शोध में तथ्यों के विश्लेषण की आवश्यकता - Need for analysis of data in research
शोध में तथ्यों के विश्लेषण की आवश्यकता - Need for analysis of data in research
तथ्यों के विश्लेषण के बिना शोध कार्य स्वयं में अधूरी प्रक्रिया है। पी.वी. यंग द्वारा वैज्ञानिक विश्लेषण को ‘शोध का रचनात्मक पक्ष’ माना गया है। अधिकांश समाज विज्ञानी इसे पूर्ण रूप से शोधकर्ता की रचनात्मकता और कुशलता से संदर्भित करते हैं और उनका मानना है कि शोध की गुणवत्ता और वैधता की निर्मिति के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण आवश्यक चरण होता है। सामाजिक शोधकर्ता किसी भी तर्क अथवा घटना को स्वयं सिद्ध नहीं मानता है, अपितु वह संकलित तथ्यों स्थापित व पूर्व के आदर्शों और सामाजिक दर्शन को अधिक विश्वसनीय मानता है। इस दृष्टि से उसे किसी भी निष्कर्ष को प्रतिपादित
अथवा प्रस्तुत करने से पूर्व संकलित किए गए तथ्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण (कभी-कभी पुनर्परीक्षण) करना आवश्यक होता है। इस प्रकार से ही एक शोधकर्ता समस्या का निवारण, ज्ञान में वृद्धि, अवधारणाओं की निर्मिति संशोधन अथवा उसके अस्तित्व को चुनौती आदि कार्यों में संलिप्त हो पाता है। इसके अलावा शोधकर्ता तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर स्वयं की एक अंतर्दृष्टि को विकसित करता है जिसके आधार पर वह सिद्धांतों अवधारणाओं का पुनर्परीक्षणकरता है।
पी.वी. यंग के अनुसार, "क्रमबद्ध विश्लेषण का कार्य एक ठोस बौद्धिक 'भवन' का निर्माण करना है जो कि संकलित तथ्यों को उनके उचित स्थान तथा सम्बन्धों में प्रस्थापित करने में सहायक हो। जिससे उनसे सामान्य निष्कर्षों को प्राप्त किया जा सके।"
यंग के इस कथन से स्पष्ट होता है कि तथ्यों के विश्लेषण के बिना किसी भी समस्या अथवा घटना के कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या करना संभव नहीं है और ना ही यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति संभव है। वैज्ञानिक नियमों की निर्मिति और वैधानिकता का निर्धारण तथ्यों के विश्लेषण के आधार पर ही किया जा सकता है। पूर्व के सिद्धांतों और अवधारणाओं के परीक्षण और उनकी प्रासंगिकता पर सवालिया निशान लगाने की दृष्टि से भी संकलित तथ्यों का विश्लेषण महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।
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