सुझाव या संसूचन - अर्थ, महत्व, परिभाषा एवं स्वरूप - Suggestion - Meaning, Importance, Definition and Structure

सुझाव या संसूचन - अर्थ, महत्व, परिभाषा एवं स्वरूप - Suggestion - Meaning, Importance, Definition and Structure

 सुझाव या संसूचन - अर्थ, महत्व, परिभाषा  एवं स्वरूप - Suggestion - Meaning, Importance, Definition and Structure

सुझाव या संसूचन (Suggestion) अर्थ एवं स्वरूप

सुझाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक व्यक्ति अपना विचार या राय इस उम्मीद से दूस व्यक्ति के सामने रखता है कि दूसरा व्यक्ति उसे स्वीकार कर लें। इससे स्पष्ट है कि सुझाव में दो पक्ष होते हैं। एक सुझाव देने वाला एक दूसरा स्वीकार करने वाला सुझाव में दोनों पक्ष क्रियाशील होते हैं।

उदाहरण:- माता-पिता अपने बच्चों को समय पर खाने, पढ़ने, सोने एवं स्कूल जाने का सुझाव देते हैं। शिक्षक अपने छात्रों को गृहकार्य करके लाने भी राय देते हैं।

परिभाषाएँ :

मैकडुगलू के अनुसार:-

 "सुझाव संचार या संप्रेषण की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप एक व्यक्ति द्वारा दी गयी राय उपयुक्त तार्किक आधार के बिना ही दूसरों के द्वारा विश्वास के साथ स्वीकार की जाती है।"

किम्बल यंग के अनुसार 

सुझाव, शब्दो, चित्रों या ऐसे ही किसी अन्य माध्यम दवारा किये गये प्रतीक संचार को एक ऐसा स्वरूप है जिसका उद्देश्य उस प्रतीक को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना होता है।"

थाउलेस के अनुसार

 "सुझाव शब्द का प्रयोग अब साधारणतः उस प्रक्रिया के लिए किया जाता है। जिसमें विचार, विशेष के प्रति मनोवृत्ति विवेकपूर्ण अनुमान्य को छोड़कर अन्य माध्यम से एक व्यक्ति द्वारा दूसरे तक संचारित की जाती है।"

उपर्युक्त परिभाषा के संयुक्त विश्लेषण करने पर हमें सुझाव प्रक्रिया के सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य प्राप्त होते हैं

सुझाव के दो महत्वपूर्ण पक्ष होते हैं। एक सुझाव देने वाला दूसरा सुझाव स्वीकार करने वाला।

दोनों ही पक्ष सक्रिय एवं सचेत होते हैं।

सुझाव एक संज्ञानात्मक मानसिक प्रक्रिया है।

 




सुझाव देने वाला व्यक्ति स्वीकार करने वाले व्यक्ति की तार्किक योग्यता एवं आलोचना करने की क्षमता को कमजोर कर देता है।  संसूचन की सफलता पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। सुझाव प्रायः किसी व्यक्ति के कार्य, घटना, तथा विचार से सम्बन्धित होता संसूचन/सुझाव का एक निश्चित उद्देश्य होता है। संसूचन सुझाव एक निष्क्रिय प्रक्रिया है। क्योंकि तार्किक शक्ति का उपयोग नहीं किया जाता हैं।

सुझाव का वर्गीकरण (Classification of suggestion)

भावात्मक संसूचन (Ide motor suggestion)-इसकी उत्पत्ति मानसिक भावनाओं से होती है। व्यक्ति के मन में कोई भाव आते ही यदि क्रिया भी प्रारम्भ हो जाय तो इसे भाव चालक संसूचून कहते हैं। यथा-रेडियो द्वारा संगीत सुनकर सिर को हिलाना भावचालक संसूचन है। यह क्रिया अचेतन स्तर पर भी होती है।

आत्म संसूचन (Auto Suggestion) यदि कोई व्यक्ति आपने आप को स्वयं संसूचन देकर उसके अनुरूप कार्य करने लगता है तो उसे आत्म संसूचन कहते हैं। जैसे किसी छात्र द्वारा स्वयें यह सोचना कि अध्ययन करना आवश्यक है अन्यथा परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो

