पाठ्यचर्या निर्माण के आधार के रूप में दर्शन - Philosophy as the Basis of Curriculum Design

पाठ्यचर्या निर्माण के आधार के रूप में दर्शन - Philosophy as the Basis of Curriculum Design

पाठ्यचर्या निर्माण के आधार के रूप में दर्शन - Philosophy as the Basis of Curriculum Design


• पाठ्यचर्या सदैव समाज की आवश्यकताओं और सामाजिक उद्देश्यों पर आधारित होती है। • इसके साथ ही सामाजिक दशाएं, देशकाल एवं स्थान विशेष अपने नागरिकों के दर्शन को भी प्रभावित करते हैं और वहीं दूसरी तरफ दर्शन से स्थान विशेष का समाज भी प्रभावित भी होता है।


• पाठ्यचर्या निर्माण के पीछे दर्शन एक बल के रूप में कार्य करता है जो पाठ्यचर्या में दार्शनिक तथ्यों का समावेश करते हुए शिक्षा के सर्वोत्तम एवं उत्कृष्ट लक्ष्यों की ओर मानव को अग्रसर करता है।


• पाठ्यचर्या निर्माण में क्या, क्यों, कैसे और कौन; ये चार पायों के रूप में हैं। वास्तव में दर्शन की शुरुआत भी इन्हीं प्रश्नों से मानी जाती है। दार्शनिक या कोई भी दर्शन चाहे वह भारतीय दर्शन हो अथवा पाश्चात्य दर्शन, इन्हीं क्या, क्यों, कैसे और कौन प्रश्नों के उत्तर से जुड़े हैं।


• मनुष्य को विवेक का प्राणी माना जाता है। ये सभी प्रश्न मनुष्य के ही मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं.


और दर्शन की उत्पत्ति भी मनुष्य के द्वारा इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के प्रयास से ही मानी गयी है।


● दर्शन की उत्पत्ति का आधार भी मानव का विवेक अथवा ज्ञान माना जाता है।


• Philosophy शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द "philos" (प्रेम) and "sophia" (ज्ञान) से हुई है जिसका अर्थ ज्ञान से प्रेम या ज्ञान के प्रति प्रेम है, दर्शन शब्द दृ धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना । यहाँ देखने का अर्थ सामान्य रूप से देखना नहीं बल्कि विवेक से किसी चीज को देखना वस्तु से जुड़े उस सत्य को भी देखने की शक्ति जो आँखों से नहीं बल्कि विवेक से ही देखी और समझी जा सकती है। इस प्रकार भारतीय या पाश्चात्य कोई भी दर्शन हो का आधार ज्ञान या विवेक ही है।



• एच.टी. जॉनसन ने अपनी पुस्तक 'फाउंडेशन ऑफ एजुकेशन' में दर्शन को जीवन की आधारभूत समस्याओं का उत्तर प्राप्त करने तथा मनुष्य के जीवन को सार्थकता प्रदान करने के लिए किए जा रहे अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।


● शिक्षा प्राप्त करने का मुख्य उद्देश्य जीवन की आधारभूत समस्याओं का निवारण एवं मनुष्य


जीवन को सार्थकता प्रदान करना है। • पाठ्यचर्या निर्माण से पहले निर्माणकर्ताओं को मानव जीवन से सम्बंधित उद्देश्यों की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए अन्यथा पाठ्यचर्या के उद्देश्य भी अस्पष्ट होंगे।


प्रगतिवाद


● प्रगतिवादी विचारकों में रूसो और जॉन डाँबी का नाम उल्लेखनीय है। दोनों ही बाल केन्द्रित शिक्षा के पक्षधर रहे हैं इनके अतिरिक्त अन्य समर्थका में पेस्टोलोजी, फ्रोबेल एवं मेरिमोटेसरी इत्यादि का नाम आता है।


• शिक्षा का बालकेंद्रित लक्ष्य व बालकेंद्रित पाठ्यचर्या, पाठ्यचर्या लोकतान्त्रिक वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में सीखना, खोजपूर्ण तरीके से सीखने पर बत, समूह में सीखने को प्रोत्साहन, प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान के अध्ययन पर मल, शिक्षक को तत्वान्वेषी एवं अध्ययनशील होना चाहिए, शिक्षा आनंदप्रद, कक्षा जीवन्त छात्र अंतःक्रिया आवश्यक विभिन्न विषयों का सहसम्बन्ध विधि से अध्यापन


