इतिहास लेखन में भूगोल की भूमिका - Role of Geography in Historiography
इतिहास लेखन में भूगोल की भूमिका - Role of Geography in Historiography
राहुल सांकृत्यायन इतिहास लेखन में भौगोलिक अध्ययन को महत्वपूर्ण मानते थे। उनके अनुसार, “ऐतिहासिक अनौचित्य से बचने के लिए जिस तरह तत्कालीन ऐतिहासिक सामग्री और इतिहास का अच्छी तरह अध्ययन आवश्यक है, वैसे ही भौगोलिक अध्ययन की भी आवश्यकता है।" इतिहास लेखन के समय भौगोलिक मानचित्रों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए उन्होंने यह भी लिखा था कि "जिस तरह ऐतिहासिक मानदंड स्थापित करने के लिए तत्कालीन राजाओं के राज्य और शासनकाल की पहले से ही तालिका बनाकर उसमें वर्णनीय घटनाओं के अध्याय क्रम को टांक लेना जरूरी है, उसी तरह भौगोलिक स्थानों, उनकी दिशाओं और दूरियों का ठीक-ठीक अंदाज रखने के लिए तत्संबंधी नक्शे का खाका हर वक्त हमारे सामने रखना चाहिए। नक्शा तो बल्कि हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाना चाहिए।"
इतिहास लेखन में भौगोलिक मानचित्रों एवं रेखाचित्रों का प्रयोग वर्तमान समय की प्रमुख माँग है। आज का इतिहास का विद्यार्थी एवं पाठक वही इतिहास पढ़ना पसंद करता है, जो भौगोलिक मानचित्रों एवं रेखाचित्रों से परिपूर्ण हो। वस्तुतः इतिहास की कुछ घटनाएँ यदि भूगोल की मदद से समझाई जाए तो पाठकों के लिए वे आसानी से बोधगम्य हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, सिकंदर का भारत पर आक्रमण का मार्ग, फाहियान एवं हुआन सांग की भारत यात्रा का मार्ग प्राचीन भारत के व्यापारिक मार्ग, समुद्रगुप्त का दिग्विजय अभियान, नेपोलियन बोनापार्ट का विजय अभियान, भौगोलिक खोजें, अशोक के अभिलेख प्राप्ति स्थल हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल, अशोक, समुद्रगुम अलाउद्दीन खिलजी, अकबर, औरंगजेब एवं डलहौजी के समय भारतीय साम्राज्य की सीमाएँ, 1815 ई. की वियना कांग्रेस की व्यवस्था, बर्लिन सम्मेलन में परिवर्तित मानचित्र व्यवस्था, पेरिस शांति सम्मेलन द्वारा निर्धारित सीमाएँ, प्रथम एवं द्वितीय अफीम युद्ध में चीन में अंग्रेजों द्वारा प्राप्त बंदरगाह आदि को यदि मानचित्र व रेखाचित्र द्वारा भी समझाया दिया जाए तो उक्त सभी घटनाक्रम को पाठक आसानी के साथ समझ सकेगा। भौगोलिक मानचित्रों एवं रेखाचित्रों द्वारा ऐतिहासिक घटनाक्रम को हवा की स्थिति से वास्तविक धरातल पर लाया जा सकता है। यहाँ यह अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए कि मानचित्रों एवं रेखाचित्रों का उपयोग प्रकरण को लिखते समय उपयुक्त स्थल पर किया जाना चाहिए। जिस स्थान पर हम यह जिक्र कर रहे हैं कि 1842 ई. की नानकिन संधि द्वारा अंग्रेजों ने चीन में केटन फूचो, निगपो शंघाई आदि पाँच बंदरगाहों में व्यापार हेतु सुविधाएँ प्राप्त करें तो इसी स्थान पर पाँच बंदरगाहों का मानचित्र लगाया जाना चाहिए।
ऐतिहासिक घटनाओं पर भौगोलिक कारकों का प्रभाव
