नीति आयोग की स्थापना - NITI Aayog Establishment
नीति आयोग की स्थापना - NITI Aayog Establishment
जनवरी 2015 को स्थापित नीति आयोग के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया गया था, वह इसकी स्थापना की पृष्ठभूमि और विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालता है अतएव उस प्रस्ताव का अध्ययन हमारे लिए महत्वपूर्ण होगा। उसका स्वयं को भटकाव की ओर ले जाता है।'
प्रस्ताव निम्नानुसार है महात्मा गांधी ने कहा था: 'सतत् विकास जीवन का नियम है, और जो व्यक्ति हमेशा हठ धर्मिता को बनाए रखने की कोशिश करता है, इस भावना को प्रदर्शित करते हुए और नए भारत के बदले माहौल में, शासन और नीति के संस्थानों को नई चुनौतियों को अपनाने की जरूरत है और यह अनिवार्य रूप से भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतोंहमारी सभ्यता के इतिहास से ज्ञान के भंडार और वर्तमान सामाजिक/सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। भारत के नागरिकों को शासन और गतिशील नीति बदलावों में संस्थागत सुधारों की जरूरत है, जिससे अभूतपूर्व बदलाव की रूपरेखा तैयार होसके और उसका पोषण हो सके। योजना आयोग का गठन एक मंत्रीमंडलीय प्रस्ताव के जरिए 15 मार्च, 1950 को किया गया था। लगभग 65 वर्षों के बाद देश ने खुद में परिवर्तन किया है।
एक अर्द्ध विकसित अर्थव्यवस्था से एक उभरते वैश्विक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में आमूल-चूल पहले हम केवल अपना अस्तित्व बनाए रखने की भावना से ग्रस्त थे, पर अब हमारी उम्मीदें आसमान छू रही हैं और हम गरीबी में कमी लाने का नहीं, बल्कि गरीबी को खत्म करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत के लोगों को उनकी भागीदारी के जरिए शासन में प्रगति और बेहतरी लाने की काफी उम्मीदें हैं। पिछले कुछ दशकों के दौरान भारतीय राष्ट्रीयता की मजबूती भी प्रदर्शित हुई है।
भारत विभिन्न भाषाओं, विश्वासों और सांस्कृतिक प्रणालियों वाला एक विविधतापूर्ण देश है। एक बाधा बनने की बजाए इस विविधता ने भारतीय अनुभवकी संपूर्णता को समृद्ध बनाया है। राजनीतिक रूप से भी, भारत ने बहुवाद को व्यापक तरीके से अंगीकार किया है और सरकारी विनियंत्रण में संघीयसर्वसहमतियों को नया आकार दिया है। राज्य केन्द्र के केवल अनुबंध बन कर नहीं रहना चाहते बल्कि वे आर्थिक विकास और प्रगति के शिल्प के निर्धारण में अपना निर्णायक अधिकार चाहते हैं। एक ही सिद्धांत वाले दृष्टिकोण, जो केन्द्रीय योजना में अक्सर अंतर्निहित होता है, में गैर-जरूरी तनाव पैदा करने और राष्ट्रीय प्रयास की संपूर्णता को कमतर बनाने की क्षमता होती है। डॉ. अम्बेडकर ने दूरदर्शितापूर्वक कहा था कि वहां अधिकारों को केन्द्रीकृत करना अविवेकपूर्ण है, जहां केन्द्रीय नियंत्रण और एकरूपता स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं है या इसका उपयोग नहीं हो सकता।'
भारत के बदलाव की गतिशीलता के हृदय में एक प्रौद्योगिकी क्रांति और सूचनाओं तक बेहतर पहुंच और उन्हेंझाझा करने की भावना अंतर्निहित है। इस बदलाव की प्रक्रिया में कुछ परिवर्तनों का, जहां अनुमान लगाया जाता है औरयोजना बनाई जाती है, इनमें से कई बाजार तत्वों और बड़े वैश्विक बदलावों के परिणामस्वरूप हैं। हमारे संस्थानों और राजनीति का उद्भव और परिपक्वता भी केन्द्रीकृत योजना की भूमिका को निम्न बना देती है, जिसे खुद में ही पुनपर्रिभाषित करने की जरूरत है।
भारत में बदलाव लाने वाली ताकतों में निम्नलिखित शामिल हैं:
