समाज कल्याण प्रशासन के सिद्धांत - Principles of Social Welfare Administration

समाज कल्याण प्रशासन के सिद्धांत - Principles of Social Welfare Administration

 समाज कल्याण प्रशासन के सिद्धांत - Principles of Social Welfare Administration


विभिन्न विद्वानोंने समाज कल्याण प्रशासन के विभिन्न विभिन्न सिद्धान्त बताएँ है। आर्थर डनहम ने समाज कल्याण प्रशान के 13 सिद्धान्तो का सुझाव दिया है। डी. पाल चौधरी ने इसके 10 सिद्धान्त बताए है। उपरोक्त तथा अन्य विद्वानों के विचारों के अध्ययन एवं विश्लेषण से समाज कल्याण प्रशासन के निम्नलिखित सिद्धान्त स्पष्ट होते हैं -


1. सेवारत होने का सिद्धान्त 


वह सिद्वान्त जिसके अनुसार सभी प्रकार के कार्यजाने के हित के लिए होते है तथा जनता को सर्वोपरि मानकर किये जाने चाहिए प्रशासन जनता के हित में सेवारत रहता है, सेवारत होने का सिद्वान्त कहलाता है। चूँकि व्यावहारिक रूप में इन सेवाओं की प्रकृति अत्यधिक जटिल होती है इसलिए प्रशासन आज चाहे जिस स्तर का हो अधिकारी बन गया है तथा जनता सेवक हो गयी है। 

इससे समाज कल्याण के मार्ग में अनेकानेक बाधाएँ उत्पन्न हो गयी है। समाज कल्याण के क्षेत्र में यह अत्यन्त आवश्यक है कि सेवाओं का प्रशासन से से कि वे सीधे सेवार्थी को उपलब्ध हो सके और बिचौलियो की आवश्यकता न पड़े। 






2. समन्वय का सिद्धान्त


यह सिंद्धात स्पष्ट करता है कि सेवार्थी को समाज कल्याण सेवाएँ उपलब्ध कराने वाली विभिन्न ऐजेंसियों के बीच समुचित समन्क्य होना चाहिए नही तो अभ्यास वांछित परिणाम देने में असफल हो जायेगी। आज विशेषीकरण के कारण कल्याण के क्षेत्र की भिन्न भिन्न सेवाएँ भिन्न-भिन्न संस्थाओं के माध्यम से प्रदान की जाती है। उनमे आपस में मेल न होने से पर्याप्त लाभ नहीं पहुँच पाता है। अतः यह आवश्यक समझा जाने लगा है कि यदि एन सी संस्था के माध्यम से सभी प्रकार की सेवाएँ उपलब्ध करायी जाये तो प्रशासन का कार्य अधिक प्रभावपूर्ण हो जायेगा। 


3. प्रगतिशील सामंजस्य का सिद्धान्त 


वह सिद्धान्त जिसके अनुसार सेवार्थी की आवश्यकताओं मे परिवर्तन के साथ-साथ सेवाओं को परिवर्तित होना चाहिए जिससे वे सेवार्थी के लिए अधिकतम उपयोगी सिद्ध हो सके, प्रगति शील सामन्जस्य का सिद्धान्त कहलाता है। प्रशासन का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह सेवाओं मे निरन्त नवीनता लाने का प्रयत्न करता रहे।


4. सामाजिक नीति को व्यवहार मे लाने का सिद्धान्त


यह सिद्धान्त बताता है कि समाज कल्याण प्रशासन को सामाजिक नीतियों को मूर्त सामाजिक सेवाओं में परिवर्तित करना चाहिए। इसका सर्वप्रमुख दायित्व है कि वह सामाजिक नीतियों को शत-प्रतिशत लागू करे। नीति का निर्धारण लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। उनकी प्राथमिकता निर्धारित की जाती है और यदि कार्यक्रम सामाजिक नीति के अनुसार आयोजित नहीं किये जाते है तो इनसे वास्तविक लक्ष्य प्राप्त नही होते है।



