लाभ का सिद्धांत - The Principles of Profit

लाभ का सिद्धांत - The Profit Principles

लाभ का सिद्धांत - The Profit Principlesलाभ का सिद्धान्त 

लाभ का मजदूरी सिद्धान्त

लाभ का लगान सिद्धान्त 

लाभ का प्रवैगिक सिद्धान्त

शुम्पीटर का नव प्रवर्तन सिद्धान्त

लाभ का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त

लाभ का जोखिम सिद्धान्त 

लाभ का अनिश्चितता सिद्धान्त


प्रो. मेहता का लाभ का माँग एवं पूर्ति सिद्धान्त

लाभ का समाजवादी सिद्धान्त 

सामान्य लाभ 

प्रत्येक साहसी लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से जोखिम उठाता है। अतएव यह आवश्यक है कि उसे उत्पादन प्रक्रिया में कम से कम इतना लाभ मिलता रहे जिससे वह कार्य में लगा रहे। यही सामान्य लाभ है। असामान्य लाभ किसी भी साहसी को सामान्य लाभ के ऊपर जो लाभ प्राप्त होता है उसे असामान्य लाभ कहते हैं। हैन्सन के शब्दों में सामान्य लाभ के अतिरिक्त जो

लाभ प्राप्त होता है उसे असामान्य लाभ कहते हैं। असामान्य लाभ लगान की तरह एक प्रकार का अतिरेक है, जो कुशल साहसियों को मिलता है सीमान्त साहसी असामान्य लाभ नहीं प्राप्त कर पाता है। पूर्ण  प्रतियोगिता की स्थिति में असामान्य लाभ बाहरी फर्मों के प्रवेश के लिए आकर्षण का कारण बनता है और दीर्घकाल में असामान्य लाभ विलुप्त हो जाता है।





लाभ का मजदूरी सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अमरीकी अर्थशास्त्री प्रो. टॉजिंग द्वारा किया गया था। एक अन्य अमरीकी अर्थशास्त्री प्रो. डेवनपोर्ट ने इसका समर्थन किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार लाभ भी एक प्रकार की मजदूरी होता है, जिसे उद्यमकर्ता को उसकी सेवाओं के बदले चुकाया जाता है। प्रो0 टॉजिंग के शब्दों मेंलाभ उद्यमकर्ता की वह मजदरी है जो उसे उसकी विशेष योग्यता के कारण प्राप्त होती है। इस सिद्धान्त के अनुसार श्रम एवं उद्यम में पूर्ण समानता है। जिस प्रकार श्रम अपनी सेवाओ के बदले मजदूरी प्राप्त करता है, ठीक उसी प्रकार उद्यमी अपनी उत्पादन सम्बन्धी भूमिका के एवज में लाभ प्राप्त करता है। अन्तर केवल इतना है कि श्रम की सेवाएँ शारीरिक होती हैं जबकि उद्यमकर्ता का कार्य मानसिक होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उद्यमी, डॉक्टरों, वकीलों एवं अध्यापकों जैसे मानसिक कार्यकर्ताओं से किसी भी प्रकार भिन्न नहीं होता है। इसी आधार पर प्रो० टॉजिंग ने लाभ को एक प्रकार की ऐसी मजदूरी कहा है जो उद्यमी को सेवाओं के बदले प्राप्त होती है।

आलोचना :-

 आलोचकों ने इस सिद्धान्त के प्रमुख दोष निम्न बताये हैं

लाभ एक अवशेष भुगतान है जबकि मजदूरी सदैव धनात्मक रहती है।

उद्यमी को जोखिम व अनिश्चिताओं कासामना करना पड़ता है जबकि श्रमिक को ऐसी कोई समस्या नहीं होती। 

अपूर्ण प्रतियोगिता में लाभ बढ़ते हैं जबकि मजदूरी में कमी होने की प्रवृत्ति पायी जाती है।

संयुक्त पूँजी कम्पनी में अंशधारी लाभ प्राप्त करते हैं जबकि वे कोई भी मानसिक श्रम नहीं करते।

 





