भारत का सामाजिक इतिहास - Social History of India

भारत का सामाजिक इतिहास - Social History of India

भारत का  सामाजिक इतिहास - Social History of India

सामाजिक इतिहास लेखन मुख्य रूप से उन्नीसवीं सदी में प्रचलित हुआ। इतिहास यानी पूर्वकालीन मानवी जीवन को दर्ज करना यह परिभाषा स्वीकार करें तो मानवी समाज के इतिहास को इतिहास का महत्वपूर्ण प्रकार मानना स्वाभाविक ही है। इंग्लैंड के छः सदियों का सामाजिक इतिहास लिखने वाले प्रो. जी. एम. ट्रेवेलियन ने ग्रंथ की प्रस्तावना में राजनीतिक पक्ष को छोड़कर लिखा कि समाज का इतिहास सामाजिक इतिहास है (Social history might be defined as the history) of a people with politics left out.) यह सामाजिक इतिहास की परिभाषा है। यही नहीं, सामाजिक इतिहास का महत्व प्रतिपादित करते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि सामाजिक इतिहास के बिना आर्थिक इतिहास निष्फल तथा राजनीतिक इतिहास अकलनीय होता है। (Without social history. economic history is in barren and political history is unintelligible) प्रो. रेडफोड की राय में सामाजिक इतिहास अर्थात् सामाजिक दृष्टिकोण से लिखा गया इतिहास है (Social history is all history from a social point of view), जबकि नेमियर की राय है कि "सामाजिक अंगों से संलग्न सभी मानवी व्यवहारों का समावेश सामाजिक इतिहास में होना चाहिए।" (All human pursuits and diciplines in their social aspect enter into it) अर्थात् राजनीतिक घटनाओं का सामाजिक जीवन पर होने वाला परिणाम सामाजिक विषय में सम्मिलित होता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सामाजिक इतिहास का केंद्र बिंदु समाज होता है।










काम्टे के अनुसार इतिहास सामाजिक भौतिकशास्त्र है। इसके अंतर्गत मानवीय व्यवहार सामान्य नियमों का अध्ययन किया जाता है। टापन्बी ने लिखा है कि इतिहास का निर्माण सामाजिक तत्वों से हुआ है। इतिहास का विकास व्यक्तियों तथा राष्ट्रों से नहीं, बल्कि विभिन्न युगीन समाओं से हुआ है। अत: इतिहास की आधारशिला समाज है। सामाजिक इतिहास को सर्वाधिक लोकप्रिय बनाने का एक मात्र श्रेय ट्रेवेलियन को है। उनके सामाजिक इतिहास का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सामाजिक इतिहास की परिभाषा में ट्रेवेलियन का विचार अधिक ग्राह्य है। अतीत में मनुष्यों का दैनिक जीवन, विभिन्न वर्गों का पारस्परिक आर्थिक संबंध परिवार का स्वरूप, गृहस्थ जीवन श्रमिकों की दशा, मानवीय दृष्टिकोण, सांस्कृतिक जीवन तथा सामान्य परिस्थितियों से उत्पन्न धर्म, साहित्य, संगीत, वास्तुकला, शिक्षा तथा साहित्य इत्यादि सामाजिक इतिहास के विषय है। रेनियर के अनुसार सामाजिक इतिहास आर्थिक इतिहास की पृष्ठभूमि तथा राजनीतिक इतिहास की कसोटी है। ट्रेवेलियन की दृष्टि में सामाजिक इतिहास के अभाव में आर्थिक इतिहास मरुस्थल तथा राजनीतिक इतिहास अवर्णनीय है।


बीसवीं सदी के अधिकांश इतिहासकारों का ध्यान सामाजिक इतिहास ने आकृष्ट किया है। सामाजिक समस्याओं के प्रति चेतना ने इतिहास के क्षेत्र में क्रांतिकारी रुचि पैदा कर दी है। समाजशास्त्र का विकास सामाजिक इतिहास के परिवेश में हुआ है। सामाजिक विकास तथा परिवर्तन की गतियों का अध्ययन समाजशास्त्र के माध्यम से प्रारंभ हुआ है। सामाजिक इतिहास की अपनी समस्याएँ हैं। इसका अध्ययन रोचक है, परंतु इसकी निरंतरता मंदगति तथा परिवर्तन का अध्ययन अत्यंत जटिल है। राजनीतिक परिवर्तन जीवन के सतह पर दृष्टिगोचर है, सामाजिक परिवर्तन भूमिगत अगोचर जलस्रोत के समान है, सामाजिक परिवर्तन का ही परिणाम राजनीतिक परिवर्तन होता है, एक नवीन सम्राट, प्रधान मंत्री नवीन सांसद राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन करते हैं, परंतु सामाजिक जीवन में इस परिवर्तन का प्रभाव प्रायः नगण्य होता है।






भारतीय इतिहास में राजनीतिक उथल-पुथल के कारण अनेक राजवंशों का उत्थान तथा पतन हुआ है। राजपूतों के पतन के बाद तुर्की मुल्तानों मुगलो तथा अंग्रेजों का शासन हुआ, परंतु इन परिवर्तनों ने सामाजिक जीवन को प्रायः प्रभावित नहीं किया। परिणामस्वरूप वैज्ञानिक उन्नति को छोड़ कर भारतीय समाज का मूलस्वरूप आज भी वही है जैसा गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी के समय में था। भक्ति आंदोलन के समाज सुधारक रामानंद, कबीर, नानक तथा चैतन्य ने समाज सुधार के लिए अक प्रयास किए राजा राममोहन राय, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू ने भी समाज-सुधार का प्रयास किया। संसद तथा विधान सभाओं ने अनेक नियम पारित किए। इतने प्रयासों के बावजूद भी सामाजिक स्वरूपों में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ। यदि सामाजिक परिवर्तन को स्वीकार भी किया जाए तो भूमिगत जल स्रोत की भांति इसकी गति इतनी मंद और अगोचर रही है कि उसका सूक्ष्म निरूपण कठिन प्रतीत होता है।