मनोविज्ञान में बुद्धि के सिद्धांत - principles of intelligence in psychology

मनोविज्ञान में बुद्धि के सिद्धांत - principles of intelligence in psychology

मनोविज्ञान में बुद्धि के सिद्धांत - principles of intelligence in psychology

 बुद्धि के सिद्धांत


* भिन्न भिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाले कि बुद्धि - का स्वरूप क्या है ? और वह कैसे कार्य करती है।


* इन्हीं निष्कर्षो को बुद्धि के सिद्धांत कहते है।


* बुद्धि के सिद्धांत को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है।


A कारकीय सिद्धांत


B प्रक्रिया उन्मुखी सिद्धांत


A- कारकीय सिद्धांत


* इसके अंतर्गत दो प्रकार के मनोवैज्ञानिकों के समूह आते है।


* स्पीयरमैन के समूह का मत है कि किसी भी संज्ञानात्मक कार्य के निष्पादन का आधार प्राथमिक सामान्य कारक होता है।


* मनोवैज्ञानिकों के इस समूह को पिण्डक कहा जाता है।


* दूसरे प्रकार के मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि बुद्धि बहुत सारी पृथक मानसिक क्षमताओं, जो करीब करीब स्वतंत्र रूप से क्रियाशील होते है का योग है।


* इस समूह में थर्स्टन गिलफोर्ड गार्डनर थार्नडाइक जैसे वैज्ञानिक प्रमुख है। इन्हें विभाजक कहा जाता है।


स्पीयरमैन का द्विकारक सिद्धांत


• यह सिद्धांत 1904 में ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिक स्पीयरमैन द्वारा दिया गया था। * इसके अनुसार व्यक्ति में दो प्रकार की बुद्धि होती है।


• सामान्य


• विशिष्ट


* इसी आधार पर दो कारक बनाये गए।


• सामान्य कारक:


विशिष्ट कारक


सामान्य कारक


* इन्हें G कारक कहा गया।


*G कारक से तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति में मानसिक कार्य करने की एक सामान्य क्षमता भिन्न भिन्न मात्रा में मौजूद होती है।


G कारक की विशेषताएं


> यह योग्यता सभी व्यक्तियों में कम या अधिक मात्रा में मौजूद होती है।


> यह मानसिक योग्यता जन्मजात होती है।


★ जीवन की किसी भी अवधि में इसमें परिवर्तन संभव नहीं है।


विशिष्ट कारक


* इसे 5 कारक की संज्ञा दी गयी है।


*S कारक से तात्पर्य है कि प्रत्येक मानसिक कार्य को करने में कुछ विशिष्टता की जरुरत होती है क्योंकि प्रत्येक मानसिक कार्य एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्न होता है।


s कारक की विशेषतायें


5 कारक की मात्रा भिन्न भिन्न कार्यो के लिए निश्चित नहीं होती है।


> एक व्यक्ति में एक कार्य के लिए 5 कारक की मात्रा अधिक हो सकती है, परन्तु उसी व्यक्ति में दूसरे कार्यो के लिए स कारक की मात्रा कम हो सकती है।


★s कारक पर व्यक्ति के प्रशिक्षण पूर्व अनुभूतियों आदि का काफी अधिक प्रभाव पड़ता है।


प्रशिक्षण देकर 5 कारक की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।


थर्स्टन का समूह कारक सिद्धांत


* थर्स्टन ने बुद्धि की व्याख्या कई कारको के आधार पर की है।


• उन्होंने जी कारक तथा स कारक को अस्वीकृत करते हुए मानसिक प्रक्रियाओं को करने का एक सामान्य प्रधान कारक बताया।