लाभ का लगान सिद्धान्त 

इस सिद्धान्त की परिकल्पना का श्रेय ब्रिटिश अर्थशास्त्री सीनियर तथा मिल को जाती है परन्तु प्रस्तुत करने का श्रेय अमरीकन अर्थशास्त्री प्रो० वॉकर को जाता है। यह सिद्धान्त वॉकर के नाम से ही जाना जाता है। इस सिद्धान्त का मूल मंत्र रिकार्डो का लगान सिद्धान्त है। रिकार्डों के अनुसार लगान एक भेदात्मक उपज है जो अधिक उर्वरता वाली भूमियों पर सीमान्त भूमि की अपेक्षा प्राप्त होती है। जिस प्रकार भूमि के भिन्न-भिन्न टुकड़ों की उपजाऊ शक्ति में अन्तर होता है उसी प्रकार उद्यमियों की योग्यता में भी अन्तर पाया जाता है। सीमान्त भूमि की भाँति सीमान्त उद्यमी सामान्य योग्यता का व्यक्ति होता है और वह अपनी वस्तु को उत्पादन लागत पर ही बेच पा सकने के कारण कोई आधिक्य प्राप्त नहीं कर पाता। सीमान्त उद्यमी से अधिक योग्य व कार्यकुशल उद्यमी आधिक्य प्राप्त कर लेते हैं, वही लाभ है।

आलोचना :-

इस सिद्धान्त के प्रमुख दोष निम्न पाये गये हैं यह सिद्धान्त एकाधिकारी लाभ व आकस्मिक लाभ के स्पष्ट नहीं करता।

सीमान्त उद्यमी की परिकल्पना ही गलत है क्योंकि सामान्य लाभ न मिलने पर उद्यमी व्यवसाय छोड़ जाता है। 

संयुक्त पूँजी कम्पनी के हिस्सेदारों को जो लाभांश मिलता है उसमें योग्यता का प्रश्न ही नहीं आता।

लाभ व लगान दोनों में मौलिक अन्तर है क्योंकि लगान कभी भी ऋणात्मक नहीं हो सकता। 

यह सिद्धान्त लाभों में पाये जाने वाले अन्तर को स्पष्ट करता है, उसकी प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता। 






लाभ का प्रवैगिक सिद्धान्त 

लाभ के इस सिद्धान्त का वैज्ञानिक विवेचन अमेरिकन अर्थशास्त्री क्लार्क के द्वारा किया गया है। क्लार्क के मत में लाभ अर्थव्यवस्था की प्रवैगिक स्थिति का परिणाम है, स्वैतिक अवस्था में लाभ का जन्म नहीं होगा। प्रवैगिक अवस्था, वस्तु के विक्रय मूल्य तथा लागत में अन्तर उत्पन्न करती है और यह अन्तर ही लाभ है।

उनके अनुसार स्थैतिक अवस्था में जहाँ माँग तथा पूर्ति की दशाओं में कोई परिवर्तन नहीं होता है, सीमान्त उत्पादकता सिद्धांत के आधार पर उत्पादन के साधनों के मूल्य दिये जाने पर कुल सीमान्त उत्पादन बैट जायेगा और साहसी को लाभ नहीं मिलेगा। क्लार्क के शब्दों में स्थैतिक अवस्था में उत्पत्ति के प्रत्येक साधन को उसके उत्पादन के बराबर भाग पारितोषिक के रूप में मिलता है और चूंकि लागत तथा विक्रय मूल्य सदैव समान रहते हैं, अतएव मजदूरी के अतिरिक्त निरीक्षण कार्य के लिए कोई मजदूरी नहीं मिलती है।"

क्लार्क ने प्रवैगिक अवस्था में निम्नांकित पाँच परिवर्तनों का उल्लेख किया है।

उत्पादन विधि में सुधार तथा तकनीकी विकास 

पूजा की पूर्ति में वृद्धि 

उपभोक्ताओं की रूचि, इच्छा आदि में परिवर्तन तथा 

औद्योगिक संगठन में परिवर्तन

आलोचनायें

 अर्थशास्त्रियों के अनुसार

इस सिद्धान्त के प्रमुख दोष निम्न हैं 

सभी प्रकार के परिवर्तन लाभ को जन्म नहीं देते बल्कि केवल वे परिवर्तन जो अनिश्चित या अज्ञात होते हैं, लाभ को जन्म देते हैं।