• प्रगतिवाद वह दार्शनिक मत या विश्वास है जिसका मानना है कि शिक्षा को वास्तविक जीवन पर


आधारित होना चाहिए। ● प्रगतिवादियों का मानना है कि बालक को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में शिक्षा देना


चाहिए क्योंकि मनुष्य वास्तविक परिस्थितियों में सबसे अच्छी तरह से सीखता है।


● प्रगतिवादी दार्शनिक बाल केन्द्रित शिक्षा के पक्षधर हैं। • बालक केन्द्रित प्रगतिवादियों का मानना है कि बालक स्वभाव से जिज्ञासु होता है अतः बच्चों


को सीखने के लिए छोड़ देना चाहिए जिससे वे स्वयं की युक्तियों से सीख सकें।



● शिक्षक को विद्यार्थियों को सिखाने हेतु एक सहज निर्देशक के रूप में होना चाहिए।


• प्रगतिशील पाठ्यचर्या के अंतर्गत शिक्षण किसी प्राधिकरण के अधीन नहीं होता है और पाठ्यचर्या का निर्धारण प्रत्येक बालक की प्रकृति के आधार पर उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप होता है।


● लोकतंत्र की संकल्पना तभी फल-फूल और विकसित हो पाएगी जब शिक्षा, शिक्षार्थियों को उनकी रूचि और क्षमताओं को महसूस कराने में सक्षम होगी। परिवर्तन का आधार शिक्षा है और जब शिक्षा का आधार लोकतान्त्रिक होगा तब समाज भी लोकतान्त्रिक हो जाएगा।


● डीवी ने शिक्षा को वृद्धि और प्रयोगात्मकता की ऐसी प्रक्रिया के रूप में व्याख्या की है जो विचारों और मस्तिष्क के अन्दर उत्पन्न होने वाले कार्य-कारण सम्बन्ध को समस्या समाधान हेतु प्रयोग में लाती है।


● समस्या के समाधान के लिए विद्यार्थियों को इन पांच महत्वपूर्ण कदमों से परिचित होना चाहिए तथा इनका अनुपालन भी करना चाहिए।


• समस्या से अवगत होना से


● समस्या को परिभाषित करना


● समस्या को हल करने के लिए परिकल्पनाओं का निर्माण करना


● परिकल्पनाओं का परीक्षण करना


● समस्या के सर्वोत्तम समाधान का मूल्यांकन


• प्रगतिवादीयों के अनुसार शिक्षा, क्रिया करके स्वयं सौखने से सम्बंधित होनी चाहिए।


• प्रगतिवादी शिक्षा में खोजपूर्ण सीखना को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। वे बच्चों को स्वयं ही खोज कर कुछ नया सिखाने पर बल देते हैं जो बच्चों को उनकी रूचि और जिज्ञासा के अनुसार 'खोजपूर्ण सीखने' की ओर ले जाती है।



प्रगतिवादी पाठ्यचर्या का स्वरूप


• प्रगतिवादी प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान के अध्ययन पर बल देते हैं।


• पाठ्यचर्या ऐसी होनी चाहिए ओ बालक के वास्तविक जीवन से सम्बंधित हो और उनकी रूचि, योग्यताओं एवं अनुभवों पर आधारित हो।


• प्रगतिवादी शिक्षा विचारधारा के अनुसार पाठ्यचर्या एवं शिक्षण विधियाँ ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों के मध्य परस्पर अंतःक्रिया को प्रोत्साहित करे इसके लिए विचार विमर्श


विधि को शिक्षण विधि के रूप में कक्षा में प्रयुक्त करने की सलाह दी जाती है।


• प्रगतिवाद एक से अधिक विषयों को पढाये जाने पर बल देता है।


• विषय को अन्य विषयों से सम्बंधित कर ज्ञान दिया जाए जिससे ज्ञान स्थायी हो और एक विषय में अर्जित ज्ञान को दूसरे विषय में और तद्पश्चात वास्तविक परिस्थितियों में प्रयोग में लाया जा सके।


● विद्यार्थियों के समक्ष लोकतान्त्रिक पाठ्यचर्या को प्रस्तुत करना चाहिए


• प्रगतिवादी शिक्षा व्यवस्था के अनुसार व्यवहारिक रूप से घर कार्यस्थल एवं विद्यालय साथ


