समाज कार्य के नैतिक मूल्य - moral values of social work

समाज कार्य के नैतिक मूल्य - moral values of social work

समाज कार्य के नैतिक मूल्य - moral values of social work


कॉस ने समाज कार्य के 10 प्राथमिक मूल्यों का उल्लेख किया है


मनुष्य की महत्ता तथा गरिमा


मानव प्रकृति में पूर्ण मानवीय विकास की क्षमता


मतभेदों के लिए सहनशीलता


मौलिक मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि


स्वाधीनता में विश्वास |


आत्म निर्देशन |


अनिर्णायक प्रवृत्ति


रचनात्मक सामाजिक सहयोग |


कार्य का महत्व तथा रिक्त समय का रचनात्मक उपयोग मनुष्य एवं प्रकृति द्वारा उत्पन्न किए गए खतरों से अपने अस्तित्व की रक्षा |


कॉर्नाांका ने समाज कार्य के 2 प्राथमिक मूल्यों का उल्लेख किया है:


प्रत्येक व्यक्ति का आदर तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं के पूर्ण विकास का अधिकार।


व्यक्तियों की पारस्परिक निर्भरता तथा एक-दूसरे के प्रति अपनी योग्यता के अनुसार उत्तरदायित्व


संयुक्त राष्ट्र ने समाज कार्य के निम्न दार्शनिक एवं नैतिक मूल्यों एवं मान्यताओं का उल्लेख किया है।


किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि स्थिति, जाति, धर्म, राजनैतिक विचारधारा तथा व्यवहार को ध्यान में रखे बिना उसके महत्व, मूल्य या योग्यता को मान्यता प्रदान करना तथा मानव प्रतिष्ठा एवं आत्म-सम्मान को प्रोत्साहित करना।


१ व्यक्तियों वर्गों एवं समुदाय के विभिन्न मर्ती का आदर करने के साथ-साथ जन कल्याण के साथ उनका सामन्जस्य स्थापित करना।


आत्म-सम्मान एवं उत्तरदायित्व पूरा करने की योग्यता बढ़ाने की दृष्टि से स्वावलम्बन को प्रोत्साहित करना।


व्यक्तियों वर्गों अथवा समुदायों की विशेष परिस्थितियों में संतोषमय जीवन निर्वाह करने हेतु समुचित अवसरों में वृद्धि करना।


हर्बट बिस्ती ने समाज कार्य के दर्शन का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने समाज कार्य दर्शन को 4 क्षेत्रों में विभाजित किया है: व्यक्ति की प्रकृति के संदर्भ में समूहों, व्यक्तियों एवं समूहों और व्यक्तियों के आपसी संदर्भ में समाज कार्य की प्रणालियों एवं कार्यों के संदर्भ में सामाजिक कुसमायोजन एवं सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में








 व्यक्ति की प्रकृति के संदर्भ में


व्यक्ति अपने अस्तित्व के कारण ही मूल्यवान है।


मानवीय पीड़ा अवांछनीय है अतः इसको दूर किया जान चाहिए अन्यथा जहां तक संभव कम किया जाना चाहिए।


समस्त मानव व्यवहार जैविकीय अवयव तथा उसके पर्यावरण के बीच अन्तः क्रिया का


परिणाम है।


मनुष्य सम्भवतः विवेकपूर्ण कार्य नहीं करता है।


जन्म के समय मनुष्य अनैतिक तथा असामाजिक होता है। मानव आवश्यकताएं वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार की होती हैं।


मनुष्यों में महत्वपूर्ण अंतर होते हैं। अत: उन्हें अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए।


मानव सम्प्रेरणा जटिल एवं अस्पष्ट होती है।


व्यक्ति के प्रारम्भिक विकास में पारिवारिक सम्बन्धों का प्राथमिक महत्व होता है।


सीखने की प्रक्रिया में अनुभव एक आवश्यक पहलू है।