 यह कहना भी गलत है कि स्थिर अर्थव्यवस्था में लाभ बिल्कुल नहीं मिलता।

इस सिद्धान्त में लाभ और प्रबन्ध की मजदूरी के बीच एक काल्पनिक अन्तर किया गया है।

इस सिद्धान्त में जोखिम तत्व की पूर्णतः उपेक्षा की गयी है।


शुम्पीटर का नव प्रवर्तन सिद्धान्त 

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोजेफ शुम्पीटर ने इस बात पर बल दिया कि साहसी का प्रमुख कार्य उत्पादन क्रिया में प्रवर्तन को लाना है तथा लाभ इसी प्रवर्तन की क्रिया का प्रतिफत है। प्रवर्तन से उनका अभिप्राय किसी भी ऐसे परिवर्तन से है जिसके फलस्वरूप उनकी आय में वृद्धि आये। हम पहले ही जान चुके हैं कि किसी साहसी की

आप दो बातों पर निर्भर करती है उत्पादन की मात्रा तथा उत्पादन लागत दूसरे उत्पादित वस्तु की मांगा इस प्रकार सकते हैं कि एक ओर तो उत्पादन फलन में लाये जाने वाले ऐसे परिवर्तनों से सम्बन्धित है, जिससे न्यूनतम लागत पर अधिक से अधिक उत्पादन की प्राप्ति हो सके तथा दूसरे ऐसे परिवर्तन जिनसे उत्पादित वस्तुओं की मांग में वृद्धि हो सके इन प्रकार प्रवर्तन के अन्तर्गत प्रायः निम्नांकित किया आती है।

 

1. उत्पादन की नयी प्रविधि या तरीकों को जन्म देना।

2. कच्चे माल तथा सामग्रियों के किसी नये स्रोत की खोजा

3. किसी भी उद्योग में संगठन को बनाये रखना

4. किसी नयी वस्तु को बाजार में लाना तथा

5. किसी नये बाजार की खोज

 

नवप्रवर्तन तथा लाभ के सम्बन्ध में प्रशस्टिंगलर का दृष्टिकोण

अत्यन्त ही उल्लेखनीय है। उनके अनुसार कोई एक स्थायी एकाधिकार की स्थिति स्थापित नहीं कर लेता, ऐसे सफल वर्तन के कारण प्राप्त होते हैं, संक्रमणकारी होंगे और अन्य फर्मों के इन्हें बटने के के कारण हो जायेंगे पर ये लाभ अन्य फर्मों की इसके सम्बन्ध में अनभिता के कारण या नयी फर्मों के प्रदेश में समय लगने के कारण समय के लिए बने रह सकते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सफल प्रवर्तक लगातार इस प्रकार के असामान्य लाभ को अर्जित कर सकता है, क्योंकि प्रवर्तन को उत्पादन के प्रयोग में शुरू करता है तो कुछ समय तक तो उसकी सफलता के कारण उसे एकाधिकार की स्थिति प्राप्त हो जाता है और यह लाभ अर्जित करता है। पर पर यह लाभ हो जाता है।

 




आलोचनायें

यह सिद्धान्त हमारे समय लाभ की व्यापक व्याख्या प्रस्तुत नही करता। इसमें सन्देह नहीं है कि नवप्रवर्तनों के कारण सा उत्पन्न होता है। नव प्रवर्तन वास्तव में लाभ के महत्पूर्ण निर्धारक है लेकिन नवप्रवर्तनों के अलावा अन्य बहुत से ऐसे तत्व है जो लाभ का कारण बनते हैं। किन्तु यह सिद्धान्त उन पर कुछ भी प्रकाश नहीं डालता। यह सिद्धान्त तो समूचा बल नन पर ही देता है।

