भारत में सामाजिक नियोजन - Social Planning in India

भारत में सामाजिक नियोजन - Social Planning in India

 भारत में सामाजिक नियोजन - Social Planning in India


भारत में सामाजिक नियोजन की आधार शिला रखने का श्रेय भारत के महान अर्थशास्त्री एम. विश्वेश्वरया को जाता है। सन् 1934 में उन्होंने सबसे पहले अपनी पुस्तक Planned Economy को प्रकाशित करते हुए नियोजन की सामाजिक-आर्थिक विकास की आधारशिला रखी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में भारत की परिस्थितियों के अनुरूप नियोजन के मुद्दे पर विचार विमर्श किया। 1938 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बनें, तब उन्होंने नियोजन के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय नियोजन समिति (National Planning Committee) बनायी। अंग्रेजी सरकार द्वारा 1944 में नियोजन तथा विकास विभाग खोला गया। 1945 में औद्योगिक नीति की घोषणा की गई। 1946 में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग मंत्रालय ने सलाहकार नियोजन बोर्ड का गठन किया तथा नियोजन एवं विकास विभाग को समाप्त कर दिया। 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तथा संविधान के जनवरी 1950 ई. में लागू होने के बाद एक संप्रभुत्व संपन्न प्रजातांत्रिक गणतंत्र बना।







मार्च 1950 में भारत सरकार द्वारा स्थापित योजना आयोग देश में सामाजिक नियोजन का कार्यक्रम तैयार करता रहा किंतु 15 अगस्त 2014 को भारत के प्रधानमंत्री श्रीनरेन्द्र मोदी द्वारा योजना आयोग के जगह पर दूस संस्था को लाने की बात की गई जिससे योजना आयोग के कमियों को दूर किया जा सके। 1 जनवरी 2015 को भारत में नीति आयोग की स्थापना की गई। नीति आयोग ने योजना आयोग का स्थान लिया है। 


आर्थिक तथा सामाजिक नियोजन को भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में केन्द्री सूची के अंतर्गत रखा गया है और राज्य नीति के निदेशक सिद्धान्तों के अधीन भारतीय समाज के विकास की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गयी है। भारत में सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए 1951 में पंचवर्षीय योजनाओं का प्रारंभ किया गया। तीव्र और अनवरत आर्थिक विकास करना, आय और संपत्ति में पायी जाने वाली असमानता को दूर करना, रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना, आर्थिक शक्ति पर एकाधिकार में कमी करना और देश को हरेक दृष्टिकोण से समृद्ध तथा आत्मनिर्भर बनाना, इन पंचवर्षीय योजनाओं का मूल उद्देश्यथा पंचवर्षीय योजनाओं में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया अर्थात सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में अपनाया गया। जिनमें अधिक पूँजी निवेश की आवश्यकता थी, जैसे बुनियादी एवं भारी उद्योग के प्रोत्साहन की जिम्मेद सार्वजनिक क्षेत्र को दी गयी और लोगों की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु आवश्यव्यवस्था करने का उत्तरदायित्व, निजी क्षेत्र पर डाला गया। पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत सामाजिक एवं निजी हितों के बीच आवश्यक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया।







विभिन्न पंचवर्षीय योजनओं के माध्यम से देश के सर्वांगीण विकास हेतु प्रयत्न किये गये। 1953 में इसी उद्देश्य से केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड तथा 1985 में एक कल्याण मंत्रालय की स्थापना की गई। समाज के कमजोर और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समुदायों को अधिकार दिलाने के उद्देश्यसे एवं कल्याण कार्यक्रमों के दबावों के कारण 25 सितम्बर, 1985 को इसकी स्थापना की गयी। कल्याण मंत्रालय को 25 मई, 1998 में नया नाम दिया गया सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय।


सामाजिक नियोजन की प्रक्रिया में वृहत् रूप से पूर्व निर्धारित सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्योंको स्थानिक एवं अल्पकालीन संदर्भ में प्राप्त करने हेतु स्पष्ट रुपरेखा का रेखांकन किया जाता है। इसमें प्राथमिक आवश्यकताएँ और स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्य होते हैं। इसमें वर्तमान में प्राप्त किये जा सकने वाले संसाधनों, मानव संपदा, वस्तु, संगठनों और तकनीक की भी समीक्षा की जाती है। जिससे कम से कम लागत पर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके। सामाजिक योजनाओं का निर्माण सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक विकास के अवसरों को बढ़ाने, आय वृद्धि, प्रादेशिक भिन्नताओं हटाने गरीबी उन्मूलन आदि अन्तर्निहित उद्देश्यों के साथ शेक और जातिगत ताओं को हटाने उन्मूलन आदि अन्त किया जाता है।