5. सामाजिक नीति को कल्याण नीति में परिवर्तित करने का सिद्धान्त 


यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि समाज कल्याण यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रशासन में मानवता तथा जनतांत्रिकता का अधिक से अधिक ध्यान रखे और निर्बलो अशक्ती बच्चो महिलाओं पिछड़े वर्गों आदि के हितो को सर्वोपरि समझे।


6. स्थानीय समस्याओं से अनुकूलन का सिद्धान्त 


वह सिद्धान्त जिसके अनुसार प्रशासन को पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित करना लागू करना चाहिए, स्थानीय समस्याओं से अनुकूलन का सिद्धान्तकहलाता है। इसके अनुसरण में प्रशासक पहले समुदाय की आवश्यकताओं तथा समस्याओं का अध्ययन करता है और तप्रश्चात उनके अनुसाद कार्यक्रमों को परिवर्तित कर लागू करता है।


7. परस्पर सुदृढ़ सम्बन्ध का सिद्धान्त 


इस सिद्धान्त के अनुसार प्रशासन तथा सेवार्थी तथा जनता के बीच सम्बन्ध घनिष्ट व पारस्परिक होना चाहिए नहीं तो अभ्यास प्रक्रिया सफल नही होगी। इस सिद्धान्त के अनुसरण में प्रशासक अपने कार्यकर्तायों से ऐसे वातावरण निर्मित करता है कि जिससे पारस्परिक सम्बन्ध एक-दूसरे के प्रति विश्वास, सहयोग, मैत्री भाव तथा सन्निकटता के बन सके।









8. लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त


यह सिद्धान्त बताता है कि जनता का कार्य जनता द्वारा ही होना चाहिए तभी अभ्यास प्रक्रिया सही तरीके से अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगी। इस सिद्धान्त के अनुसरण में प्रशासक आवश्यकतानुसार अधिकारी एवं कर्तव्यों का निर्धारण करता है, समितियाँ बनाता है और जनता की पूरी भागीदारी प्राप्त करने का प्रयास करता है।


9. सम्प्रेषण का सिद्धान्त 


इस सिद्धान्त के अनुसार प्रशासन को सेवार्थी के साथ वार्तालाप मे ऐसी भाषा तथा शब्दों का प्रयोग करना चाहिए जिसे सेवार्थी आसानी से समझ सके। इस सिद्धान्त का


पालन करने से सेवार्थी तथा प्रशासन के बीच आपसी समझ, पारस्परिक विश्वास घनिष्टता बढ़ती है जो अभ्यास प्रक्रिया की सफलता की एक पूर्व शर्त है।


10. संवेदनशीलता का सिद्धान्त 


यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि प्रशासन को सेवार्थी के सुखो दुखो के प्रति असधिक संवेदनशील तथा मानवीय होना चाहिए। यदि सेवार्थी या उसका कोई घटक दुखी है तो प्रशासन को उसके दुख को बाँटने का पूरा प्रयास करना चाहिए इस सिद्धान्त का पालन करने से प्रशासन को सेवार्थी की आलीपता, सहानुभूति वसक्रिय सहयोग प्राप्त होता है।





11. स्व - मूल्यांकन का सिद्धान्त 


समाज कल्याण अभिकरण को एक उपयुक्त अंतराल पर अपनी सफलताओं व असफलताओं काअपनी वर्तमान प्रास्थिति व प्रोग्रामो का, उद्देश्यों एवं संस्थापित मानदण्डो के अनुसार अपने कार्य निष्पादन का अपनी शक्तियों एवं कमजोरियों का तथा अपनी वर्तमान समस्याओं का मूल्याकंन करते रहता चाहिए। इससे अभिकरण को अपनी कमियों का दूर कर अधिक सक्षम तथा प्रभावकारी बनने में सहायता मिलती है।


12. अभिकरण के सुसंगठन का सिद्धान्त 


इस सिद्धान्त के अनुसार अभिकरण सुसंगठित होना चाहिए। नीति निर्माण तथा कार्यान्वयन मे स्पष्ट अंतर होना चाहिए। आदेश की एकता होनी चाहिए और संगठन की सभी इकाइयों के बीच प्रभावी समन्वयन होना चाहिए। इस सिद्धान्त का अनुसरण अभिकरण को अधिक प्रभावशाली बना देता है।