इस सिद्धान्त के अनुसार लाभ जोखिम झेलने का प्रतिफल नहीं है। प्रो0 शुम्पीटर के शब्दों में, "मकर्ता कभी जोखिम नहीं उठाता यदि उसका व्यवसाय असफल हो जाता है तो उससे प्रदान करने वाले व्यक्ति को ही हानि होती है। प्रो० सुम्पीटर के अनुसार, जोखिम पूँजीपति द्वारा उठाया जाता है, यमकर्ता द्वारा नहीं लेकिन प्रो० शुम्पीटर कथन तथ्यों के विपरीत है। वास्तव में, उद्यमकर्ता जोखिम उठाता है, पूंजीपति नहीं उद्यमकर्ता के कार्यों पर यह सिद्धान्त एक संकुचित दृष्टिकोण अपनाता है। उधकर्ता का कार्यको करना ही नहीं है, हाय के समुचित संगठन के लिए भी समान रूप में उत्तरदायी होता है। अतःलाभवनों के कारण ही नहीं होता यह उद्यमकर्ता द्वारा सम्पन्न किये गये कार्यों के कारण भी होता है। यह सर्वविदित है कि सभी  नवप्रवर्तन नहीं करते लेकिन फिर भी उन्हें कुछ लाभ तो प्राप्त होता ही रहता है।

लाभ का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त

वितरण का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त साधनों के पुरस्कार निर्धारण की दृष्टि से एक वैज्ञानिक सिद्धान्त माना जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार यदि अन्य बातें समान रहें तो दीर्घकाल में किसी साधन का पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता में समान होने की प्रवृत्ति पायी जाती हैं। उद्यमी की सीमान्त उत्पादकता अधिक होने पर लाभ की मात्रा अधिक होगी और उद्यमी की सीमान्त उत्पादकता कम होने पर लाभ की मात्रा कम होगी। यहाँ एक बात स्पष्ट रूप से कहना आवश्यक है कि भूमि, श्रम, पूजा आदि साधन तो ऐसे हैं, जिनकी सामान्य उत्पादकता सरलता से बात की जा सकती है, क्योंकि अन्य साधनों की मात्रा स्थिर रखकर इनकी क्रमशः एक इकाई बढ़ाकर सीमान्त उत्पादकता निकाली जा सकती है और परिवर्तनशील अनुपातों के नियम लागू होने के कारण एक बिन्द के बाद सीमान्त उत्पादकता क्रमश: गिरती जाती है। एक फर्म में उद्यमी की सीमान्त उत्पादकता ज्ञात करना कठिन है, क्योंकि एक फर्म में एक ही उद्यमी होता है। हाँ, उद्योग में उद्यमी की सीमान्त उत्पादकता ज्ञात की जा सकती है।

 




आलोचनायें:

इस सिद्धान्त की आलोचना निम्न बातों पर आधार की गयी है यह सिद्धान्त मांग पर ही विचार करता है और पूर्ति पक्ष की उपेक्षा करता है। इसे एकपक्षीय सिद्धान्त कहा जा सकता है। माहसी या उद्यमी की सीमान्त उत्पादकता की गणना सरलता से नहीं की जा सकती क्योंकि एक फर्म की स्थिति में एक ही उद्यमी होता है। इस सिद्धान्त में भी लाभ के निर्धारक महत्वपूर्ण तत्वों को छोड़ दिया गया है।


लाभ का जोखिम सिद्धान्त 

अमेरीकन अर्थशास्त्री होते के अनुसार लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार है, क्योंकि उद्यमी का सबसे बड़ा कार्य जोखिम उठाना है। उत्पादन के अन्य साधनों को उनके पुरस्कार का निश्चित समय पर भुगतान कर दिया जाता है परन्त उद्यमों को चार प्रकार की प्रतिस्थापन की जोखिक क्योंकि बिल्डिंग व मशीनरी में पिसावट होती है।

मुख्य जोखिम जिसमें उत्पादन का ननिक पाना व्यापार का सामना करना बाजार में प्रतिकूल परिस्थितियों का उत्पन्न होना पुराना पड़ जाना जिसमें उत्पादन तकनीकी तथा फैशन आदि के कारण प्लाट का पुराना हो जाने की स्थिति आती है तथा अनिश्चितता प्रतिस्थापन या पिसाब का अनुमान लगाया जा सकता है, परन्तु मशीन अथवा बिल्डिंग के पुराने पड़े जाने के सम्बन्ध में उचित अनुमान लगाना सम्भव नहीं हो पाती वस्तु को उत्पन्न करने तथा बेचने में समय अन्तर होने के कारण हो सकता है कि उद्यमियों के अनुमान गलत सिद्ध हो जायें। इसके फलस्वरूप उद्यमी को हानि भी हो सकती है। उद्यमी पनि तभी सहेगा जब उसे लाभ की अपेक्षा हो हाँले यह मानते थे कि उद्यमी को प्रबन्ध समन्वय का पुरस्कार लाभ के रूप में नहीं मिलता बल्कि लाभ जोखिम उठाने का पुरस्कार है।

