समाज कार्य अभ्यास में मनोविज्ञान का महत्व एवं मनोरचनाएँ - Significance and Concepts of Psychology in Social Work Practice
समाज कार्य अभ्यास में मनोविज्ञान का महत्व एवं मनोरचनाएँ - Significance and Concepts of Psychology in Social Work Practice
समाज कार्य के अभ्यास में मनोविज्ञान का क्या महत्व है के बारे में विस्तृत रूप से तथ्य प्रदान किये गये है। वास्तव में समाज कार्य एक सहयोगात्मक सेवा है जिसमें सेवार्थी की समस्याओं को विभिन्न प्रविधियों के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जाता है। समाज कार्य अभ्यास में मनोविज्ञान की सहायता महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज कार्य व्यक्तियों, समूहों, समुदाय इत्यादि के बारे में अध्ययन करता है तथा सहायता प्रदान करता है। चूंकि मनोविज्ञान समाज के व्यक्तियों, समूहों तथा समाज के बारे में अध्ययन करता है। अतः समाज मनोविज्ञान की सहायता से सामाजिक कार्य कर्ता विभिन्न प्रकार की समस्याओं को हल करने में निपुण हो सकते हैं।
समाज कार्य अभ्यास में मनोविज्ञान का महत्व
• मनोविज्ञान द्वारा सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करने में समाज कार्य कर्ता को सहायता प्राप्त होती है।
• समाज कार्य कर्ता को जटिल विश्लेषण में सहायता प्राप्त होती है ।
•वैयक्तिक अध्ययन में सहायता प्राप्त होती है ।
• सामान्य व्यवहार का अध्ययन करने में सहायता प्राप्त होती है ।
असमान्य व्यवहार का अध्ययन करने में सहायता प्राप्त होती है ।
• बालकों के मनोविज्ञान के अध्ययन में सहायता प्राप्त होती है ।
• किशोर मनोविज्ञान के अध्ययन में सहायता प्राप्त होती है। • व्यवहारिक पक्ष का अध्ययन करने में सहायता प्राप्त होती है ।
शरीर रचना एवं शरीर क्रिया प्रणाली का अध्ययन करने में सहायता प्राप्त होती ।
• लोक व्यवहार का अध्ययन करने में सहायता प्राप्त होती है । इस प्रकार हम कह सकते है कि मनोविज्ञान का महत्व समाज कार्य अभ्यास में अति महत्वपूर्ण है जिससे समाज कार्य अभ्यास व्यक्तियों, समूहों, समुदायों की समस्याओं को दूर करने में सहायता प्रदान करता है।
मनोरचनायें
मनोरचनायें मुख्य रूप से अंतर्दवंद उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों से व्यक्ति को समायोजित करने में सहायता प्रदान करती हैं, इससे व्यक्ति में अहम् में की उपयुक्तता बनी रहती है। व्यक्ति उपयुक्तता एवं योग्यता की भावना को बनाये रखता है किन्तु वास्तव में वह प्रतिबल का सामना वास्तविकता के स्तर पर नही करता है। अर्थात् मनोरचनाओं में व्यक्ति वास्तविकता को नकारता है।
• पेज के अनुसार, 'मोरचनायें व्यक्ति के अन्तद्र्वन्द, निराशाओं तथा हीनता की भावनाओं से बचने का एक अच्छा साधन हैं। इसमें सुरक्षात्मक पहल भी है तथा पलायन भी। लगभग हर सामान्य कहे जाने वाले व्यक्ति के द्वारा मानसिक रूप से मनोरचना का प्रयोग किया जाता है। "
मनोरचनायें असफलता से राहत पहुंचाती है, आन्तरिक सन्तुलन बनाये रखती है तथा किसी प्रकार की असमान्य स्थिति में व्यक्ति को सन्तुलन बनाये। रखने में मदद करती है। किन्तु जब इन सुरक्षात्मक उपायों का आवश्यकता से अधिक उपयोग किया जाता है एवं ये व्यक्ति के व्यक्तित्व का अभिन्न अंगू बन जाते है तो असमान्यता के चिन्ह बनकर प्रकट होने लगते है। व्यक्ति हर असफलता को नकारने लगता है, पलायनवादी हो जाता है। अपने उत्तरदायित्वों से बचने का प्रयास करने लगता है। इस प्रकार सुरक्षात्मक उपाय जब स्वयं में उद्देश्य बन जाते है तब व्यक्ति वास्तविकता के साथ भ्रमित हो जाता है, तब यह असमान्य लक्षण बन जाते है। व्यक्ति के व्यवहार में सन्तुलन के लिए यह आवश्यक है कि इदम् अहम् व पराहम् में सन्तुलन बना रहे। अहम् की भूमिका इतनी मजबूत होनी चाहिए कि इंदम् की नैसर्गिक असमाजिक एवं पाशविक इच्छाओं एवं पराहम की नैतिक मान्यताओं के मध्य सन्तुलन बनाये रखे तभी व्यक्ति सन्तुलित एवं समायोजित होगा। जब इदम्, अहम् व पराहम के बीच संघर्ष की स्थिति आ जाती है, व्यक्ति पर दबाव बढ़ जाते है, आन्तरिक संघर्ष उत्पन्न हो जाते है तभी वह इन सुरक्षात्मक उपायों का अपने जीवन में चेतन अथवा अचेतन स्तर पर प्रयोग करके अपने व्यक्तित्व को विघटित होने से बचा लेता है।
