आर्थिक विकास की प्रकृति - Nature of Economic Development
आर्थिक विकास की प्रकृति - Nature of Economic Development
स्थैतिक अर्थशास्त्र (Static Economics)
Static शब्द का सामान्य अर्थ है स्थिर रहना
अर्थशास्त्र में स्थैतिक शब्द का आशय गतिहीन अवस्था से नहीं होता बल्कि उस अवस्था से होता है जिसमें परिवर्तन तो हो परन्तु इन परिवर्तनों की गति अत्यंत कम हो
प्रो. हैराड के अनुसार "एक स्थैतिक संतुलन का अर्थ विश्राम की अवस्था से नहीं होता बल्कि उस अवस्था से होता है जिसमें कार्य निरंतर रूप से दिन-प्रतिदिन अथवा वर्ष प्रतिवर्ष हो रहा हो परन्तु उसमें वृद्धि अथवा कमी न हो रही हो
इस सक्रिय परन्तु परिवर्तनीय प्रक्रिया को स्थैतिक अर्थशास्त्र कहा जाता है
प्रावैगिक अर्थशास्त्र (Dynamic Economics)
प्रो. हैराड (Harrod) के अनुसार :
प्रावैगिक अर्थशास्त्र का सम्बन्ध विशेषतया निरंतर परिवर्तनों के प्रभाव तथा निर्धारित किये जाने वाले मूल्यों में परिवर्तन की दरों से होता है
प्रो. जे. बी. क्लार्क (J B Clark) के अनुसार प्रावैगिक अर्थशास्त्र के प्रमुख पाँच लक्षण निम्नवत हैं :
1 जनसंख्या में वृद्धि
2 पूँजी व पूँजी निर्माण में वृद्धि 3 उत्पादन विधियों में सुधार
4 औद्योगिक संगठनों के स्वरूपों में परिवर्तन
5 उपभोक्ता की आवश्यकताओं में वृद्धि
अतः यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास गत्यात्मक (dynamic) प्रकृति का है
प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि मानदण्ड Per Capita Income Criteria
आधुनिक समय में अधिकाँश अर्थशास्त्रियों का मत है कि राष्ट्रीय आय आर्थिक विकास का सही मानदण्ड नहीं है। बल्कि देश में प्रति व्यक्ति आयू में होने वाली वृद्धि को उस देश में आर्थिक विकास के अभिसूचक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए
इसका कारण यह है कि अल्पविकसित देशों में में मुख्य समस्या जीवन स्तर में सुधार करने की होती है और जीवन स्तर का प्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रति व्यक्ति आय से होता है।
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