भविष्य की मांग उत्पादन कीमत के बारे में सही अनुमान लग आवश्यक नहीं है, इसी कारण व्यवसाय में जोखिम की संभावना बनी रहती है।


आलोचना 

अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त की त्रुटियाँ निम्न बतायी हैं जोखिम और लाभ के बीच कोई सहसम्बन्ध नहीं होता कारवर के अनुसार उदयमी को लाभ जोखिम कम करने के फलस्वरूप मिलता है। जोखिम उठाने के अलावा भी उदयमी अनिश्चितता ब्रहन अन्य कार्य करता है, जिन्हें इस सिद्धान्त में छोड़ गया है।

 

प्रो. नाइट के अनुसार लाभ जात जोखिमों के बजाय अज्ञात जोखिमों की सहने के कारण मिलता है।

लाभ का अनिश्चितता सिद्धान्त

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन शिकागो विश्वविद्यालय के प्रो० नाइट ने अपनी पुस्तक "Risk Uncertainty and Profit" में किया है। प्रो० नाइट अपने सिद्धान्त में इस बात पर बल देते हैं कि उद्यमी को लाभ जोखिम उठाने के में कारण प्राप्त नहीं होता बल्कि उत्पादन प्रक्रिया की अनिश्चितता सहन करने के पुरस्कार रूप में प्राप्त होता है। प्रो० नाइट ने जोखिम एवं अनिश्चितता में भेद के किया है। उनके अनुसार सभी प्रकार के जोखिम उद्यमी के लिए अनिश्चितताएँ उत्पन्न नहीं करते। जोखिम की अनिश्चितता के आधार पर प्रो० नाइट ने दो भागों में बांटा है

1. ज्ञात जोखिम 

2. अज्ञात जोखिम

उत्पादन प्रक्रिया में उन जोखिमों को ज्ञात जोखिमों की संज्ञा दी जाती है, जिनकी उद्यमी पूर्वानुमान लगा सकता है, जैसे आग, बाढ़, चोरी, दुर्घटना, टूट-फूट आदि घटनाओं का उद्यमी को पूर्वानुमान होता है।

ज्ञात जोखिमों में विपरीत उद्यमी के लिए उत्पादन प्रक्रिया में कुछ ऐसे जोखिम विद्यमान रहते हैं जिनका उद्यमी को पूर्वानुमान नहीं होता अर्थात् जिनके बारे में सही-सही जानकारी हासिल नहीं की जा सकती। ऐसे अनिश्चित जोखिमों को अज्ञात जोखिम कहा जाता है।

नाइट के अनुसार, "उद्यमी को ऐसी अनिश्चितता झेलने का पुरस्कार ही लाभ के रूप में प्राप्त होता है। व्यवसाय में जितनी अधिक बीमा अयोग्य अनिश्चितताएँ उपस्थित होंगी, उद्यमी की लाभ की मात्रा उतनी ही अधिक होगी।


आलोचनायें :- 

आलोचकों ने इस सिद्धान्त की निम्न आलोचनाएँ की हैं।

उद्यमी के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को इस सिद्धान्त में छोड़ दिया गया है, जैसे व्यवसाय में समन्वय का कार्य।

आलोचक अनिश्चितता वहन करना एक अलग कार्य के रूप में स्वीकार नहीं करते।

संयुक्त पूँजी कम्पनी के हिस्सेदारों को जो लाभांश प्राप्त होता है उसमें वे अनिश्चिततओं का सामना नहीं करते। अतः कोई आवश्यक नहीं कि लाभ अनिश्चितताएँ सहने के परिणामस्वरूप ही प्राप्त हों।