मिलकर एक सतत और आनंदप्रद शिक्षा जो की जीवन से सम्बंधित हो, देनी चाहिए।


• छात्रों को कक्षा में समस्याओं को समाधान वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ कर सिखाना


चाहिए, • प्रगतिवादी पाठ्यचर्या में प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान सम्बन्धी विषयों जैसे- भौतिक


विज्ञान, जीव विज्ञान, इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्र, अर्थशास्त्र, गृहविज्ञान के समावेश पर विशेष बल दिया जाता है।


• शिक्षण विधियों में उन विधियों को स्वीकार किया जाता है जो समूह में तथा स्वयं करके सीखने को प्रोत्साहित करती है।









पदार्थवाद


● पदार्थवाद या Essentialism की उत्पत्ति Essential शब्द से हुई है जिसका अर्थ बुनियादी या मुख्य चीजें हैं।


● पदार्थवादी चीजों को उसी रूप में स्वीकार करते है जिस रूप में वे हैं। वे चीजों को इस रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते कि वे ईश्वर द्वारा बनाई हुई हैं अथवा प्रकृति प्रदत्त हैं।


• पदार्थवाद एक ऐसा वाद है जो विद्यार्थियों में शैक्षणिक ज्ञान एवं चारित्रिक विकास को बुनियादी या अनिवार्य रूप से बीजारोपित करने पर बल देता है।


• पदार्थवाद को प्रचलित करने का मुख्य श्रेय विलियम वेगले को जाता है।


● पदार्थवाद के मुख्य दार्शनिकों में डेकार्ते, न्यूटन, ह्यूम, लॉक, काट इत्यादि आते हैं ।


● पदार्थवाद का जन्म का आधार ही वैज्ञानिकता है। अतः पदार्थवाद विज्ञान और वैज्ञानिकता को पाठ्यचर्या में शामिल करने पर विशेष बल देता है।


• प्रगतिवादियों का मानना है कि आज के युग में प्रगति के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक विषयों की अधिक आवश्यकता है।


पदार्थवादी पाठ्यचर्या का स्वरूप


• पदार्थवाद पाठ्यचर्या में वैज्ञानिक विषयों का समावेश करने पर बल देता है।


● पदार्थवादी पाठ्यचर्या के मुख्य विषयों में गणित, प्राकृतिक विज्ञान, इतिहास, विदेशी भाषायें, और साहित्य को स्थान दिया गया है।


• पदार्थवादी व्यावसायिक जीवन समायोजन से सम्बंधित तथा इस प्रकार के अन्य विषयों को पाठ्यचर्या में सम्मिलित करने को अस्वीकार करते हैं।


• पदार्थवाद छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नताओं जैसे- योग्यताओं और रूचि को नजरअंदाज करते हुए सभी को एक समान विषय को पढ़ाने की वकालत करता है। इस प्रकार यह तेज और कमजोर दोनों प्रकार के छात्रों के लिए समस्या का विषय बन जाता है।



• पदार्थवादी शिक्षण प्रक्रिया को शिक्षक केन्द्रित मानते हैं जो छात्रों को मात्र बौद्धिक और नैतिक ज्ञान ही न दे बल्कि ज्ञान देने के साथ-साथ उनका बौद्धिक और नैतिक रूप से पथ-प्रदर्शन भी कर सके।


● पदार्थवादी पाठ्यचर्या में सभी छात्रों की वैयक्तिक भिन्नताओं को दरकिनार करते हुए छात्र


के लिए समान पाठ्यचर्या प्रस्तावित की जाती है। • विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति का ज्ञान होना चाहिए जिससे सही रूप में संस्कृति का हस्तांतरण अगली पीढ़ी को हो सके।



पुनर्संरचनावाद


• पुनर्संरचनावाद वह दर्शन है जो सामाजिक और सांस्कृतिक आधारभूत सुविधाओं के पुनर्निर्माण पर विश्वास करती है।


• पुनसंरचनाबाद के अनुसार शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जो छात्रों की सामाजिक


समस्याओं का अध्ययन करे और साथ ही समस्याओं के अध्ययन के पश्चात् सामाजिक उन्नतिके लिए उचित रास्तों की तलाश करे।