* थर्स्टन ने अपने सिद्धांत में सात प्रधान क्षमताओं का वर्णन किया -


i. शाब्दिक अर्थ क्षमता अथवा v क्षमता: शब्दों तथा वाक्यों के अर्थ समझने की क्षमता


ii. शब्द प्रवाह क्षमता अथवा w क्षमता दिये गये शब्दों में से असंबंधित शब्दों को सोचना तथा अलग करने की क्षमता


iii. स्थानिक क्षमता अथवा क्षमता दिये हुए स्थान में वस्तुओं का परिचालन करने दूरी का प्रत्यक्षण करने तथा आकारों के पहचान करने की क्षमता


iv. आंकिक क्षमता अथवा N क्षमता: परिशुद्धता तथा तीव्रता के साथ आंकिक परिकलन करने की क्षमता


v. तर्क क्षमता अथवा R क्षमता वाक्यों तथा अक्षरों के समूह में छिपे नियम की खोज करने की क्षमता


vi. स्मृति क्षमता अथवा M क्षमता: किसी पाठ विषय या घटना को जल्द से जल्द याद कर लेने की क्षमता


vii. प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक गति क्षमता अथवा P क्षमता: किसी घटना या वस्तु विस्तृता का तेज़ी से प्रत्यक्षण कर लेने की क्षमता










बहुकारक सिद्धांत


* इस सिद्धांत का प्रतिपादन थार्नडाईक ने 1926 में किया। * इस सिद्धांत के प्रतिपादन ने स्पीयरमैन के सिद्धांत के विपक्ष में अपना मत दिया।


* इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की संज्ञानात्मक क्रियाओं में सह संबंध का कारण G कारक नहीं होता है, बल्कि इन क्रियाओं के बीच कई उभयनिष्ठ तत्व पाये जाते है।


• संज्ञानात्मक क्रियाओं में जितने अधिक उभयनिष्ठ तत्व होंगे, उनके बीच का सह संबंध उतना ही अधिक होगा।


* इनके अनुसार कुछ मानसिक कार्य ऐसे भी होते है जिनके तत्वों या कारकों में उभयनिष्ठ कम होती है।


त्रिविमीय सिद्धांत ( Three Dimensional Theory )


* इस सिद्धांत का प्रतिपादन गिलफोर्ड ( 1967) ने किया था। * इसे बुद्धि संरचना का सिद्धांत कहा जाता है। * गिलफोर्ड के अनुसार बुद्धि कुछ प्राथमिक बौद्धिक योग्यताओं की संरचना है। • गिलफोर्ड ने बुद्धि के सभी तत्वों को तीन विमाओं में सुसज्जित किया -


* संक्रिय


 विषय वस्तु


उत्पादन


संक्रिय (operation)


* संक्रिय से तात्पर्य व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले मानसिक प्रक्रिया के स्वरुप से होता है। * गिलफोर्ड ने संक्रिय के आधार पर मानसिक क्षमताओं को छह भागों में विभाजित किया


• मूल्यांकन अभिसारी .


• चिंतन


• अपसारी चिंतन


• स्मृति धारणा


••स्मृति अभिलेख तथा


• संज्ञान


विषय वस्तु (content)


* इस विमा से तात्पर्य उस क्षेत्र से होता है, जिसके एकांशो या सूचनाओं के आधार पर संक्रिया की जाती है।


* गिलफोर्ड ने इन्हें 5 भागों में बाँटा है


• दृष्टि


श्रवण


• सांकेतिक


• शाब्दिक


•व्यवहारपरक


उत्पादन (product)


* इस विमा से तात्पर्य किसी विशेष प्रकार की विषय वस्तु द्वारा की गयी संक्रिया के परिणामों से होता है।


गिलफोर्ड ने परिणामों को 6 भागों में बाँटा है।


• इकाई वर्ग


• संबंध


• पद्धतियाँ .