l. हमारे उद्योग और सेवा क्षेत्रों का विकास हुआ है और अब उनका वैश्विक स्तर पर संचालन हो रहा है। इस नींव पर निर्माण करने के लिए नये भारत को एक प्रशासनिक बदलाव की जरूरत है, जिसमें सरकार 'सक्षमकारी' हो न कि पहला और आखिरी सहारा। औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्रों में एक 'कंपनी' के रूप में सरकार की भूमिका को कम किया जाना चाहिए। इसकी जगह सरकार को कानून बनाने, नीति निर्माण करने तथा विनियमन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
II. कृषि में भारत की पारंपरिक ताकत प्रौद्योगिकी में बेहतरी की बदौलत बढ़ी है। हमें अपनी बेहतरी बनाए रखने की जरूरत है और शुद्ध खाद्य सुरक्षासे आगे बढ़कर कृषि उत्पादन के मिश्रण तथा किसानों को उनकी उपज से मिलने वाले वास्तविक लाभ पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
III. हम एक 'वैश्विक गांव में रहते हैं, जो आधुनिक आवागमन, संचार और मीडिया तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजारों और संस्थानों की आपसी नेटवर्किंग से जुड़ा है। जहां भारत वैश्विक घटनाओं में योगदान देता है, इस पर हमारी सीमाओं से बहुत दूर घटने वाली घटनाओं का भी असर पड़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं और भौगोलिक राजनीति लगातार एक दूसरे से जुड़ रही है और निजी क्षेत्र का इसके भीतर के एक घटक के रूप में महत्व बढ़ रहा है। भारत को समान विचार वाले वैश्विक मुद्दों खासकर जिन क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है, पर बहसों और विचार विमर्शों में सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए।
lV, हमारा मध्यवर्ग अपने आकार और क्रय शक्ति दोनों में ही अनूठा है। यह शक्तिशाली समूह नव-मध्य वर्ग के प्रवेश के साथ लगातार बढ़ रहा है। यह विकास का बेहद महत्वपूर्ण बाहक है। अपने उच्च शैक्षणिक स्तरों, गतिशीलता और देश में बदलाव लाने की इच्छा की जह से इसमें बेशुमार संभावनाएं हैं। यह सुनिश्चित करना हमारे लिए लगातार चुनौती बनी रहेगी कि आर्थिक रूप जीवंत इस मार्ग की भागीदारी बनी रहे और इसकी क्षमता का पूर्ण दोहन किया जा सके।
V. उद्यमशीलता वैज्ञानिक और बौद्धिक मानव पूंजी का भारत का भंडार शक्तिका एक स्रोत है, जो सफलता की असीम ऊंचाइयों को प्राप्त करने में हमारी मदद करने के लिए उपयोग किये जाने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है। वास्तव में सामाजिक पूंजी जो हमारे लोगों में मौजूद है अभी तक देश के विकास में बड़ा योगदान करता रहा है और इसलिए इसका उपयुक्त नीतिगत पहलों के माध्यम से लाभ उठाए जाने की जरूरत है।
VI, प्रवासी भारतीय समुदाय जो 200 से अधिक देशों में फैला है, विश्व के कई देशों की आबादी की तुलना में भी बड़ा है। यह एक उल्लेखनीय भौगोलिक आर्थिक और भौगोलिक राजनीतिक ताकत है। भविष्य की राष्ट्रीय नीतियों में इस ताकत को निश्चित रूप से समावेशित किया जाना चाहिए, जिससे कि उनसे वित्तीय समर्थन की अपेक्षा के अतिरिक्त नए भारत में उनकी भागीदारी को भी विस्तृत बनाया जा सकेा प्रौद्योगिकी और प्रबंधन विशेषज्ञता ऐसे स्पष्ट क्षेत्र है, जहां प्रवासी समुदाय उल्लेखनीय रूप से योगदान दे सकता है।
VII. शहरीकरण एक अपरिवर्तनीय रूझान है। इसे गलत मानने की बजाए इसे विकास के लिए हमारी नीति का अंतरंग तत्व बनाना होगा। शहरीकरण को इससे प्राप्त होने वाले आर्थिक लाभों का फायदा उठाने के साथ-साथ एक संपूर्ण तथा सुरक्षित आवास स्थल का सृजन करने के लिए आधुनिक प्रौद्योगिक के इस्तेमाल करने के एक अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए।