प्रो. मेहता का लाभ का माँग एवं पूर्ति सिद्धान्त 

प्रो मेहता ने यह प्रतिपादित किया किलाभ अनिश्चितताकर्ता की आय है। जिस प्रकार किसी वस्तु का मूल्य उसकी माँग तथा पूर्ति के द्वारा निर्धारित होता है उसी प्रकार साहसी को मिलने वाले मूल्य (लाभ) का भी निर्धारण अनिश्चितता बहन की माँग तथा उसकी पूर्ति के द्वारा निर्धारित होता शैलाभ अनिश्चितता बहन का पुरस्कार है, इसका निर्धारण अनिश्चितता ह की मांग एवं पूर्ति के द्वारा होता है। पर प्रश्न यह है कि अनिश्चितता बहन की माँग तथा पूर्ति रेखाओं को कैसे खींचा जाय इसका क्या स्वरूप हो ? मेहता अपने सिद्धान्त की व्याख्या करते समय दो बातों को ध्यान में रखते हैं, जिसमें उनके सिद्धान्त में वे दोष न आ जाये जो नाइट के सिद्धान्त में म थे। प्रथम वह यह मानते हैं कि साहसी का कार्य अनिश्चित वहन करना है, उत्पादन का निर्देशन तथा नियंत्रण करना नहीं। इस प्रकार साहसी का कार्य संगठन के कार्य से भिन्न है। इसलिए लाभ केवल अनिश्चितता वहन के लिए ही मिलता है। प्रो० नाइट दोनों के बीच भेद करने की कठिनाई को महसूस करते हैं और प्रो0 मेहता भी इस कठिनाई का अनुभव करते हैं पर वह यह मानकर चलते हैं कि यह सम्भव है कि हम मस्तिष्क में इन दोनों के बीच भेद इन ल दूसरा, लाभ के अन्तर्गत वे आकस्मिक आय को सम्मिलित नहीं कर करते हैं, केवल अनिश्चितता बहन के बदले प्राम आप को हौ लाभ के रूप में स्वीकार करते हैं तथा यह मत व्यक्त करते हैं कि किराये पर या प्रसविदा के आधार पर लिये गये उत्पादन के साधनों को पारिश्रमिक देने के बाद जो अवशेष होगा, यदि यह अनिश्चितता बहन के बदले दिये जाने वाले पारिश्रमिक से अधिक हो तो यह अतिरेक आकस्मिक लाभ होगा और यदि यह कम हुआ तो आकस्मिक हानि होगी।

 





अनिश्चितता पहनकर्ता की माँग कौन करता है? तथा इस प्रकार की मांग तथा लाभ की दर में क्या सम्बन्ध है ? अनिश्चितता बहन की माँग उन उत्पादन के साधनों द्वारा होती है जो उत्पादन क्रिया में भाग - लेना तो चाहते हैं पर जोखिम उठाने अ अनिश्चितता को वहन नहीं करना चाहते। इसीलिए एक ऐसे साधन की खोज करते हैं, जो उन्हें अनिश्चितता से सुरक्षित रखें, उन्हें एक स्थिर आय प्राप्ति का आश्वासन दे दें। इस प्रकार के साहसी की माँग अनिश्चितता वहन के लिए करते हैं। स्पष्ट है कि साहसी की माँग श्रमिक, भूमिपति, पूंजीपति तथा संगठन या जिन्हें हम प्रसंविदा के अन्तर्गत किराये पर लिये गये उत्पादन के साधन कह सकते हैं, के द्वारा होती है। अब हम दूसरे प्रश्न पर विचार करेंगे अर्थात् लाभ की दर तथा माँग में क्या सम्बन्ध होता है ? प्रो० मेहता का यह मत है कि यदि अन्य बातें समान रहें तो लाभ की दर जितनी ऊँची होती जायेगी अन्य साधनों की आय उतनी ही कम होती जायेगी। इसलिए लाभ की ऊंची दर पर वे कम साहसियों की मांग करेंगे। इनके विपरीत लाभ दर नीची होने पर अधिक साहसियों की मांग करेंगे। इसका दूसरा कारण यह हो सकता है कि किसी भी साधन की माँग एवं व्युत्पन्न मांग है।

 

