इतिहास का पुरातत्वशास्त्र, प्रतिमाशास्त्र से संबंध - Relation of history to archaeology, iconography

इतिहास का पुरातत्वशास्त्र, प्रतिमाशास्त्र से संबंध

इतिहास का पुरातत्वशास्त्र, प्रतिमाशास्त्र से संबंध - Relation of history to archaeology, iconography


इतिहास से संबंधित विषयों का वर्गीकरण इतिहास के विद्वान दो भागों में करते हैं। प्रथम भाग में राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र एवं मनोविज्ञान आदि विषय शामिल होते हैं, जबकि द्वितीय भाग में भूगोल मानवशास्त्र, पुरातत्वशास्त्र, अमिभलेखशास्त्र प्रतिमाशास्त्र एवं मुद्राशास्त्र आदि विषय शामिल होते हैं।





सर्वविदित है कि इतिहास का विषय क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। ब्यूरी ने कहा था कि इतिहास में न केवल राजनीति, अपितु धर्म, कला, शासन, कानून व परंपराओं के साथ ही व्यक्ति और समाज की बौद्धिक मौलिक और भावात्मक क्रियाओं का अध्ययन होता है। इसलिए इसका संबंध अन्य विषयों जैसे पुरातत्वशास्त्र, अभिलेखशास्त्र प्रतिभाशास्त्र एवं मुद्राशास्त्र से होना स्वयं सिद्ध है। 


पुरातत्वशास्त्र


जिलर महोदय ने इतिहास को एक केंद्रीय विषय माना है, जबकि ट्रैवेलियन महोदय ने इतिहास को सभी विषयों का निवास गृह कहा है। जहाँ पुरातात्विक स्रोत इतिहास लेखन के सबसे प्रामाणिक साय है, वहीं पुरातत्व इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कसौटी है। पुरातत्व तथा इतिहास दोनों कामूल उद्देश्य मानव के विकास का अध्ययन करना है इसीलिए दोनों अत्यंत सनिकट हैं। दोनों की पद्धति भी समान है तथा कालानुक्रम (Chronology) उनकी आधारशिला है। पुरातत्व इतिहास का पूरक भी है। जहाँ इतिहास की गति अवरुद्ध हो जाती है वहाँ पुरातत्व ही प्रागैतिहास के माध्यम से इतिहास को आगे बढ़ा के संपूर्ण स्रोत प्रमाणों पर आधारित है। पुरालेखशास्त्र पुरालेख अभिलेख एवं ताम्रपत्र इतिहास निर्माण के लिए अत्यंत उपयुक्त एवं विश्वसनीय साधन माने जाते हैं। प्राचीनकाल में महत्वपूर्ण घटनाएँ अभिलेखों पर उत्कीर्ण की जाती थीं। ये लेख संक्षेप में होने के बावजूद उन पर दर्ज सूचनाएं स्पष्ट रूप से एवं निःसंदिग्ध तरीके से तथा बिना किसी काट-पीट के होती है। उन पर पटना के साथ काल भी दर्ज होता था। अतः यह प्रमाण समकालीन होने से अत्यंत विश्वसनीय माना जाता है। सामान्य रूप से अभिलेखों के दो प्रकार थे 


(1) राजकीय या आधिकारिक और 


(2) लौकिक या व्यक्ति प्राचीन भारतीय अभिलेखों का वर्गीकरण इन शीर्षकों के अंतर्गत हो सकता है। कालांतर में लिखित धर्मशास्त्र ग्रंथ भी इस वर्गीकरण को पुष्ट करते है।


प्रतिमाशास्त्र


प्राचीन साहित्य की कई रचनाओं के रचयिता ऋषि कहे गए है। उसमें प्रतिमा लक्षण की चर्चा है। अतएव ऋषियों को मूर्तिशास्त्र का जन्मदाता कह सकते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कला एवं धर्म का शोधपरक अध्ययन के लिए प्रतिमाशास्त्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए प्रतिमाशास्त्र को इतिहास का सहायक विषय कहा जाता है।






सुप्रसिद्ध विद्वान श्री गोपीनाथ राव ने आगम साहित्य का सविस्तृत विवरण उपस्थित किया है। पुराणों के सदृश इस ग्रंथसमूह में वास्तु एवं तक्षण कला का वर्णन है। इनमें विशेषतया शैवमत की प्रशंसा तथा शिव प्रतिभाओं का वर्णन भरा पड़ा है। भारत के विभिन्न भागों से हजारों की संख्या में हिंदू जैन एवं बौद्ध प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं जिनके अध्ययन से भारतीय इतिहास, धर्म एवं संस्कृति को जानने में विद्वानों को सफलता प्राप्त हुई है। अतः इतिहास और प्रतिभाशास्त्र का निकटतम संबंध है। मुद्राशाख पूर्वकालीन घटनाओं पर प्रकाश डालने के लिए मुद्राशास्त्र का उपयोग होता है। प्राचीन एवं मध्यकाल में राज्यारोहण, युद्ध विजय जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों पर नई मुद्राएँ ढाली जाती थी। उन पर कभी कुछ शब्द अथवा प्रतिमा उत्कीर्ण होती थी। इससे उस काल की लिपि तथा धार्मिक संकल्पनाओं की जानकारी मिलती है। इसी तरह मुद्रा के लिए प्रयुक्त धातु से तत्कालीन आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। संपन्नता के काल में सोने-चांदी के सिक्के ले जाते थे जबकि कम मूल्य की। मुद्राएँ ता ने की हुआ करती थीं।


भारतवर्ष में विभिन्न वंश के शासकों ने राजकीय सिक्के तैयार कराए जो अत्यधिक संख्या में उत्खननों में प्राप्त हुए हैं। शासकों ने अपनी विचारधारा के अनुकूल सिक्कों पर चित्र आदि अंकित करवाए तथा धर्म-विश्वास के अनुसार देवी या देवता को उस पर स्थान दिया। सिक्का तथा मुहरों पर अंकित पशु, पक्षी अथवा देवता की आकृति से उस शासक की धार्मिक भावनाएँ जात हो जाती है।