विश्व की विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं पर भौगोलिक कारकों का प्रभाव स्पष्टतः देखा जा सकता है। किसी न किसी रूप में भौगोलिक कारक इतिहास पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। भूगोल एक स्वयं सिद्ध विज्ञान है, जिसके उपयोग से विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं के कारण प्रभाव और कार्यों को बोधगम्य तरीके से समझा व समझाया जा सकता है। इतिहास में वर्णित विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं अन्य प्रकार की घटनाएँ किसी-न-किसी रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः भौगोलिक कारणों से प्रभावित होती है। अन्य कारणों के साथ-साथ भौगोलिक कारक किस प्रकार इतिहास की दिशा बदलते हैं, इसका भारतीय संदर्भ में एक अच्छा उदाहरण शेरशाह सूरी द्वारा हुमायूँ की चौसा एवं बिलग्राम के युद्ध में हुई पराजय के रूप में मिलता है। इन दोनों ही युद्धों में भौगोलिक कारकों का लाभ उठाकर शेरशाह सूरी ने न केवल हुमायूँ को परास्त किया, अपितु भारत में मुगल साम्राज्य को कुछ समय के लिए समाप्त कर अफगान साम्राज्य की स्थापना की। हुमायूँ चौसा के युद्ध समय तीन माह अप्रैल से 26 जून 1939 ई. के तक) शेरशाह के सामने सेना सहित डटा रहा, लेकिन आक्रमण नहीं किया। उधर चतुर शेरशाह बरसात के मौसम आने का इंतजार कर रहा था, क्योंकि मुगल शिविर कर्मनाशा और गंगा नदी के बीच निचले स्थान पर था। हुमायूँ अदूरदर्शी था, अतः वह यह तथ्य न समझ पाया। जैसे ही वर्षा आरंभ हुई, मुगल शिविर में पानी भरने के कारण अव्यवस्था फैल गई, शेरशाह ने 26 जून, 1539 ई. को आक्रमण कर हुमायूँ को परास्त कर दिया। इससे भी हुमायूँ ने कोई सबक नहीं सीखा और एक बार पुनः 17 मई, 1540 ई. को बिलग्राम के युद्ध में यही भौगोलिक कारक उसकी हार का कारण बने। मुगल शिविर बिलग्राम के निकट गंगा से तीन मील की दूरी पर लगा था। 15 मई, 1540 ई. को भारी वर्षा के कारण मुगल कैंप में पानी भर गया। इससे पहले कि मुगल ऊँचे स्थल पर शिविर लगाने की सोचते, शेरशाह ने उक्त भौगोलिक कारकों को अपने पक्ष में भुनाते हुए एक तीव्र आक्रमण कर न केवल हुमायूँ को परास्त किया, अपितु भारत में अफगान साम्राज्य की स्थापना की। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि साम्राज्यों के उत्थान एवं पतन में भी किसी हद तक भौगोलिक कारक अपनी भूमिका निभाते हैं।
भारत में बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना पानीपत के प्रथम युद्ध 21 अप्रैल, 1526 ई. म इब्राहीम लोदी को परास्त कर की गई थी। इस युद्ध में बाबर की विजय का एक कारण युद्धस्थल पर तुम्लमा का प्रयोग एवं सेना के अग्रभाग की रक्षा के लिए जंजीर से बंधी हुई गाड़ियों की कतार से संपन्न सैन्य जमावट थी। इस कुशल सैन्य सजावट पर प्रकाश डालते हुए डॉ. आशीर्वाांदी लाल श्रीवा लिखा है कि बाबर ने सात सौ गतिशील गाड़ियों की पंक्तियों को गीला खाल के रस्सों से आपस में बाँध कर