प्रो. मेहता का लाभ का माँग एवं पूर्ति सिद्धान्त

यह आसकी सीमान्त उत्पादकता पर निर्भर करती है। अन्य साधनों की ही तरह साहसी की भी सीमान्त उत्पादकता साहसी की इकाई में वृद्धि के साथ घटती जायेगी इसलिये इसपर आधारित मांग-रेखा नीचे दाहिनी ओर गिरेगी। इस प्रकार स्पष्ट है कि सामान्य मांग वक्र की तरह अनिश्चितता वहन की मांग-रेखा दाहिनी ओर गिरती जायेगी जैसा रेखाचित्र में दिखाया गया है।

अनिश्चितता बहन की पूर्ति तो त्याग के ऊपर निर्भर करता है, जैसे-जैसे अनिश्चितता बहन की पूर्ति बढ़ती जायेगी लाभ की मात्रा बढ़ती जायेगी। इसलिए ऊँची लाभ दर पर अनिश्चितता बहन की पूर्ति अधिक होगी क्योंकि उनके त्याग की क्षतिपूर्ति हो जायेंगी। रेखाचित्र स्पष्ट है, यदि लाभ दर OP से अधिक हो जाय तो ऐसे लोग भी साहसी के रूप में सामने आ सकते हैं जो पहले कम लाभदर पर जोखिम को बहन करने के लिए तैयार नहीं थे। इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि अनिश्चितता ही पूर्ति रेखा सामान्य पूर्ति रेखा की ही तरह ऊपर दाहिनी ओर उठती हुई होगी जो यह प्रदर्शित करेगी कि जैसे जैसे लाभ की दर बढ़ती जायेगी साहसी की पूर्ति बढ़ती जायेगी।

लाभ की संस्थिति दर का निर्धारण यहाँ होगा जहाँ नीचे गिरती हुवी माँग रेखा ऊपर से उठती हुयी पूर्तिरेखा के बराबर हो जाय जैसा रखाचित्र में प्रदर्शित है| नीचे गिरती हुयी माँग रेखा (DD) ऊपर उठती हुयो पूर्ति रेखा (SS) को E बिन्दु पर काटती है। लाभ की OP निर्धारित होगी।

लाभ का समाजवादी सिद्धान्त

कार्ल मार्क्स ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का पारिश्रमिक श्रम को प्राप्त नहीं होगा। बल्कि वह जितना भाग उत्पादित करता है, उससे कम भाग उसे प्राप्त होता पाता है। इस व्यवस्था में पूँजीपति, श्रम का शोषण करता है और श्रम एक अधिक्य मूल्य का निर्माण करता है, जिसे पूँजीपति हडप कर जाता है। मार्क्स यह मानते थे कि लाभ एक प्रकार की कानूनी डकैती है जो पूँजीवादी व्यवस्था में श्रम के शोषण के फलस्वरूप पूँजीपति को प्राप्त होती है।

श्रम शक्ति की यह विशेषता है कि यह अपने मूल्य से अधिक मूल्य का सृजन करती है। श्रम शक्ति का निर्धारण श्रम की पुनरुत्थान लागत पर निर्भर करता है। अर्थात् उन वस्तुओं व सेवाओं के मूल्य पर जो श्रमिक न्यूनतम निर्वाह.

स्तर पर बनाये रखने लिए आवश्यक है। मार्क्स के अनुसार लाभ श्रम शक्ति के शोषण के कारण उत्पन्न होता है।

 

आलोचनायें

इस सिद्धान्त के विरुद्ध विद्वानों की तीखी प्रतिक्रियाएँ हुई हैं। उनमें से कुछ प्रमुख निम्नवत् है

यह सिद्धान्त रिकाडों के मूल्य सिद्धान्त पर आधारित है जिसके अनुसार श्रम ही मूल्य निर्धारित करता है। यह बात गलत है क्योंकि उत्पादन के अन्य साधन भी उत्पादन में योगदान देते हैं और वे भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।


 लाभ जोखिम अनिश्चितता के कारण उत्पन्न होते हैं न कि श्रम के शोषण के कारण।

समाजवादी व्यवस्था में भी लाभ का औचित्य है।नहीं होने से अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल हो सकतती है। क्योंकि यदि सरकारी उद्यम हानि ही देते रहें तो अर्थव्यवस्था की क्या स्थिति होगी हम इसकी कल्पना कर सकते हैं।

 

लाभ को कानूनी डाका कहना उद्यमी की पृष्ठभूमि को समाप्त करना है।