प्रमुख मनोरचनायें
• दमन जब व्यक्ति अन्तद्र्वन्द की स्थिति में होता है तो वह अंश जो ईगो - व सुपरईगो को सहनीय नहीं होता है, उसे वह अचेतन में धकेल देता है, यही प्रक्रिया दमन है। इसीलिए इसे चयनात्मक विस्मरण भी कहा जाता है। किन्तु कुछ मनोवैज्ञानिक इसे विस्मरण नही स्मरण की घटना मानते है। यद्यपि दमन के माध्यमों से चेतन संघर्ष का समाधान होता है किन्तु समाधानात्मक क्रिया अचेतन होती है।
• शमन 'शमन' के अन्तर्गत व्यक्ति अपनी इच्छा से जानबूझ कर किसी अप्रिय घटना या विचार को चेतन से हटा देता है जबकि दमन की प्रक्रिया में दुःखद एवं असामाजिक इच्छाओं का दमन कर दिया जाता है।
• प्रतिगमन प्रतिगमन का तात्पर्य पीछे की ओर लौटने से है इसके अन्तर्गत प्रारम्भिक अवस्था (बाल्यावस्था) की ओर व्यक्तित्व का प्रतिगमन पाया जाता है।
•रूपान्तरण इस मनोरचना के अन्तर्गत अवदमित अन्तद्र्वन्द्व की अभिव्यक्ति विभिन्न शारीरिक लक्षणों के रूप में होती है। विभिन्न शारीरिक रोगी के लक्षण गत्यात्मक शारीरिक या ज्ञानेन्द्रिय जन्य आदि किसी प्रकार के हो सकते है। इसके अन्तर्गत दमित ऊर्जा शारीरिक रोगों के क्रियात्मक लक्षणों में परिवर्तित होती है।
•उदातीकरण- मनोविश्लेषणवादियों के अनुसार व्यक्ति की कामजनित विफलता प्रायः क्रियात्मक, कलात्मक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक कार्यों में परिणित हो जाती है। बहुत-सी इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ ऐसी होती है जिनकी अभिव्यक्ति हम सामाजिक बन्धन तथा मार्यादाओं के कारण नहीं कर पाते हैं। उदासीकरण अथवा उन्नयन द्वारा इन अमान्य इच्छाओं की पूर्ति समाज से मान्यता प्राप्त रचनात्मक क्रियाओं द्वारा की जाती है।
• युक्तिकरण इस मनोरचना के अन्तर्गत व्यक्ति अपने प्रत्येक कार्यों को उचित ठहरा के लिए अवास्तविक तर्क तथा कारण प्रस्तुत करने लगता है। अपने हर अच्छे-बुरे कार्यों के लिए उसके समक्ष एक तर्क उपस्थित रहेता है।
प्रतिक्रिया निर्माण कुछ व्यक्ति अपनी इच्छाओं और भावनाओं के अनुरूप ही व्यवहार करते है जब कि कुछ व्यक्तियों के मन में कुछ होता है और व्यवहार में कुछ और व्यक्ति अपनी अन्तर्निहित इच्छा के विपरीत व्यवहार करता है। ब्राउन ने इसे क्षतिपूर्ति कहा है। जिन व्यक्तियों में स्वयं ही अपनी अपराध भावना पर नियन्त्रण पाना सम्भव नही होता है वह नियम धर्म में कुछ ज्यादा ही कठोर दिखायी पड़ते है।
• अवरोधन अवरोधन में अमान्य सामाजिक कार्यों को नहीं किया जाता है किन्तु यह क्रिया चेतन स्तर पर होती है। अवरोधन वह सुरक्षात्मक उपाय है जिसमें एक भावना या इच्छा दूसरी भावना या इच्छा के उपस्थित होने के कारण विस्मृत हो जाती है। इस प्रकार अवरोधन के द्वारा दुःखद, अप्रिय व अनैतिक इच्छाओं को भुलाया जा सकता है। इस रक्षात्मक उपाय द्वारा अन्तद्र्वन्द को काफी हद तक हटाया जा सकता है।
गौण मनोरचनायें
• आत्मीकरण सरल शब्दों में, आत्मीकरण का अर्थ है कि इसमें एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति जैसा बनना चाहता है। आत्मीकरण में व्यक्ति दूसरों के गुणों को स्वयं में रख लेता
प्रक्षेपण - फ्रायड के अनुसार, प्रक्षेपण के माध्यम से व्यक्ति अपराध भावना से छुटकारा प्राप्त करता है।
