गैर सरकारी संगठन - Non government organization

गैर सरकारी संगठन - Non government organization

गैर सरकारी संगठन - Non government organization


राज्य ही समाज में मात्र काम नहीं कर रहा है अपितु ऐसे बहुत सारे संगठन हैं जिन्हेंस्वैच्छिक संगठन भी कहा जाता है जो समाज में लोगों के कल्याण, एकीकरण और विकास के लिए विभिन्न कार्य करते हैं। स्वैच्छिकवाद (वोलेंटियरिज्म) शब्द लैटिन वॉलन्टास से उत्पन्न हुआ है जिसका तात्पर्य स्वतंत्रता की इच्छा है। राजनीतिक विज्ञानियों ने "संघ की स्वतंत्रता की परिभाषा सभी व्यक्तियों के मान्य कानूनी अधिकार के रूप में दी है जो उस प्रयोजन के संवर्द्धन के लिए एक साथ आते हैं जिनमें उनकी अभिरूचि है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) द्वारा भारतीय नागरिकों को संघ निर्माण करने का अधिकार प्रदान किया गया है। संयुक्तराष्ट्र शब्दावली में स्वैच्छिक संगठनों को गैर-सरकारी संगठन के रूप में मान्यता मिली है।







स्वैच्छिक संगठनों की परिभाषा


लाई बेवरीज के अनुसार सही-सही कहा जाए तो एक स्वैच्छिक संगठन वह संगठन है कार्यकर्ता वैतनिक अथवा अवैतनिक हो सकते हैं, जिसे बाहरी नियंत्रण के बिना इसके सदस्यों द्वारा शुरू और शासित किया जाता है। 


गैर-सरकारी संगठन स्वैच्छिक संगठन की मुख्य विशेताएं निम्न उल्लेखित हैं -


1. यह एक संगठन होता है जिसे इसके सदस्यों द्वारा शुरू किया जाता है और जिसे किसी बाहरी नियंत्रण के बिना लोकतांत्रिकता सिद्धांतों पर इसके कर्मियों द्वारा शासित किया जाता है।


2. इसका प्रशासनिक ढांचा, विधिवत गठित प्रबंधन और कार्यकारी समितियाँ होती है।


3. इसके निश्चित लक्ष्य और प्रयोजन तथा कार्यक्रम होते हैं। 


4. कार्यकलापों के कार्यक्षेत्र के अनुसार सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 भारतीय न्यास अधिनियम, 1882, सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1904 अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत पंजीकृत किया जाता है।


5. यह अपने क्रियाकलापों के लिए अंशतया सहायता अनुदान के रूप में राजकोष से और अंशतया स्थानीय समुदाय के सदस्यों से और / अथवा कार्यक्रम के लाभार्थियों से अंशदान चंदे के रूप में निधि प्राप्त किया जाता है। 







गैर-सरकारी संगठन अपनी स्थापना से विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। धर्मार्थ संगठन के संगठन हैं जो गरीबों अथवा जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए स्थापित किए जाते हैं। इन संगठनों का निर्माण मुख्यतः धर्मार्थ दृष्टिकोण के माध्यम से जरूरतमंदों की सेवा करने के लिए किया जाता मिशनरीज आफ चेरिटी ऐसे ही धर्मार्थ संगठनों का एक उदाहरण है। इसके ज्यादातर कार्यकर्ता पूरी तरह से सेवा के लिए समर्पित हैं और वे किसी भी चीज की वापसी की उम्मीद किए बिना सेवा करते हैं। ये संस्थाएं गरीबों और उपेक्षितों को सांस्थानिक देख रेख प्रस्तुत करती हैं। ये जरूरतमंदों के लिए भोजन वस्त्र और डाक्टरी उपचार भी मुहैया कराती है।


धर्मार्थ संगठन, धर्मार्थ निधि अधिनियम 1890 के अधीन पंजीकृत किए जाते हैं। धर्मार्थ निधि अधिनियम की धारा 2 में धर्मार्थ उद्देश्यों को गरीबों के लिए राहत, शिक्षा, चिकित्सा सहायता और सामान्य उपयोगिता के किसी दूसरे प्रयोजनों की प्रगति के रूप में पारिभाषित किया गया है। सोयाटियाँ और न्याय स्वैच्छिक संगठन सोसायटी को पंजीकरण अधिनियम 1860 भारतीय न्याय अधिनियम 1882 अथवा भारतीय कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत पंजीकृत किया जा सकता है। सबसे ज्यादा गैर-सरकारी संगठन सोसाइटीज़ पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत किये जाते हैं। सोसाटियाँ अपने शासन और कार्यवाही के लिए अपने दैनिक कार्यों और नियमों में कुछ प्रणाली का अनुकरण करने के लिए विवेकपूर्ण प्रयोजन के साथ निर्मित की जाती हैं। निम्नलिखित कार्यकलापों की सही तरीके से देखभाल की जानी चाहिए क्योंकि यह भी संगठन के बेहतर कार्य संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं-





• संगठन द्वारा विश्लेषित प्रयोजनों की प्राप्ति कर प्राथमिक अध्ययन।


• संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए, जनशक्ति की भर्ती, सही काम के लिए सही लोग।


• संविधान का ढाँचा तैयार करना जिसमें संघ का ज्ञापन नियम और विनियम हों।


• उपयुक्त कानूनी प्राधिकार द्वारा सोसायटी के पंजीकरण को सुनिश्चित करना।