अपनी सेना की रक्षार्थ फौज के आगे खड़ा कर दिया था। गाड़ियों के बीच उसने काफी रास्ता छोड़ रखा था, जिससे होकर उसके सैनिक आक्रमण कर सकें। उसने तोपों के प्रत्येक जोड़े के मध्य छह सात गतिशील बचाव स्थान खड़े कर रखे थे, जिससे तोपचियों को शरण प्राप्त हो सके। इस रक्षात्मक श्रेणी के पीछे ही तोपखाना व्यवस्थित था। उस्ताद अली प्रमुख तोपची दाहिनी ओर था और मुस्तफा प्रमुख तोपची बांयी ओर तोपखाने के पीछे उसके अग्रगामी रक्षकों का जमाव था, जिसकी कमान खुसरू कोकुल्ताश और मुहम्मद अली जम के हाथों में थी। इसके पीछे सेना का केंद्र स्थल (गुल था जहाँ बाबर स्वयं संचालक के रूप में उपस्थित था। यह केंद्र दाहिना केंद्र और बाँया केंद्र के नाम से दो खंडों में विभाजित था। बाबर की सेना का दाहिना आ कटे हुए पेड़ों तथा मिट्टी की दीवार और खाइयों से सुरक्षित किया गया था। सेना के दाहिने अंग की कुछ दूरी पर तुगलमा नियुक्त किया गया था और सेना के बाएँ अंग की बाईं तरफ कुछ दूर दूसरे तुम्तमा को स्थान दिया गया था। इस पंक्ति की दाहिनी ओर ठीक सिरे पर किलेबंदी करने वाला दाहिना दल (दाहिना तुम्लमा) अवस्थित था।"
बाबर की सेना की उक्त जमावट से स्पष्ट है कि उसने युद्ध क्षेत्र में एक कुशल वैज्ञानिक प्रणाली का समन्वय किया था। मगर मात्र लिखकर हम इस सैन्य जमावट को अच्छी तरह से अपने पाठकों को नहीं समझा सकते। इसे यदि भौगोलिक रेखाचित्र द्वारा समझाया जाए तो पाठक आसानी से इसे समझ सकते हैं।
ठीक इसी प्रकार अहमदशाह अब्दाली एवं सदाशिव राव भाऊ के बीच 1761 ई. में संपन्न पानीपत के तृतीय युद्ध की सैन्य जमावट को रेखाचित्र द्वारा आसानी से समझा जा सकता है।
युद्ध स्थिति को प्रदर्शित करने वाले रेखाचित्रों के द्वारा युद्ध स्थल की भौगोलिक जमावट को आसानी से समझाया जा सकता है। इनका सूक्ष्म अवलोकन कर पाठक स्वविवेक से भी समझ सकता है कि विजयी पक्ष क्यों जीता एवं पराजित पक्ष की हार क्यों हुई।
इस प्रकार हम देखते हैं कि इतिहास लेखन, इतिहास शिक्षण एवं इतिहास अध्ययन तीनों में ही भौगोलिक मानचित्रों का प्रयोग इतिहास को एक ठोस धरातल प्रदान करता है इतिहास में मानव के कार्य व्यवहार का अध्ययन किया जाता है एवं मानवीय कार्य व्यापार भौगोलिक कारकों द्वारा प्रभावित रहता है, अतः इतिहास में भौगोलिक परिस्थितियों के सापेक्ष में ही घटनाओं को समझा जाना चाहिए। जॉनसन महोदय ने तो काल एवं भूगोल को इतिहास का नेत्र बताकर इतिहास तथा भूगोल के संबंधों के महत्व को रेखांकित किया है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इतिहास एवं भूगोल एक दूसरे के पूरक हैं। वे के अन्योन्याश्रित रूप से एक दूसरे से धनिष्ठ रूप से संबद्ध हैं। अत: इतिहास तथा भूगोल एक दूसरे को परस्पर प्रभावित करते हैं। अंततः भूगोल के अनुप्रयोग द्वारा इतिहास लेखन, शिक्षण एवं अध्ययन को वैज्ञानिकता के साथ-साथ सहज, सरल एवं सुबोध बनाया जा सकता है।
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