VIIl. पारदर्शिता अब शासन के लाइसेंस के लिए अपरिहार्य हो चुकी है। हम ऐसे डिजिटल युग में हैं, जहां सोशल मीडिया जैसे संचार के उपकरण और तरीके सरकार के विचारों और कदमों की व्याख्या करने तथा साझा करने के ताकतवर माध्यम है। यह रुझान समय के साथ और आगे ही बढ़ेगशासन में जटिलता और परेशानियों की संभावनाओं को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए सरकार और शासन उच्च पारदर्शिता के वातावरण में चलाया जाना चाहिए।
प्रौद्योगिकी और सूचना की पहुंच ने विविधता में एकता पर जोर दिया है जो हमें परिभाषित करती है। इसने हमारी अंतर मिश्रित राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए हमारे धर्म, राज्य और पारिस्थितिकीय प्रणालियों की विभिन्न क्षमताओं को एकीकृत करने में मदद की है। वास्ता में इन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता को काफी मजबूती प्रदान की है। भारत के विविध रंगों से उत्पन्न होने वाली सृजनात्मक ऊर्जा का लाभ उठाने के लिए हमारा विकास मॉडल अधिक सहमति भरा और सहयोगी होना चाहिए। इसमें राज्यों क्षेत्रों और स्थानीय लोगों की विशेष मागों को समाविष्ट किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय विकास के हिस्सेदारी वाले दृष्टिकोण को मानव गरिमा राष्ट्रीय आत्म-सम्मान और समावेशी टिकाऊ पथ पर आधारित होना चाहिए। हम अपनी जनसंख्या या क्षेत्रों के पंचित वर्गों को नजर अंदाज नहीं कर सकते। एक देश के रूप में हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं वे अधिक जटिल हो गई हैं-
• हमें अगले कुछ दशकों के दौरान विशाल आबादी का सार्थक रूप से लाभ उठाना होगा। हमारे युवाओं पुरुषो महिलाओं की क्षमता को अनुभव, शिक्षा, कौशल विकास, लिंग भेद समाप्ति और रोजगार के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और ज्ञानपूर्ण अर्थव्यवस्था के मोचों पर कार्य करने के लिए हमें अपने युवाओं को उत्पक अवसर उपलब्ध कराने के लिए कार्य करना है।
• गरीबी उन्मूलन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। अकेले इसी विषय के द्वारा हमें एक राष्ट्र के रूप में अपनी सफलता को मापना चाहिए। प्रत्येक भारतीय को इज्जत और आत्मसम्मान से जीवन जीने का अवसर दिया जाना चाहिए। साधु कमि तिरुवल्लूर ने लिखा है कि गरीबी से अधिक भयानक और दुःखदायी कुछ भी नहीं है (गरीबी का दंश व्यक्ति की श्रेष्ठता में से उसकी उत्कृष्ट कुलीनता छीन लेता है। ये शब्द आज भी उतने ही सत्य है जितने तब थे जब वे 2500 वर्ष पहले लिखे गए थे।
• आर्थिक विकास तब तक अधूरा है जब तक वह प्रत्येक व्यक्ति को विकास के लाभ का आनंद उठाने के लिए अधिकार उपलब्ध नहीं कराता पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने ऐसा अन्तोदय या पददलित सेवा की अपनी अवधारणा में उल्लेख किया है जहां यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य है कि गरीब से गरीब व्यक्ति को भी विकास का लाभ प्राप्त हो लिंग भेदभाव पर आधारित असमानता के साथ-साथ आर्थिक विषमता की ओर विशेष ध्यान देना है। हमें ऐसा वातावरण और सहायता प्रणाली स्थापित करने की जरूरत है जिसमें महिलाओं को राष्ट्रनिर्माण में अपनी अधिकारपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहन मित्ते। अवसरों की समानता समावेशी एजेंडे के साथ हर व्यक्ति को उपलब्ध हो। पूर्व निर्धारित मार्ग पर हर व्यक्ति को धकलने के बजाए हमें समाज के हर तत्व को विशेष रूप से अनुसूचित जाति और जन जातियों जैसे कमजोर वर्गों को राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करने में देश और सरकार के विकल्पों को प्रभावित करने की योग्यता देनी है। वास्तव में योगदान के लिए समाज के हर सदस्य की योग्यता में मूलभूत विश्वास को समाविष्ट किया जाना है। शंकरदेव ने सदियों पहले कीर्तनघोष में लिखा है, प्रत्येक प्राणी को अपनी आत्मा के बराबर देखना मोक्ष प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन है।