• अंतर्राष्ट्रीयता को बढ़ावा एवं नए समाज की स्थापना की कल्पना ।


● मुख्य दार्शनिक बोओडोर ब्रेमेल्ड जॉर्ज काउंट्स, हेनरी गिरोक्स, पीटर मैकलॉरेन, पाउलो


• छात्र भविष्य के समाजसुधारक, वर्गमुक्त एवं विभेदमुक्त समाज की कल्पना • विद्यार्थियों को यह सिखाना या पढाना चाहिए की संपूर्ण समाज या इसके किसी भी भाग में परिवर्तन किस प्रकार लाया जाए।



• पदार्थवादी शिक्षण प्रक्रिया को शिक्षक केन्द्रित मानते हैं जो छात्रों को मात्र बौद्धिक और नैतिक ज्ञान ही न दे बल्कि ज्ञान देने के साथ-साथ उनका बौद्धिक और नैतिक रूप से पथ-प्रदर्शन भी कर सके।


● पदार्थवादी पाठ्यचर्या में सभी छात्रों की वैयक्तिक भिन्नताओं को दरकिनार करते हुए छात्र के लिए समान पाठ्यचर्या प्रस्तावित की जाती है। • विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति का ज्ञान होना चाहिए जिससे सही रूप में संस्कृति का हस्तांतरण अगली पीढ़ी को हो सके।


• पुनर्संरचनावाद वह दर्शन है जो सामाजिक और सांस्कृतिक आधारभूत सुविधाओं के पुनर्निर्माण पर विश्वास करती है।


• पुनसंरचनाबाद के अनुसार शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जो छात्रों की सामाजिक


समस्याओं का अध्ययन करे और साथ ही समस्याओं के अध्ययन के पश्चात् सामाजिक उन्नति


के लिए उचित रास्तों की तलाश करे।


• अंतर्राष्ट्रीयता को बढ़ावा एवं नए समाज की स्थापना की कल्पना ।


● मुख्य दार्शनिक बोओडोर ब्रेमेल्ड जॉर्ज काउंट्स, हेनरी गिरोक्स, पीटर मैकलॉरेन, पाउलो


• छात्र भविष्य के समाजसुधारक, वर्गमुक्त एवं विभेदमुक्त समाज की कल्पना • विद्यार्थियों को यह सिखाना या पढाना चाहिए की संपूर्ण समाज या इसके किसी भी भाग में परिवर्तन किस प्रकार लाया जाए।










पुनर्संरचनावादी पाठ्यचर्या का स्वरूप


• पुनसंरचनावादी पाठ्यचर्या में छात्रों के लिए सामाजिक समस्याओं की व्याख्या विश्लेषण एवं मूल्यांकन करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि रचनात्मक परिवर्तन लाने के लिए छात्रों को सम्बंधित मुद्दों पर चर्चा करना और निवारण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना आवश्यक है।


• पाठ्यचर्या में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदायों महत्वपूर्ण विश्लेषण होना चाहिए जिससे छात्रों को स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदायों का समुचित ज्ञान हो सके। पुनर्संरचनावादी ऐसी पाठ्यचर्या की बात करते हैं जो सामाजिक असमानताओं को खत्म करने में मदद करती है।


• पाठ्यचर्या ऐसी होनी चाहिए जिसमें छात्रों में आपसी समझ और वैश्विक सहयोग बढ़ाने से सम्बंधित पाठ हो


पुनर्संरचनावादी सामान्य रूप से पाठ्यचर्या में विज्ञान के स्थान पर सामाजिक विज्ञान जैसे से विषयों को रखने की वकालत करते हैं।


• पाठ्यचर्या में जिन विषयों के समावेश पर मुख्य रूप से बल दिया जाता है उनमें इतिहास राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, धर्म, मूल्य, कविता और दर्शन हैं।


मूल्य


● मूल्य समाज के वे आदर्श या विश्वास है जो समाज सम्मत है तथा समाज के अधिकांश सदस्य गुणों के रूप में जिनका अनुसरण करते हैं।


• मूल्यों को विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है।


काने ने मूल्यों को परिभाषित हुए कहा है कि "मूल्य वे आदर्श तथा विश्वास है, जिन्हें समाज के अधिकांश सदस्यों ने अपना लिया है।" अर्थात जिस समाज में जो समाजसम्मत है उसे उस समाज का मूल्य माना जा सकता है।