• रूपांतरण


• आशय 



कैटेल का सिद्धांत


* कैटेल ने बुद्धि को दो महत्त्वपूर्ण भागों में विभाजित किया है


• तरल बुद्धि (Fluid Intelligence) तरल बुद्धि का निर्धारण आनुवांशिक तथ्यात्मक ज्ञान होता है।


•ठोस बुद्धि (Crystallized Intelligence ) : जिन्हें व्यक्ति अपनी जिंदगी की अनुभूर्तियों में तरल बुद्धि का उपयोग करके अर्जित करता है।


• कैटेल के अनुसार तरल बुद्धि का विकास किशोरावस्था में अधिक होता है। • ठोस बुद्धि का विकास वयस्कावस्था में भी होता रहता है।


गार्डनर का बहुबुद्धि सिद्धांत


* गार्डनर के अनुसार बुद्धि का स्वरुप एकांकी न होकर बहुकारकीय होता है। * गार्डनर के अनुसार सामान्य बुद्धि में सात प्रकार की क्षमताएँ या बुद्धि सम्मिलित होती


i. भाषाई बुद्धि-: शब्दों तथा वाक्यों के अर्थ समझने की क्षमता तथा शब्दावली में शब्दों के क्रम तथा उनके मध्य पहचानने की क्षमता।


ii. तार्किक गणितीय बुद्धि तर्क करने की क्षमता गणितीय समस्याओं का समाधान करने की क्षमता, अंको को क्रम में व्यवस्थित करने की क्षमता तथा सादृश्यता क्षमता।


iii. स्थानिक बुद्धि: किसी स्थान विशेष को पहचानने की क्षमता दिशा पहचानने की क्षमता मानसिक धरातल या किसी स्थान विशेष का निर्माण करने की क्षमता।


iv. शारीरिक गतिक बुद्धि: अपनी शारीरिक गति पर नियंत्रण करने की क्षमता । इस प्रकार की बुद्धि का उपयोग एथलीट्स, नर्तक खिलाड़ी व न्यूरोसर्जन आदि करते है।


v. संगीतिक बुद्धि संगीत में तारत्व तथा लय का प्रत्यक्षण करने की क्षमता


vi. व्यक्तिगत आत्म बुद्धि: अपने संवेगों को जानने की क्षमता। इसे अन्तरवैयक्तिक बुद्धि भी कहते है।


vii. व्यक्तिगत अन्य बुद्धि : दूसरे व्यक्तियों की प्रेरणाओं, इच्छाओं एवं आवशयक्ताओं को समझने की क्षमता। इसे अंतर्वैयक्तिक बुद्धि भी कहते है।


प्रक्रिया उन्मुखी सिद्धांत


* इस सिद्धांत में बुद्धि की व्याख्या भिन्न-भिन्न कारकों के रूप में न करके उन बौद्धिक प्रक्रियाओं के रूप में की गयी है, जिसे व्यक्ति किसी समस्या का समाधान करने में या सोच विचार करने में लगता है।


• इस सिद्धांत में बुद्धि के लिए संज्ञान तथा संज्ञानात्मक प्रक्रिया शब्द का प्रयोग अधिक किया गया।


1. संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत:


* इस सिद्धांत का प्रतिपादन पियाजे ने 1920 30 में किया तथा 1970 में इसे विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया।


• इस सिद्धांत में बुद्धि को अनुकूली प्रक्रिया माना गया।


• पियाजे के कथनानुसार जैसे जैसे बच्चों में संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का विकास होता जाता है। वैसे वैसे ही उनका बौद्धिक विकास भी होता जाता है।


• पियाजे ने इसकी 4 अवस्थायें मानी है।


1. ज्ञानात्मक क्रियात्मक अवस्था :


* सेंसरी मोटर स्टेज संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के विकास का यह प्रथम चरण है। जो जन्म से लेकर 2 वर्ष की आयु तक होता है।


* इस अवस्था में बच्चा अपने आप को वातावरण की वस्तुओं से भिन्न समझने लगता है। * इस अवस्था में बच्चों में वस्तु परमानेन्ट का नियम विकसित हो जाता है। अर्थात बच्चे यह समझने लगते है कि नजरों के सामने न होने पर भी वस्तु का अस्तित्व है।


i. प्राक प्रचलनात्मक अवस्था


* यह अवस्था 2-7 साल तक होती है।


• यह अवस्था 2 भागों में विभाजित होती है।


A प्राक सम्प्रयात्मक अवधि ( 24 साल): बच्चा भिन्न-भिन्न प्रकार के संकेत प्रतिमाएँ शब्द तथा उसके अर्थ सीखता है।