• गांव हमारे लोकाचार संस्कृति और जीविका के सुद्द आधार बने हुए हैं। इन्हें विकास प्रक्रिया में पूर्णरूप से संस्था बनाये जाने की जरूरत है ताकि हम उनके उत्साह और ऊर्जा का लाभ उठा सक - भारत में 50 मिलियन से अधिक छोटे व्यापार हैं जो रोजगार जुटाने के मुख्य स्रोत है। ये व्यापार समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों के लिए अवसर जुटाने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। नीति निर्धारण में कौशल ज्ञान उन्नयन और वित्तीय पूंजी और संबंधित प्रौद्योगिकी तत्व तक पहुंच बनाने के रूप में इसे क्षेत्र को आवश्यक सहायता प्रदान करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
• विकास के अच्छे वातावरण में ही उत्तरदायी विकास होता है। भारत 18 बड़े विविध देशों में से एक है। हमारी पर्यावरण एवं पारिस्थिकीय परिसंपत्तिया शाश्त है। इन्हें संरक्षित और रक्षित किया जाना चाहिए। भारत की पर्यावरण को आवर प्रदान करने की विरासत वृक्षों और पशुओं प्रतिहमारी श्रद्धा से परिलक्षित होती है। भावी पाटिया के लिए हमारी विरासतत प्रगति की होनी चाहिए) हमारे पर्यावरण और संसाधनों का प्रत्येक तत्व जैसे जल जमीन और जंगल की सुरक्षा की जानी चाहिए और यह कार्य इस तरह किया जाना चाहिए जिसमें जलवायु और उन के साथ उनके अंतसंचधों को शामिल किया जाए। हमारे विकास के एजेंडे में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि विकास बर्तमान और भविष्य की पीढियों के जीवन की गुणवत्त करे। राष्ट्रीय उद्देश्यों को हासिल करने में सरकार की भूमिका समय के साथ बदल सकती है लेकिन वह हमेशा महत्त्वपूर्ण रहेगी सरकार ऐसी नीतियां बनाना जारी रखेगी जो देश की आकाक्षाओं और जरूरतों को प्रकट करता हो। सरकार उन्हें इस ढंग से लागू करेगी कि वह नागरिकों के लिए फायदेमंद हो। दुनिया के साथ राजनीतिक और आर्थिक रूप से तालमेल बिठाने के लिए नीति बनाने के साथ-साथ सरकार के कामकाज को भी समाहित करना होगा।
भारत में प्रभावी शासन निम्नलिखित स्तंभों पर आधारित होगा :-
• जनता पर अत्यधिक केंद्रित कार्यक्रम जो समाज के साथ-साथ व्यक्ति की भी आकांक्षा पूरी करता हो। जनता की जरूरतों का अनुमान लगाने और उन्हें पूरा करने में अत्यधिक सक्रियता
• नागरिकों की भागीदारी
• सभी परिप्रेक्ष्यों में महिलाओं का सशक्तिकरण
• सभी समूहों के समावेश के साथ विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर अर्थात् गरीब अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति समुदायों और अन्य पिछड़ा वर्ग, ग्रामीण क्षेत्र और किसानों (गांव एवं किसान और युवा एवं अल्पसंख्यक समुदाय के सभी वर्गों पर विशेष ध्यान।
• देश के युवाओं के लिए समान अवसर और
• पारदर्शिता जो सरकार को सक्रिय एवं प्रभावशाली तथा जिम्मेदार बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करती हो।
सरकारी और निजी क्षेत्रों में शासन समाज के साथ-साथ समग्र रूप से चिंता का विषय है। जनता की भलाई सुनिश्चित करने में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी होनी चाहिए। जन पहल के लिए जनचेतना बहुत महत्वपूर्ण है। अतीत में हो सकता है कि सरकार जनता की शिकायतों के प्रति संकीर्ण रवैया अपनही रही हो। आज के बदलते माहौल में जनसेवाएं निजी कंपनियां उपलब्ध करा रही हैं और प्रौद्योगिकी के जरिए नागरिकों की भागीदारी के लिए व्यापक गुंजाइश है इसलिए शासन हर किसी के इर्द-गिर्द केंद्रित है और प्रत्येक नागरिक को शामिल करता है।