● अर्बन ने मूल्यों की परिभाषा इस रूप में दी है कि "मूल्य से हैं जो मानवीय अभिलाषाओं को संतुष्ट करते हैं।


● आर. के. मुखर्जी के शब्दों में, "मूल्यों को सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य उन इच्छाओं तथा लक्ष्यों के रूप में परिभाषित किया है जिन्हें अनुबंधन, अधिगम या समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा आध्यान्तरीकृत किया जाता है तथा जो आत्मनिष्ठ प्राथमिकताओं, मानकों तथा आकांक्षाओं को ग्रहण करती है।"


मूल्यों के स्रोत


● दर्शन से सम्बंधित मूल्य


• सामाजिक संरचना से सम्बंधित मूल्य ● धर्म से सम्बंधित मूल्य


● संस्कृति से सम्बंधित दर्शन


मूल्यों के प्रकार


• अर्बन ने मनुष्य के जीवन के तीन महत्वपूर्ण पक्षों के आधार पर मूल्य के तीन प्रकार बताए हैं। (i) शारीरिक, (ii) सामाजिक, (iii) आध्यात्मिक।





• सामान्य रूप से मान्य मूल्य


• दार्शनिक मूल्य


• मनोवैज्ञानिक मूल्य


• सामाजिक मूल्य


● मानवीय या सार्वभौमिक मूल्य


पश्चिमी संस्कृति की मूल्य मीमांसा के अनुसार मूल्यों के चार प्रकार बताए हैं


● नैतिक मूल्य


● सौन्दर्यपरक मूल्य


● सामाजिक या आर्थिक मूल्य:


• धार्मिक या सांस्कृतिक मूल्य


भारतीय मूल्य


• सत्य


● धर्म


● शान्ति


● प्रेम


● अहिंसा


समाज में आए परिवर्तन के साथ ही दर्शन, आदर्श, विश्वास, धर्म, परम्परा, प्रथा, मनोभाव, साहित्य, विज्ञान सभी में परिवर्तन आता है और इन सभी के साथ मूल्यों में परिवर्तन आता है।


पाठ्यचर्या एवं मूल्य


• पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य इन जीवन मूल्यों की प्राप्ति है।


● पाठ्यचर्या के माध्यम से इन मूल्यों को प्राप्त कर समाज के द्वारा नियत लक्ष्यों को पाने का प्रयास किया जाता है।


पाठ्यचर्या एवं मूल्यों के मध्य अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं, साथ ही एक दूसरे को प्रभावित करते और होते हैं जिसे हम निम्न चित्र के माध्यम से समझ सकते हैं।




पाठ्यचर्या विकास के निर्धारक


• पाठ्यचर्या विकास के प्रमुख निर्धारक दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र हैं जिनके द्वारा ही सार्थक एवं प्रभावशाली पाठ्यचर्या निर्मित की जाती है।



पाठ्यचर्या विकास के दार्शनिक आधार


शिक्षा क्यों दे ? किसको दे ? कैसे दें ? कब दे ? तथा शिक्षा कैसी हो? आदि पाठ्यचर्या निर्माताओं को इन आधारभूत प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक होता है।


● दर्शनशास्त्र मूलतः जीवन की आधारभूत समस्याओं के उत्तर प्राप्त करने और मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए किए जाने वाले अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जाता है।


● प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा का पाठ्यचर्या पर अवश्य प्रभाव पड़ता है।


• देश और काल के अंतराल में विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का जन्म हुआ है, उनमें से प्रमुख विचारधाराएँ निम्नलिखित हैं


• आदर्शवाद (Idealism)


प्रकृतिवाद (Naturalism)


• प्रयोजनवाद (Pragmatisin)


• यथार्थवाद (Realism)


• अस्तित्ववाद (Existentialism)




आदर्शवाद और पाठ्य चर्या (Idealism and Curriculum)


• आदर्शवाद भौतिक जगत की तुलना में आध्यात्मिक जगत को अधिक महत्व देता है तथा वस्तु की अपेक्षा विचार को अधिक महत्वपूर्ण मानता है।


• शिक्षा के उद्देश्य आत्मानुभूति अथवा व्यक्तित्व का उन्नयन करना है। • आदर्शवादी पाठ्यचर्या की रचना आदर्शों, विचारों एवं शाश्वत मूल्यों के आधार पर होती है।


