा प्रस्तुत की ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर उसने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पूंजीवादी समाज का विनाश तथा निकट भविष्य में समाजवादी क्रान्ति की सफलता अवश्यम्भावी है। मार्क्स इतिहास की भाँतिकवादी व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट करता है कि ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्राचीन समाज का आधार दासता सामन्तवादी समाज का आधार 'भूमि' तथा मध्यवर्गीय समाज का आधार पूंजी है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मार्क्स ने हमको बताया है कि समाज का इतिहास आर्थिक कारकों से निर्धारित होता है और यह कि इतिहास वर्ग संघर्ष का अभिलेख है। इस प्रकार मार्क्स की समाजशास्त्रीय प्रणाली के दो आधार स्तम्भ हैं इतिहास का भौतिकवादी विचार और वर्ग-संघर्ष
ऐतिहासिक भौतिकतावाद
मार्क्स की अवधारणा है कि आर्थिक परिस्थितियों तथा उत्पादन की
विधियों ने अपने-अपने समय की सामाजिक संरचना को निर्धारित किया है। उसकी दृष्टि
में पाश्चात्य यूरोप में एक-एक करके पाँच अवस्थाएं आई जिनमें कि उसकी भौतिक
परिस्थितियों का विकास हुआ है। इनमें पहली अवस्था थी आदिम साम्यवाद, जहां कि
सम्पत्ति का सभी के मध्य बटवारा किया जाता
या और तब नेता की अवधारणा अस्तित्व में ही नहीं थी। दूसरी अवस्था में पहली अवस्था का विकास दास तथा दास स्वामी समाज में हुआ जहां कि वर्ग का विचार तथा राज्य की अवधारणा का विकास हुआ।
तीसरी अवस्था सामन्तवाद के उदय की है जिसमें कि आभिजात्य वर्ग ने धर्मतन्त्र के साथ मिलकर निम्न वर्ग का दोहन किया। यह युग भू-स्वामियों तथा कृषि-दासों का था और इसी काल में राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ।
चौथी अवस्था में मध्यवर्गीय क्रान्ति के बाद पंजीवादी युग के पदार्पण
की है जब कि पंजीपतियों ने (अथवा उनके पूर्ववर्ती व्यापारियों ने) सामन्ती
व्यवस्था को उखाड़ फेंका और निजी सम्पत्ति व संसदीय लोकतन्त्र के साथ-साथ एक
बाज़ारी अर्थव्यवस्था की स्थापना की। यह युग स्वामी और श्रमिक का है। मार्क्स आने
वाले समय में अन्तिम पाँचवी अवस्था के विषय में भविष्यवाणी करता है कि इसमें सर्वहारा
वर्ग द्वारा क्रान्ति का सूत्रपात होगा जिसका परिणाम समाजवाद की प्राप्ति और
अन्ततः साम्यवाद की स्थापना होगा। इस अवस्था में किसी भी प्रकार की सम्पति पर किसी
एक का नहीं अपितु समुदाय का स्वामित्व होगा।
माक्सवाद में विश्लेषण एवं विवेचना का प्रमुख आधार इतिहास है और उसके
द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों मूल आधार भी इतिहास ही है। इतिहास को मार्क्स ने एक
व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था। किन्तु उसकी इतिहास की अवधारणा का मुख्य आधार
आर्थिक जीवन है।
ऐतिहाँसिक (वन्द्वात्मक भौतिकवाद वह प्रणालीतन्त्रीय दृष्टिकोण है जो
कि समाज, अर्थशास्त्र
तथा इतिहास का अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम कार्ल मार्क्स ने इतिहास की भौतिकवादी
अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया था। यह सामाजिक आर्थिक विकास का वह सिद्धान्त है
जिसके अनुसार भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन (तकनीक तथा उत्पादक क्षमता में) को
समाज व अर्थ-व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है।
मार्क्सवादी इतिहासकार
कार्ल मार्क्स के समकालीन हेनरी मार्गन ने 'एंशियेन्ट सोसायटी में आदिम समाजू की भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत कर माक्सवादी इतिहास लेखन का प्रारम्भ कर दिया था। ब्लादीमिर लेनिन की पुस्तक व्हाट इज टू बी इन (1902) ने आमूल कान्ति की आवश्यकता पर बल दिया गया था। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटिश इतिहाकार आर० एच० टानी की रचनाओं "दि एयरियन प्रॉबलम इन दि सिक्सटी सेन्चुरी (1912) तथा रिलीजन एण्ड दि राइज ऑफ कैपिटलिज्म (1926), क्रिस्टोफर हिल की रचनाओं इकॉनमिक प्रॉबलम्स ऑफ दि चर्च' (1956), प्योरिटेनिज्म एण्ड रिवोल्यूशन (1958), 'इन्टलेक्चुअल मोरिजिन्स ऑफ दि इंग्लिश रिवोल्यूशन (1965) तथा दि वई टई अपूसाइड डाउन (1972) में इतिहास के विकास में आर्थिक कारकों की महता दशाई गई है।