सामाजिक नियोजन के सिद्धांत - Principles of Social Planning

सामाजिक नियोजन के सिद्धांत - Principles of Social Planning

सामाजिक नियोजन के सिद्धांत - Principles of Social Planning

सामाजिक नियोजन के प्रमुख सिद्धांतों को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है। 


1) समय के उचित प्रयोग का सिद्धांत 


सामाजिक नियोजन की योजना बनाते समय योजना के पुरे होने का समय अवश्य निश्चित कर देना चाहिए ताकि विभिन्न कार्यक्रमों के पालन समय का ध्यान रखा जा सके। योजना बनाते समय प्रभावकारी पक्षों का विस्तृत अध्ययन करते हुए प्राथमिकता तय करने के बाद कार्यान्वयन पर लगने वाले समय का मूल्यांकन करते हुए समय की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। 


2) लोचशीलता का सिद्धान्त 


नियोजन लोचशील होना चाहिए क्योंकि यह भविष्य के पूर्वानुमानों पर आधारित होता है। नियोजन इतना लोचशील होना चाहिए कि अनिश्चित घटनाओं के कारण होने वाली हानियों को कम किया जा सके। प्रत्येक समाज या समुदाय का सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश एवं भौतिक पर्यावरण के भिन्न होने के कारण, योजना को कार्यान्वित करते समय हमेशा एक ही रणनीति अथवा प्रणाली प्रभावी नहीं होती। अतः यह आवश्यक है। योजना लचीला हो ताकि परिस्थितियों की आवश्यकतानुसार इसमें संशोधन किया जा सके। लोचशीलता से तात्पर्ल्स है कि योजना में आसानी से परिवर्तन किया जा सके व नए मार्गों को अपनाया जा सके। 


3) प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग का सिद्धान्त 


सामाजिक नियोजन करते समय, नियोजकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रयोग उत्पादन करने हेतु तथा उसका सावधानी पूर्वक उपयोग करने के साथ-साथ उन्हें बढ़ाने तथा सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरीके से करना चाहिए कि उसका दोहन न हो तथा इसकी धारणीयता भी सुनिश्चित हो सके। 








4) समन्वय का सिद्धान्त 


सामाजिक नियोजन मुख्यत: निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बेहतर समन्वय पर निर्भर करता है। अल्पविकसित एवं विकासशील देशों में प्राय समन्वय का अभाव पाया जाता है। नियोजन की सफलता बेहतर ताल मेल यानी समन्वयव पर निर्भर करती है।


5) प्राथमिकता का सिद्धान्त 


इस सिद्धान्त के अनुसार नियोजन एक महत्वपूर्ण प्रबंधकीय कार्य है। सामजिक नियोजन के दौरान सामाजिक विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है अत: पिछड़े क्षेत्रों के विकास को सर्वप्रथम प्राथमिकता देना चाहिए इसके लिए अधिक धन तथा पूँजी की आवश्यकता होती है। यह पूँजी सरकार के पास सर्वाधिक उपलब्ध होती है। अत: सामाजिक नियोजन की दृष्टि से यह अधिक उपयोगी होगा कि देश में पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास का दायित्व केन्द्र सरकार द्वारा प्राथमिकता के साथ ग्रहण किया जाए। 


6) जनसहभागिता का सिद्धान्त 


किसी भी प्रकार का सामाजिक नियोजन, समाज के विकास एवं कल्याण हेतु किया जाता है। नियोजन द्वारा समाज जिन समूहों या वर्गों से संबंधित परिवर्तन होने है उनकी नियोजन में सहभागिता होनी चाहिए। क्योंकि सहभागिता के बिना समाज में परिवर्तन का महत्व नहीं समझा जा सकता साथ ही साथ सरकार के पास भी इतने तथा ऐसे संसाधन नहीं होते कि वह योजना निर्माण एवं कार्यान्यवन से संबंधित विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्वि संतोषजनक ढंग से केवल सरकारी तंत्र का प्रयोग करते हुए कर सके। अल्तान सहभागिता एवं जन सहयोग आवश्यक हो जाता है। 


7) बचत वृद्धि एवं पूंजी सृजन का सिद्धान्त 


सामाजिक नियोजन प्राय: पूँजी के आधार पर आधारित होती है।

पूँजी अधिक होगी तभी योजनाएँ उचित रूप से कार्यान्वित हो पाएगी तथा लक्ष्यों की अधिकतम प्राप्ति संभव हो सकेगी। अतः नीतियों का निर्धारण एवं कार्यान्वयन इस दृष्टिकोण से करना चाहिए कि बचत हो सके तथा पूँजी का सजन हो सके। 


8) संसाधनों को आवंटन का सिद्धान्त


नियोजन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। अत: योजना के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार संसाधनों को आवंटित किया जाना चाहिए। 










9) नीति संरचना का सिद्धान्त 


यह सिद्धान्त यह बतलाता है कि नियोजन को सुसंगत एवं प्रभावीबनाने के लिए सुदृढ़ नीतियों कार्यक्रमों एवं समूह रचनाओं का निर्माण किया जाना चाहिए। 


10) मूल्यांकन का सिद्धान्त 


किसी भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग मूल्याकंन होता है। योजना के समुचित एवं सामयिक मूल्यांकन से यह पता चलता है कि निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हो रही है, उद्देश्यों की प्राप्ति में संसाधन कहाँ तक उपयोगी हो रहे हैं इनकी प्राप्ति के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएँ है तथा इनको कैसे दूर किया जा सकता है। 

अत: मूल्यांकन से हमें यह जानकारी मिलती है कि कहाँ योजना में संशोधन किये जाने की आवश्यकता है।