बच्चे में भाषा का विकास होता है।


B- अन्तर्दर्शी अवधि (4-7 साल) : अन्तर्दर्शी चिंतन की ओर बच्चे का उन्मुख होना । बच्चा गणितीय प्रश्न हल करना सीख लेता है।


iii. मूर्त प्रचलनात्मक अवस्था


* यह 7 11 साल की अवस्था है।


* बच्चों में तार्किक चिंतन सोचने के ढंग में क्रमबद्धता तथा जटिलता आदि बढ़ने लगती है। * वस्तुओं को विमाओं के आधार पर वर्गीकृत करना सीख जाते है।


iv. औपचारिक प्रचालनात्मक अवस्था


* यह अवस्था 12-15 साल की होती है।


: बच्चों में अमूर्त तथा अपसारी चिंतन आदि गुण विकसित हो जाते है। * 15 की उम्र में बच्चे वयस्क के समान तार्किक नियमों का प्रयोग सीख लेते है।











2. त्रितंत्र सिद्धांत


• इसका प्रतिपादन स्टर्नबर्ग (1985) ने किया।


* इन्होंने बुद्धि को आलोचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता के रूप में बताया।


* स्टर्नबर्ग ने सूचना संसाधन हेतु व्यक्ति द्वारा क्रियान्वित 5 चरण बताये।


कूट संकेतन: इस चरण में व्यक्ति अपने मस्तिष्क में संगत में प्राप्त सूचनाओं की पहचान करता है।


• अनुमान प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कुछ अनुमान लगता है। .


• व्यवस्था वर्तमान और अतीत परिस्थिति के साथ संबंध जोड़ता है।


• उपयोग : अनुमानित संबंध का वास्तविक उपयोग करता है।


• अनुक्रिया समस्या का संभावित उत्तम समाधान ढूंढता है।


त्रितंत्र तीन उपसिद्धांतो पर आधारित है।


• सन्दर्भात्मक उप सिद्धांत इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति -


• वातावरण को अपने अनुकूल निर्मित करता है। .


• वातावरण में अपनी क्षमताओं का उपयोग करते हुए समायोजन करता है। .


: अनुभवजन्य उप सिद्धांत इस सिद्धांत के अनुसार - • व्यक्ति की बुद्धि में अमूर्त चिंतन करने तथा सूचनाओं को संसाधित करने की क्षमता होती है।


• व्यक्ति बदलते परिवेश तथा परिस्थितियों के साथ स्वयं में परिवर्तन लाता है।


* घटक उप सिद्धांत इस सिद्धांत के अनुसार. -


• इस प्रकार की क्षमता वाले व्यक्तियों की बुद्धि घटकीय बुद्धि कहलाती है। .


• ऐसी बुद्धि वाले व्यक्ति आलोचनात्मक तथा विश्लेषणात्मक ढंग से सोचने में निपुण होते है।










मानसिक आयु (Mental Age )


* विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अपने शोध निष्कर्षों के आधार पर व्यक्ति की आयु को दो भागों में बांटा है।


i. तैथिक आयु: यह किसी व्यक्ति की वास्तविक आयु होती है। इसका आरम्भ जन्म के दिन से ही होता है ।


ii. मानसिक आयु-: इससे तात्पर्य किसी एक आयु में सामान्य मानसिक योग्यता को ग्रहण कर लेने से है।


* यदि कोई 8 वर्ष का बालक 7 वर्ष की आयु वाले बालकों के लिए निर्धारित प्रश्नों के उत्तर ही दे पाता है, तो उसकी मानसिक आयु 7 वर्ष है।


• मानसिक आयु, तैथिक आयु से कम अधिक या बराबर कुछ भी हो सकती है।


* मानसिक आयु तैथिक आयु से कम है तो व्यक्ति मंद बुद्धि मन जाता है।


* मानसिक आयु तैथिक आयु से अधिक है तो व्यक्ति बुद्धिमान समझा जाता है।


* जब मानसिक आयु तथा तैथिक आयु बराबर होती है तब व्यक्ति तीव्र बुद्धि माना जाता है।