० एच० हॉब्सबॉम की पुस्तक लेबरिंग मैन (1964), श्रमिक वर्ग का विश्लेषणात्मक इतिहास है। ई० पीछे टॉमसुन ने दि मेकिंग ऑफ दि इंग्लिश वर्किंग क्लास (1963) ई० एच० कार ने व्हाट इज हिस्ट्री (1951) भारत में मार्क्सवादी इतिहास लेखन की परम्परा के प्रारम्भिक प्रयासों में बी० एन० दूत की दो पुस्तको 'डायलेक्टिक्स ऑफ लैण्ड ओनरशिप इन इण्डिया तथा कास्ट एण्ड क्लास इन एशियेन्ट इण्डिया डी० डी० कोसाम्बी ने "एन इन्ट्रोडक्शन टू दि स्टडी ऑफ हिस्ट्री (1956) तथा कल्चर एण्ड सिविलाइजेशन ऑफ एशियेन्ट इण्डिया (1964) आर एस० शर्मा की पुस्तकों में इण्डियन फ्यूइलिज्म (1965), लाइट ऑन अली इण्डियन सोसायटी एण्ड इकानेंमी (1966), तथा शूद्राज इन एशियन्ट इण्डिया (1980) उल्लेखनीय है। रोमिला थापर की अशोक एण्ड दि डिक्लाइन ऑफ दि मौर्याज (1963), एशियेन्ट इण्डियन
सोशल हिस्ट्री (1978) आदि प्राचीन भारतीय इतिहास की प्रमुख मार्क्सवादी पुस्तकें हैं। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में इरफान हबीब की पुस्तक एगेरियन सिस्टम ऑफ मुगल इण्डिया नूरुल हसन, हरबंस मुखिया, बी० एल० बोवर आदि ने मध्यकालीन भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रकाश डाला है।
आधुनिक भारत के इतिहास का मार्क्सवादी दृष्टिकोण हमको रजनी पाम दत्त की इण्डिया टुडे, एम० एन० राय की पॉवर्टी और प्लेन्टी तथा गांधिज्म, नेशनलिज्म, सोशलिज्म ए० आर० देसाई की सोशल बैंकण्ड ऑफ इण्डियन नेशनलिज्म तथा पीजेन्ट स्ट्रगल्स इन इण्डिया बिपन चन्द्रा की राइज एण्ड गोथ ऑफ़ इकोनमिक नेशनलिज्म इन इण्डिया तथा समीत सरकार की स्वदेशी मुवमेन्ट इन बंगाल के एमए यूनिकर को अगेन्स्ट लोई एण्ड स्टेट' (1989) तथा कोलोनियलिज्म कल्चर एण्ड रेजिस्टेन्स आदि रचनाओं में मिलता
गैम्सकी, ई० पी० टॉमसन तथा एरिक हॉब्सबाम जैसे ब्रिटिश
सामाजिक इतिहासकारों से प्रभावित होकर रंजीत ग्रहों और उनके साथियों ने इतिहास तथा
मानव-विज्ञान को संयोजन कर उत्तर औपनिवेशिककालीन भारत के इतिहास लेखन को एक नयी
दिशा प्रदान की।
सारांश
कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाज शास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार
तथा क्रान्तिकारी समाजवादी था। भौतिक कारक को इतिहास में निर्धारक कारक के रूप में
प्रतिष्ठित करना उसके इतिहास लेखन की वह विशेषता है जो उससे पूर्व के इतिहास लेखन
में सर्वथा अनुपस्थित थी। आधुनिक युग में मार्क्स की अर्थशास्त्र विषयक रचनाओं ने
श्रमिक और पूंजी के पारस्परिक सम्बन्धों की समझ को एक आधार प्रदान किया है और
परवर्ती अर्थशास्त्रियों के आर्थिक चिन्तन को अत्यधिक प्रभावित किया है। मार्क्स
की कृति दास कैपिटल में इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या की गई है। कम्युनिस्ट
मैनिफेस्टो (सह-लेखक-फ्रेडरिक (एन्गेल्स), तथा 'दि जर्मन आइडियोलोजी उसकी अन्य प्रमुख रचनाएं हैं। मार्क्स के समाज,
अर्थशास्त्र तथा राजनीति विषयक सिद्धान्तों के कुल जोड़ को हम 'मार्क्सवाद' के रूप में जानते हैं। मार्क्स ने
समाजवाद के के सिद्धान्तों और उसके उद्देश्यों, उनकी
उत्पत्ति की ऐतिहासिक अनिवार्यता एवं प्राप्ति के तरीकों तथा नए समाजवादी समाज की
रूपरेखा प्रस्तुत की ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर उसने यह सिद्ध करने का प्रयास
किया कि पूंजीवादी समाज का विनाश तथा निकट भविष्य में समाजवादी क्रान्ति की सफलता
अवश्यम्भावी है। मार्क्सवाद में विश्लेषण एवं विवेचना का प्रमुख आधार इतिहास है और
उसके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त मूल आधार भी इतिहास ही है। इतिहास को मार्क्स ने
एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था किन्तु उसकी इतिहास की अवधारणा का मुख्य आधार
आर्थिक जीवन है।
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