भारत में सामाजिक नियोजन की समस्याएँ - Problems of Social Planning in India

भारत में सामाजिक नियोजन की समस्याएँ - Problems of Social Planning in India

 भारत में सामाजिक नियोजन की समस्याएँ - Problems of Social Planning in India


भारत में सामाजिक नियोजन की प्रमुख समस्याएं निम्नलिखित हैं: 


1. योजना निर्माण तथा कार्यान्वयन की पृथक संस्थाओं का पाया जाना।


2. कार्यान्वयन की अपेक्षा योजना निर्माण पर अधिक बल दिया जाना। 


3. सामाजिक एवं आर्थिक नियोजन को पृथकता में देखने के साथसाथ इनसे सम्बन्धित विभिन्न तत्वों को भी अलग-अलग देखे जाने के कारण बनाई जाने वाली योजनाओं में आवश्क सम्पूर्णता के विचार का अभाव। 


4. प्रौद्योगिक का अंधानुकरण न कर क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं को ध्यम में रखते हुए सर्वाधिक उपयुक्त प्रौद्योगिक को प्रयोग में लाने के लिए अपेक्षित समुचित मनोवृत्ति का अभाव।


5. यथार्थवादी आँकड़ों का उपलब्ध न हो पाना ।


6. ग्रामीण अंचलों में गांवों को तथा नगरीय अंचलों में मुहल्ले को नियोजन की इकाई न मानकर योजनाओं का निर्माण किया जाना।


7. योजनाओं का निर्माण करते समय क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं कठेचित रूप से सम्मिलित न किया जाना।


8. स्थानीय स्तर के लोगों का योजनाओं के निर्माण में सम्मिलित न किया जाना और इसके परिणामस्कप उनके द्वारा योजनाओं को ऊपर से थोपा हुआ समझा जाना और इन योजनाओं के कार्यान्वयन में सहयोग देने के बजाय इनसे दूर रहने अथवा कतरने की प्रवृत्ति का पाया जाना।








9. योजना निर्माण एवं कार्यान्वयन में अपेक्षित जन सहभागिता की कमी एवं सबसे नीचे के स्तर पर योजना को लागू करने वाले कर्मचारियों को योजना निर्माण की प्रक्रिया में सम्मिलित न किये जाने के परिणामस्वरूप विशिष्ट समस्याओं एवं लोगोंकी अनुभूत आवश्यकताओं का योजनाओं में समुचित समावेश न हो पाना। 


10. योजना निर्माण की प्रक्रिया को नीचे से प्रारम्भ करते हुए ऊपर तक न ले जाकर इसके विपरीत ऊपर से प्रारम्भ कर नीचे कर लाया जाना।


11. योजना निर्माण की प्रक्रिया में जन-प्रतिनिधियों एवं सरकारी तन्त्र की मनोवृत्तियों तथा मूल्यों में पायी जाने वाली विभिन्नताओं के कारण खींचतान होना। 


12. योजनाओं में ऐसी शब्दमली का प्रयोग किया जाना जो योजना से लाभान्वित होने वाले व्यक्तियों की समझ से पूरी तरह से परे हो। 


13. योजनाओं का निर्माण करते समय ऐसे लक्ष्योंको निर्धारित कर दिया जाना जिनकी प्राप्ति वर्तमान संसाध की पृष्ठभूमि में असम्भव होती है।


14. लक्ष्यों की उपलब्धि को आवश्यक शर्त बना दिये जाने तथा इनकी पूर्ति न कर पाने पर ऐसे योग्य एवं निष्ठावान कर्मचारियों के मनोबल का गिरना जो भरसक प्रयास करने के बावजूद कुछ ऐसे अपरिहार्य कारणों से जो उनके नियन्त्रण से परे हैं, इन लक्ष्यों की पूर्ति नहीं कर पाते।











15. योजना के अन्तर्गत सार्वजनिक क्षेत्र से सम्बन्धित अनेक क्रियाओं के सम्पादन का उत्तरदायित्व निजी क्षेत्रों को दिया जाना। 


16. देश के वर्तमान सरकारी तन्त्र से सम्बन्धित अधिकारियों में अपने को विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से अधिक अधिक योग्य समझने की दुष्प्रवृत्ति का पाया जाना।


17. योजना के निर्माण एवं कार्यान्वयन दोनों ही स्तरों पर लगी हुई कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी फौज द्वारा अपने निर्धारित कर्तव्यों का समुचित निर्वाह न किया जाना और उनके द्वारा अपने पदों का अपने व्यक्तिगत हितों एवं स्वार्थों की पूर्ति हेतु दुरूपयोग करते हुए भ्रष्टाचार किया जाना।


18. समय से वित्तीय संसाधनों का उपलब्धन हो पाना और एक सीमित अवधि के दौरान ही निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास किया जाना और इसके परिणामस्वरूप योजनाओं के कार्यान्सन की गुणवत्ता में कमी आना। 


19. सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों के बीच तथा सरकारी विभागों एवं गैर सरकारी संगठनों के बीच समन्वय की कमी और इसके परिणामस्वरूप कार्य की पुनरावृत्ति तथा समय प्रयास एवं धन की बर्बादी।


20. वर्तमान सरकारी तंत्र में स्थानान्तरण, विशेष रूप से उच्च अधिकारियों के कारण योजनाओं के निर्माण एवं कार्यान्वयन में उत्पन्न होने वाले अवरोध।