बीते वर्षों के साथ सरकार का संस्थागत ढांचा विकसित और परिपक्व हुआ है। इससे कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित हुई है जिसने संस्थाओं को सौंपे गएकार्यों की विशिष्टता बढ़ाई है। नियोजन की प्रक्रिया के संदर्भ में शासन की प्रक्रिया' को शासन की कार्यनीति से अलग करने साथ ही साथ उसे ऊर्जावान बनाने की जरूरत है। शासन संरचना के संदर्भ में हमारे देश की जरूरतें बदली है ऐसे में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की आवश्यकता है जो सरकार के दिशात्मक और नीति निर्धारक थिंक टैंक के रूप में कार्य करे। प्रस्तावित संस्थान प्रत्येक स्तर पर नीति निर्धारण के प्रमुख तत्वों के बारे में महत्वपूर्ण और तकनीकी सलाह देगा। इसमें आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयात के मामले देश के भीतर और अन्य देशों में उपलब्ध सर्वोत्तम प्रक्रियाओं के प्रसार नए नीतिगत विचारों को अपनाने और विषय आधारित विशिष्ट सहायता शामिल है। यह संस्थान लगातार बदल रहे एकीकृत विश्व के अनुरूप कार्य करने में सक्षम होगा, भारत जिसका एक भाग है।
संस्थान के तहत व्यवस्था में केंद्र से राज्यों की तरफ चलने वाले एक पक्षीय नीतिगत क्रम को एक महत्वपूर्ण विकासवादी परिवर्तन के रूप में राज्यों की वास्तविक और सतत भागीदारी से बदल दिया जाएगा। त्वरित गति से कार्य करने के लिए और सरकार को नीति दृष्टिकोण उपलब्ध कराने के साथ साथ प्रासंगिक विषयों के संदर्भ में संस्थान के पास आवश्यक संसाधन ज्ञान, कौशल और क्षमता होगी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विश्व के सकारात्मक प्रभावों को अपनाते हुए संस्थान को इस नीति का पालन करना होगा कि भारत के परिप्रेक्ष्य में एक ही मंडल प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता है। विकास के लिए हमें अपनी नीति स्वंय निर्धारित करनी होगी। देश में और देश के लिए क्या हितकारी है, संस्थान को इसपर ध्यान केंद्रित करना होगा जो विकास के लिए भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित होगा।
इन आशाओं को जीवंत बनाने के लिए संस्थान है नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान | इसे राज्य सरकारों, संसद सदस्यों, विषय विशेषज्ञ और संबंधित संस्थानों सहित तमाम हितधारकों के बीच गहन विचार किर्श के बाद प्रस्तावित किया गया।
हम यह कह सकते हैं कि नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफारमिंग इंडियापं जवाहरलाल नेहरू के युग में शुरू की गई योजना आयोग का प्रतिस्थापन है। नेहरू काल में शुरू किए गए योजना आयोग ने भारत के पंचवर्षीय विकास की योजना को कई सालों तक लागू किया। भारत में लगभग 30 साल के बाद पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार ने वर्षों पुरानी योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग रख दिया है। साथ में इस आयोग की कार्यप्रणाली में भी एक बड़े स्तर पर बदलाव किया गया है। इस नई संस्था को थिंकटैंक के रूप में वर्णित किया गया है। इस आयोग का प्राथमिक कार्य सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर सरकार को सलाह देने का है ताकि सरकार ऐसी योजना का निर्माण करे जो लोगों के हित में हो।
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