• पाठ्यचर्या में प्रमुख विषयों धर्मशास्त्र अध्यात्मशास्त्र, भाषा, साहित्य, समाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल, कला एवं संगीत आदि को शामिल करने पर बल देता है तथा शारीरिक शिक्षा विज्ञान, गणित आदि को गौण विषय मानता है।


प्रकृतिवाद और पाठ्यचर्या (Naturalism and Curriculum)


• प्रकृतिवाद अनुसार प्रकृति ही सब कुछ है, ईश्वर के अस्तित्व की मान्यता नहीं है तथा इस के विचारधारा ने पदार्थ, भौतिक जगत एवं प्रकृतिक नियमों को सर्वाधिक महत्व दिया।


• प्रकृतिवादी, मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का शोधन एवं मार्गतिकरण कर जीवन संघर्ष के लिए तैयार करना शिक्षा का उद्देश्य मानते हैं।


• प्रकृतिवादी पाठ्यचर्या की रचना बालक की प्रकृति एवं रुचियों, योग्यताओं के आधार पर की जाती हैं।


● इस पाठ्यचर्या में वैज्ञानिक विषयों को प्रमुख तथा मानवीय विषयों को गौण स्थान दिया जाता।


● प्रकृतिवादियों के अनुसार मुख्य विषय खेलकूद, शरीर विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, वनस्पति विज्ञान एवं गणित आदि।


• प्रकृतिवादियों के अनुसार भाषा, साहित्य, सामाजिक विज्ञान, कला, संगीत आदि विषयों को कम महत्व दिया गया।










प्रयोजनवाद और पाठ्यचर्या (Pragmatism and Curriculum)


• प्रयोजनवादी दार्शनिक ईश्वर एवं आध्यात्मिक तत्व के स्थान पर व्यक्ति में विश्वास करते हैं तथा


मानव की शक्ति के महत्व को स्वीकार करते हैं। ● इनके अनुसार मूल्य पूर्व निर्धारित नहीं होते हैं बल्कि निर्माण की अवस्था में है।


• प्रयोजनवादियों के अनुसार शिक्षा के कोई पूर्व निर्धारित उद्देश्य नहीं होते बल्कि उद्देश्य व्यक्तियों के होते हैं तथा देश, काल एवं परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं।


● प्रयोजनवादी पाठ्यचर्या उपयोगिता, रुचि, अनुभव तथा एकीकरण के सिद्धान्त पर आधारित होती है।


● पाठ्यचर्या के प्रमुख विषय स्वास्थ्य विज्ञान, शारीरिक विज्ञान, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित, गृह विज्ञान तथा कृषि शिक्षा आदि है।


• मानवीय एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया।


यथार्थवाद तथा पाठ्यचर्या (Realism and Curriculum)


• यथार्थवादी दर्शन पूर्णत वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह स्थूल जगत को महत्व देता है।


• कारण परिणाम के वैज्ञानिक नियम को सर्वव्यापी एवं सर्वमान्य मानता है तथा व्यक्ति एवं समाज दोनों में विश्वास करता है।


• यथार्थवादी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य सुखी एवं वास्तविक जीवन की तैयारी हेतु ज्ञानेन्द्रियों का विकास एवं प्रशिक्षण करना है।



• यथार्थवादी पाठ्यचर्या उपयोगिता तथा आवश्यकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है।


पाठ्यचर्या में दैनिक जीवन में उपयोगी विषयों को सम्मिलित किया जाता है।


प्राकृतिक विज्ञान, भौतिकी, रसायन, स्वास्थ्य रक्षा, व्यायाम, भ्रमण, गणित, नक्षत्र विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि विषयों को शामिल किया गया है।


अस्तित्ववाद और पाठ्यचर्या (Existentialism and Curriculum)


• अस्तित्ववाद विचारधारा के पाठ्यचर्या का चयन छात्र स्वयं अपनी आवश्यकता, योग्यता एवं जीवन की परिस्थितियों के अनुकूल करता है। • इस विचारधारा के अंतर्गत वैज्ञानिक विषयों की अपेक्षा मानवीय अध्ययनों पर विशेष बल दिया


गया है। इस अध्ययनों के माध्यम से दुख, चिंता, मृत्यु, घृणा आदि का ज्ञान प्राप्त करना।


• इसके अंतर्गत कला, संगीत, साहित्य, धर्म, नैतिक सिद्धान्त व्यक्तिक चयन, चिंतन, स्व.