प्रतिष्ठा संसूचन (Prestige suggestion) यदि कोई बात कहते समय उसके साथ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नाम जोड़ दिया जाय तो उसका प्रभाव बढ़ जाता है जैसे गांधी जी ने कहा था गरीबों की सेवा नारायण की सेवा है। सामान की बिक्री बढ़ाने के लिए फिल्मी कलाकारों के नाम का प्रयोग करना आदि प्रतिष्ठा संसूचन के उदाहरण हैं।

समूह संसूचन (Mass_Suggestion) यदि किसी व्यक्ति को सामूहिक सुझाव दिया जाय तो वह संभवतः शीघ्रता से सुझाव को मान लेगा। ऐसी परिस्थिति में वह समझ सकता है कि जो बात इतने लोग कह रहे हैं वह अवश्य ठीक होगी। प्रतिष्ठा संसूचन की तुलना में समूह संसूचन अधिक प्रभावशाली होता है। यथा-भीड एवं आन्दोलन में व्यक्ति अपने विवेक की उपयोग न करके तत्कालीन परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करने लगता है।

 




विपरीत संसूचन (Contra Suggestion) इसमें अभीष्ट व्यवहार या कार्य कराने के लिए सीधा सुझाव न देकर विपरीत ढंग से सुझाव दिया जाता है। यदि कोई बालक दूध पी रहा हो तो यह कहिए कि तुम दूध मत पियों नहीं तो अर्पिता पी जायेगी तो वह बालक तुरन्त दूध पी जायेगा। 

प्रत्यक्ष संसूचन (Direct Suggestion) प्रत्यक्ष संसूचन देते समय अभीष्ट वस्तु के बारे में संसूचन ग्रहणकर्ता के समक्ष जो भी बात कहनी है वह साथ-साथ कही जाती है। यथा आप किसी कपड़े की दुकान पर जाइए। व्यापारी आपको नमस्कार करेगा और आपको एक से एक माडल के कपड़े दिखाना शुरू करता है और सभी कपड़ों की जमकर तारीफ भी करता है। यह प्रत्यक्ष संसूचन है।

अप्रत्यक्ष संसूचन (Indirect Suggestion) अप्रत्यक्ष संसूचन देते समय अभीष्ट लक्ष्य को तुरन्त सामने नहीं लाया जाता है बल्कि नाम लिए लंबी चौड़ी भूमिका बनायी जाती है तथा तारीफ की जाती है। यथा-बाजार में डालडा वनस्पति की कमी हो जाने पर जाइए तो दुकानदार यह कहता मिलेगा कि साहब आप बड़ी-बड़ी कम्पनियों का चक्कर छोड़िये देखिए मेरे पास एक नया माल आया है। मेरा निवेदन है कि एक बार इसे आजमाइए और गारंटी है कि दुबारा इसी की माँग करेंगे। ग्राहक उसकी बात से प्रभावित होकर नये सामान की खरीद कर लेगा।

सकारात्मक संसूचन ( Positive Suggestion ) यदि सुझाव स्वीकारात्मक भाषा में व्यक् किए जाते हैं तो उन्हें सकारात्मक संसूचन कहते हैं । यथा- किसी छात्र से यह कहना कि अधिक परिश्रम करो ताकि अच्छे अंक से उत्तीर्ण हो जाओ।


निषेधात्मक संसूचन (Negative suggestion) यदि किसी सुझाव में किसी वस्तु कापरित्याग करने या किसी कार्य को न करने का निर्देश दिया जाता है। तो उसे निषेधात्मक संसूचन कहते हैं। यथा-सिगरेट मत पिओ। इससे कैन्सर हो सकता है या सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

 

सामाजिक जीवन में सुझाव का महत्व (Role of Suggestion in social Science)

