प्रेरणा - Motivation
प्रेरणा व्यक्ति की ऐसी आन्तरिक अवस्था है जिसके उत्पन्न होने पर वह बैचेनी का अनुभव करता है और इसे दूर करने के लिए एक विशेष प्रकार की क्रिया करता है। इस आन्तरिक अवस्था की उत्पत्ति किसी-न-किसी प्रकार की आवश्यकता की कमी या इच्छा से होती है।
• व्यक्ति जब किसी प्रकार की आवश्यकता से अग्रसर होकर किसी क्रिया को करता है, तब उसकी वह क्रिया आवश्यकता की पूर्ति होने अथवा उद्देश्य को प्राप्त करने की अवस्था तक चलती रहती है और आवश्यकता की पूर्ति होते ही वह क्रिया समाप्त हो जाती है। तथा व्यक्ति की बैचेनी दूर हो जाती है। इसे आवश्यकता प्रणोदन-प्रोत्साहन चक्र के रूप में भी जाना जाता है।
• अभ्रिपेरक दो प्रकार के होते हैं-जन्मजात अथवा जैविक तथा अर्जित अथवा समाजजनित। जैविक प्रेरक के अन्तर्गत भूख, प्यास, सेक्स, मातृत्व भाव, मलोत्सर्जन, नींद आदि आते हैं। सामजजनित प्रेरक के अन्तर्गत सामुदायिकता, अर्जनात्मकता, जिज्ञासा, आत्मसम्मान तथा कलह सार्वजनिक अर्जित प्रेरक हैं जबकि उपलब्धि प्रेरणा, आकांक्षा-स्तर आदत की विवशता, अभिरूचियां, मनोवृत्तियां आदि वैयक्तिक अर्जित प्रेरक हैं।
अभिप्रेरणा के निम्नलिखित सिद्धान्त लोकप्रिय हैं- मनोविश्लेषणात्मक, ज्ञानवादी व्यवहारवादी, शारीरिक तथा आवश्यकता पदानुक्रम
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