समाज कार्य के दर्शन एवं मूल्य - Philosophy and Values of Social Work

समाज कार्य के दर्शन एवं मूल्य - Philosophy and Values of Social Work

समाज कार्य के दर्शन एवं मूल्य - Philosophy and Values of Social Work

व्यक्ति के प्रकृति के संबंध में समाजकार्य का दर्शन :

1. प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में महान तथा संभावनाओं से भरा हुआ है, अतः उसकी सहायता करनी चाहिए।

2. मानवीय पीड़ा अवांछनीय है, अतः इसे दूर करना ही चाहिए ।

3. मानव जन्मजात रूप से पशु के समान अनैतिक तथा असामाजिक होता है तथा उसमें सीखने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।

4. व्यक्ति के प्रारंभिक विकास में पारिवारिक संबधों का आधारभूत महत्व होता है।

5. मानव स्वभाव से ही विवेकपूर्ण कार्य नहीं करता।

6. प्रत्येक व्यक्ति का गुण तथा क्षमता अलग-अलग होती है, अतः मतभेद बिल्कुल स्वभाविक है, इसे स्वीकार करना चाहिए।




समूह के सबंध में समाजकार्य का दर्शन :

1. समाजकार्य "हस्तक्षेप न करने" तथा "योग्यतम् की उत्तरजीविता " सिद्धांत को नहीं मानता।

2.समाजकार्य यह भी स्वीकार नहीं करता कि धनी व शक्तिशाली व्यक्ति योग्य तथा निर्धन व निर्बल व्यक्ति अयोग्य होता है।

3. समुदाय पर स्वयं तथा अपने सदस्यों के कल्याण व विकास करने का मौलिक उत्तरदायित्व होता है।

4. जनसाधारण के रोजगार, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा स्वतंत्रता की रक्षा आदि का उत्तरदायित्व राज्य का होता है।








सामाजिक परिवर्तन के संबंध में समाजकार्य का दर्शन :

1. किसी भी समाज में क्रमिक विकास द्वारा ही सुधार लाना संभव है।

2. सामाजिक नियोजन लोकतांत्रिक आधार पर होना चाहिए।

3. सामाजिक कार्यकर्ता को अपने संस्कृति पर इस प्रकार ध्यान देना चाहिए जैसे गंभीर राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक कुसमायोजन व्याप्त है।

समाज कार्य व्यवसाय के अंतर्गत कार्य करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता अपने कार्य अनुभव से कुछ आदर्श और मूल्यों को विकसित करता है। समाज कार्य के अर्थ में जब इन आदर्शों व मूल्यों को एक तर्क संगत प्रणाली के तहत स्थापित किया जाता है तो वह समाज कार्य दर्शन बन जाता है।





समाज कार्य के मूल्य

मनुष्य की योग्यता एवं उसकी गरिमा। (The worth and dignity of man)

सम्पूर्ण मानवीय सामर्थ्‍य को प्राप्त करने की मानव प्रकृति की क्षमता का विकास करना। (The capacity of human nature to achive full human potential)

मतभेदों के लिए सहनशीलता (Tolerance of differences)

मनुष्‍य की मौलिक आवश्यकताओं की संतुष्‍ट‍ि (Satisfaction of basic human needs)

स्वतंत्रता (Liberty)

आत्म-निर्देशन (self-direction)

अनिर्णयात्मक प्रवृति (Non-judgement attitude)

रचनात्मक सामाजिक सहयोग(Constructive social cooperation)

कार्य की महत्ता तथा अवकाश का रचनात्मक सदुपयोग (Importance of work and constructive use of leisure)

मनुष्य एवं प्रकृति के खतरों से अपने अस्तित्व की सुरक्षा (Protection of one’s existence from the dangers caused by man and nature)