उत्तरदायित्व विषयों को शामिल किया जाता है।


भारतीय दर्शन एवं पाठ्यचर्या (Indian Philosophy and Curriculum)


• भारतीय दर्शनिक विचारधारा के अनुसार ज्ञान हमारी आत्मा में निहित रहता है तथा शिक्षा द्वारा इसे प्रकाश में लाया जाता है।


.● भारतीय दार्शनिक पाठ्यचर्या में यही धर्मशास्त्र अध्यात्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, प्राचीन भाषाएँ, गणित, तर्कशास्त्र आदि विषयों को पढ़ाने का समर्थन करतें हैं।



पाठ्यचर्या विकास के सामाजिक आधार • शिक्षा में सामाजिक प्रवृत्ति का तात्पर्य शिक्षा द्वारा बालकों में सामाजिक गुणों के विकास करने के प्रयास करने की प्रक्रिया से है जिससे व्यक्ति और समाज दोनों का कल्याण हो सके।


शिक्षा में समाज की क्या भूमिका है तथा पाठ्यचर्या निर्माण इससे कैसे प्रभावित होता है


इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित है • समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति (Sociological Tendency)


• सामाजिक स्थिति (Social Condition) • सामाजिक दबाव वर्ग (Social Pressure Group)


● परिवार (Family)


● धार्मिक संगठन (Religious Organisations)


• शिक्षक एवं शिक्षार्थी (Teacher and Students)


समाज की प्रकृति (Nature of the Society)


• समाज की बदलती आवश्यकताएं (Changing Needs of the Society)


पाठ्यचर्या विकास के मनोवैज्ञानिक आधार


• शिक्षा में मनोवैज्ञानिक प्रवृति ने शिक्षा के उद्देश्यों, शिक्षण पद्धति, पाठ्यचर्या शिक्षा के संगठन, अनुशासन की अवधारणा, शिक्षक की भूमिका आदि सभी क्षेत्रों को नया आयाम प्रदान किया


• मनोवैज्ञानिक पाठ्यचर्या निर्माण के मुख्य निर्धारक निम्नलिखित है ● परिपक्वता एवं विकास (Maturity and Development


• व्यक्तिगत भिन्नता (Individual Differences)


• अभिरुचि (Interest)


● अभिप्रेरणा (Motivation) • अधिगम प्रक्रिया एवं अधिगम का स्थानांतरण (Icarning Process and Transfer learning)



पाठ्यचर्या नियोजकों के लिए उपयोगी अधिगम संबंधी सामान्य तथ्य


• अधिगम जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है तथा ये शिक्षार्थी की परिपक्वता से संबन्धित होती है। 

•अधिगम बालक की शारीरिक, मानसिक, एवं संवेगात्मक विकास की दशाओं से प्रभावित होती है।


• अधिगम में शिक्षार्थी की सक्रिय सहभागिता आवश्यक होती है तथा अधिगम तभी प्रभावी होगा जब शिक्षार्थी का लक्ष्य स्पष्ट होगा।


● प्रभावशाली अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना आवश्यक है तथा अधिगम के लिए मुक्त वातावरण सहायक होता है।









पाठ्यचर्या नियोजकों के लिए अधिगम संबंधी कुछ सुझाव


• पाठ्यचर्या का संबंध बालक, प्रकृति एवं जीवन की वास्तविकता से होना चाहिए।


● विद्यालयों में प्रदान किया जाने वाला अनुभव बालकों की स्वाभाविक क्रियाओं एवं अभिरुचियों पर आधारित होना चाहिए।


• अधिगम प्रक्रिया में क्रिया द्वारा सोखना" अर्थात करके सीखने को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।


• यथासंभव पाठ्यचर्या के लिए विषय सामग्री का चयन वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से ही करना चाहिए।


• पाठ्यचर्या में बालकों को अभिप्रेरित करने के अधिक से अधिक अवसर सुलभ होने चाहिए जिससे वे विभिन्न क्रियाओं, चर्चाओं एवं रचनात्मक कार्यों में सक्रिय भाग ले सकें तथा उन्हें विभिन्न प्रकार के कौशलों एवं ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता का अनुभव भी हो सके।