सुझाव से सामाजिक एकता होती है सामाजिक सुझाव में व्यक्ति अधिकतर व्यक्तियों के व्यवहारों के अनुकूल अपना व्यवहार करता है। इसका परिणाम यह होता है कि जब व्यक्ति अन्य लोगों के करीब आता है तो अपने आप ही एक तरह की सामाजिक एकता या समानता आती है। सामाजिक सुझाव हमें सामाजिक समूह से प्राप्त होते हैं जो व्यक्तियों के व्यवहारों को समाज की विशेष प्रथा, परम्परा, धर्म, आदर्श के अनुरूप बनाता है।

सामाजीकरण एवं संसूचन (Socialization and Suggestion) व्यक्ति के समाजीकरण में संसूचन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वास्तव में संसूचन द्वारा छोटे-छोटे बच्चों में वांछित विचारों एवं गुणों का बीजारोपण किया जा सकता है। उनके परिवार में गलत संसूचन या सुझाव प्राप्त होने के कारण बालकों का व्यक्तित्व दोषपूर्ण हो जाता है। उनमें अपराधी प्रवृत्तिया विकसित हो जाती है।

सामाजिक नियंत्रण एवं परिवर्तन (Social Control and Social Change) संसूचन, द्वारा व्यक्ति के अवांछित व्यवहार को समाप्त या नियमित किया जा सकता है और सामाजिक परिवर्तन को उचित बल प्रदान किया जा सकता है। यदि संसूचन किसी विश्वसनीय एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा दिया जाय तो सामाजिक नियंत्रण एवं परिवर्तन को और भी सरल बनाया जा सकता है। यही कारण है कि समाज सुधारक बड़े-बड़े साधुसंत नेतागण आदि अपने सुझाव द्वारा हमेशा लोगों के व्यवहारों को एक खास दिशा में नियमित करते हैं।






शैक्षिक एवं व्यावसायिक उपयोग (Educational and Vocational Use)-छोटे बच्चों को समुचित संसूचन प्रदान करके उनमें अध्ययन के प्रति रुचि पैदा की जा सकती है। यदि शैक्षिक वातावरण यथोचित है तो बच्चे उससे प्रभावित होते हैं और उनमें शैक्षिक गुणों का विकास होता है। शिक्षकों द्वारा कही गई बातों का प्रभाव छात्रों पर अधिक पड़ता है। अतः शिक्षकों को उनके लिए क्रोधपूर्ण तथा आक्रोशपूर्ण शब्द जैसे नालायक, मूर्ख, उल्लू आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इससे सम्भव है कि बच्चे अपने आप को ऐसा ही समझने लगे। 

राष्ट्रीय संकट में उपयोग (Use in National Crisis) राष्ट्रीय संकट के समय नागरिकों में घबराहट होने लगती है। संसूचन के द्वारा इनको दूर किया जा सकता है। बच्चों के मनोबल को उठाया जा सकता है।

सामाजिक प्रगति एव संसूचन (Social Progress and Suggestion) सामाजिक प्रगति को प्रतिष्ठा संसूचन द्वारा और भी अधिक गति प्रदान की जा सकती है। जैसे-नेहरू जी ने आजादी प्राप्त होने पर देश को प्रगति की ओर ले जाने में आराम हराम है का नारा देकर देशवासियों को राष्ट्र की पुर्नसंरचना एवं प्रगति के लिए प्रेरित किया। जिसके फलस्वरूप भारत ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की।

वाणिज्य एवं व्यापारिक उपयोग (Commercial & Trade Uses) वाणिज्य एवं व्यापार में सफलता बहुत हद तक विज्ञापनों पर निर्भर करती है। विज्ञापनों के सहारे ही बहुत तरह के नये-नये सुझाव आम जनता को दिए जाते हैं। चूंकि इस तरह का सुझाव सीधे न देकर किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या लोकप्रिय अभिनेता या अभिनेत्री द्वारा दिलवाया जाता है। फलतः उसका प्रभाव जनता पर अधिक पड़ता है तथा जनता उसे तत्परता से स्वीकार कर लेती है। जिसका स्पष्ट परिणाम यह होता है कि उस वस्तु की माँग बढ़ जाती है।