व्यवहारवादी सिद्धांत - pragmatist theory

व्यवहारवादी सिद्धांत - pragmatist theory

 व्यवहारवादी सिद्धांत - pragmatist theory


थार्नडाइक, हल, मिलर एवं डोलाई, मौरेर, स्पैन्स, स्किनर, और पी0टी0 यंग व्यवहारवादी सिद्धान्तों के मुख्य समर्थक हैं। अभिप्रेरणा की धारणाएँ मुख्य रूप से नव-दृढता के सिद्धान्त पर आधारित है। व्यवहार को लक्ष्य अभिमुख माना जाता है और अभिप्रेरणा को शक्ति प्रदान करने वाले तत्वों तथा उसे निर्देशित करने वाले तत्वों का अध्ययन करने के लिए विभिन्न सैद्धान्ति धारणाओं का प्रयोग किया जाता है। व्यवहारवाद के प्राचीन रूपों अनुप्रेरकों की कमी' की धारणा का प्रयोग किया गया है जो शरीर में बुनियादी शक्ति स्रोत को अभिन्न अनुप्रेरक मानती है। इन अनुप्रेरणाओं को लक्ष्य अभिमुख क्रियाओं की ओर अग्रसर करने के लिए ही व्यवहार की दिशा निर्देशित होती है।



अधिकांश प्राचीन व्यवहारवादी सिद्धान्त इस बात को मानते हैं कि अभिप्रेरणा शरीर के भीतर उत्पन्न होने वाली आवश्यकताओं से पैदा होती है। नवीतनम सिद्धान्त उदाहरणस्वरूप, 1953 में प्रतिपादित स्किनर का सिद्धान्त-अभिप्रेरणा की विशुद्ध व्यावहारिक धारणा को ही मान्यता देते हैं। वे इस बात पर बल देते हैं कि क्रियात्मक उद्देश्य अथवा लक्ष्य अभिमुख व्यवहार की स्वीकृति से परे किसी भी कल्पना को आन्तरिक शक्ति स्रोतों पर आधारित नहीं माना जा सकता। व्यवहार कई परिणामात्मक स्थितियों की ओर उन्मुख होता है और यदि इन स्थितियों का शारीरिक व्यवहार में लगातार पालन होता रहे तो उन्हें क्रियात्मक रूप से पुरस्कारात्मक स्थितियों कहा जा सकता है।