• अन्तःक्षेपण अन्तः क्षेपण प्रक्षेपण की प्रतिकूल मनोरचना है। इसमें आरोपण करने के स्थान पर व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व-गुणों को अपने व्यक्तित्व का एक आवश्यक गुण समझने लगता है। प्रक्षेपण में एक व्यक्ति अन्य व्यक्ति के अनुरूप होना चाहता है। लेकिन अन्तःक्षेपण में दूसरे व्यक्ति को अपना ही एक अंग मानता है।
• स्थानान्तरण अपने मानसिक संघर्ष से बचने के लिए प्रायः हम स्थानान्तरण का उपयोग - करते है। ब्राउन के अनुसार, 'स्थानान्तरण वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रेम की भावना का एक व्यक्ति विशेष या वस्तु-विशेष से हटकर दूसरे व्यक्ति या वस्तुपर जाता है।
विस्थापन विस्थापन में व्यक्ति की किसी प्रेरणा या संवेग को मौलिक रूप में हटाकर किसी - ऐसे लक्ष्य की ओर प्रेरित कर दिया जाता है जिससे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। सामान्यतया विस्थापन सभी लोगों के जीवन में किसी न किसी रूप में अवश्य दिखाई पड़ता है। इससे सामान्यतया कोई विशेष हानि नहीं होती। अगर बहुत अधिक सीमा तक विस्थापन हो जाएं तो मानसिक रोग की सम्भावना हो जाती है।
• क्षतिपूर्ति क्षतिपूर्ति के माध्यम से व्यक्ति अपनी हीनता व अनुपयुक्तता की भावना से रक्षा करता है। यह एक प्रकार की समायोजनात्मक प्रवृत्ति है जिसके माध्यम से व्यक्ति उन इच्छाओं व भावनाओं को, जिनसे कि उनमें विफलर्ता, आकुशलता या हीनता उत्पन्न होती है, उन्हें अन्य सन्तोषजनक स्थिति के साथ चेतन या अचेतन रूप से पूर्ति करता है।
अतिपूर्ति अतिपूर्ति क्षतिपूर्ति का ही एक रूप है। इसमें व्यक्ति हीन भावों से मुक्त होने के - लिए किसी गुण यी वस्तु की अत्यधिक मात्रा में प्राप्त करके क्षतिपूर्ति करता है।
● प्रत्याहार जब व्यक्ति को अपने पूर्व अनुभव के आधार पर किसी स्थिति से असफलता या - आलोचना का भय रहता है तो वह इस मनोरचना का सहारा लेता है। इस प्रवृत्ति के कारण व्यक्ति लज्जालु, एकाकी एवं भीरु स्वभाव का हो जाता है। बर्नहम ने इस अवस्था को मिथ्या हीन बुद्धि कहा है।
● कल्पना तरंग प्रायः सभी व्यक्ति जीवन की अनेक कमियों की पूर्ति कल्पना के माध्यम से करते हैं। कल्पना के माध्यम से व्यक्ति अपने संघर्षो एवं विफलताओं को कम करते हैं। व्यक्ति कल्पना-तरंग के माध्यम से अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करता है। व्यक्ति इस प्रकार की क्रिया में वास्तविक जगत को छोड़कर कल्पना-जगत् में ही आनन्द विभोर होता है, जैसे एक दुर्बल व्यक्ति अपने को पहलवान की कल्पना करके प्रसन्न होता है।
• वास्तविकता से पलायन इससे व्यक्ति अपने चारों ओर के वातावरण की ओर कोई ध्यान ही नहीं देते हैं। वे अपनी आलोचना नही सुनते हैं तथा कान बन्द किये रहते है। उन्हें वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता।
• नकारात्मकता • इस प्रकार की मनोरचना के माध्यम से व्यक्ति किसी विशेष वस्तु, क्रिया या व्यक्ति के प्रति नकारात्मक बन जाता है।
निष्कर्ष
मनोविज्ञान का समाज कार्य अभ्यास में महत्व पर प्रकाश डाला गया तथा इसी अध्याय में विभिन्न बिन्दुओं के माध्यम से बताया गया है कि मनोविज्ञान समाजे कार्य अभ्यास में किस प्रकार अपनी सहायता प्रदान करता है। जब व्यक्ति अपने जीवन में विफलताओं का सामना करता है तो मानसिक रूप से उसके व्यवहार में चिन्ताक अधिकता उसके अन्तर्मन में कण्ठा और अनुपयुक्तता की भावना भर देती है। यह भी सत्य है कि व्यक्ति स्वयं को हारा हुआ नहीं समझना चाहता है, अपनी पराजय या असफलता को स्वीकार करने में उसके अहं को ठेस पहुंचती है अतः अपने अहं की रक्षा के लिए वह अर्द्धचेतन एवं अचेतन स्तर पर प्रयास करता है। अपनी अहं की रक्षा हेतु जो प्रयास व्यक्ति करता है, उसे मनोरचनाएं कहते हैं। किन्तु यदि इन अह के सुरक्षात्मक उपायों को व्यक्ति आवश्यकता से अधिक प्रयोग करने लगता है तो उसके जीवन में धीरे-धीरे कसमायोजन उत्पन्न होने लगता है, व्यक्ति में हीनता की भावना भी पनपने लगती है।
वार्तालाप में शामिल हों