चिंतन का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, प्रकार | Thinking - Meaning, Definition, structure and Types
चिंतन का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, प्रकार | Thinking - Meaning, Definition, structure and Types
चिंतन का अर्थ - MEANING OF THINKING
चिन्तन का हमारे व्यक्तित्व से प्रत्यक्ष संबंध है। हमारा चिन्तन जितना श्रेष्ठ होगा, हमारा व्यक्तित्व भी उतना ही विकसित एवं परिपक्व होगा। यदि हम किसी के व्यक्तित्व से परिचित होना चाहते हैं तो हम यह जान लें कि उस व्यक्ति के विचार कैसे हैं। उसका चिन्तन सकारात्मक है या नकारात्मक। यह अत्यधिक श्रेष्ठ साधन है, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व से परिचित होने का। हमारे चिन्तन का हमारे स्वास्थ्य में भी अति महत्वपूर्ण स्थान है। स्वास्थ्य की कुंजी सकारात्मक सोच है। हमारे चिन्तन का हमारे स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जैसा सोचते हैं, हमारा शरीर वैसा ही रिएक्ट करता है। नकारात्मक चिन्तन शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर, इसे अस्वस्थ बना देता है। सकारात्मक रहना आसान है और चिन्तन को सकारात्मक स्वरूप देना उससे भी ज्यादा आसान है, आवश्यकता सिर्फ सकारात्मक रवैया इख्तियार करने की है। जीवन में जितनी भी कठिनाइयों एवं संघर्ष क्यों न आयें, सकारात्मक रुख अपनाये रखें, यही उत्तम स्वास्थ्य एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व की कुंजी है।।
• वस्तुतः चिंतन प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न देने वाली एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जो प्रत्येक प्राणी में निरन्तर चलती रहती है।। जब प्राणी के सामने कोई समस्या उत्पन्न होती है तो चिंतन की शुरूआत होती है और जब तक समस्या का समाधान नहीं हो जाता तब तक चिंतन की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।
चिंतन की परिभाषा (DEFINITION OF THINKING)
एटंकिंसन, एटकिंसन एवं हिलगार्ड (1998) के अनुसार:- "चिंतन एक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है, जिसमें घटनाओं तथा वस्तुओं के प्रतिनिधियों के रूप में प्रतीकों की विशेषता होती हैं।'
बेरोन (1992) के अनुसार:- चिंतन में सम्प्रत्ययों प्रतिज्ञाप्ति तथा प्रतिमाओं का मानसिक जोड़ तोड़ होता हैं।"
गैरेट (1961) के अनुसार:- चिंतन एक ऐसा आन्तरिक व्यवहार हैं, जिसमें वस्तुओं विचारों के लिए प्रतीक प्रयुक्त होते
सैनट्रोक (1995) के अनुसार:-"चिंतन में मानसिक रूप से सूचनाओं का जोड़-तोड़ सम्मिलित होता हैं विशेष कर जब हम सम्प्रत्यय का निर्माण करते हैं, समस्याओं का समाधान करते हैं, तर्क करते हैं तथा निर्णय लेते हैं। "
रेबर तथा रेबर (2001) के अनुसार:- सामान्यतः चिंतन का अर्थ है विचारों
प्रतिमाओं, प्रतीकों, शब्दों, कथनों स्मृतियों, प्रत्ययों अवबोधनों, विश्वासों तथा अभिप्राय का अन्तः ज्ञानात्मक तथा मानसिक परिचालन ।
कामन तथा हेवमैन (1976) के अनुसार:- प्रतिमाओं, प्रतीकों, सम्प्रत्ययों, नियमों तथा अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक जोड़ तोड़ को चिंतन कहा जाता है।
चिंतन का स्वरूप (NATURE OF THINKING)
चिंतन की विभिन्न परिभाषाओं का विश्लेषण करने के उपरान्त चिन्तन के स्वरूप के संबंध में निम्नलिखित तथ्य उजागर होते हैं जब प्राणी के सामने कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है, जिसका समाधान तो वह करना चाहता है, किन्तु उसे समाधान का उपाय या रास्ता दिखाई नहीं देता है तो वह सोचना शुरू करता है अर्थात उसमें चिंतन की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं अतः स्पष्ट है कि चिंतन एक समस्या समाधान व्यवहार है।
• चिंतन एक अव्यक्त मानसिक प्रक्रिया है अर्थात इसे स्थूल वस्तुओं की भाँति प्रत्यक्ष रूप से आँखों से नहीं देखा जा सकता वरन्-प्राणी के व्यवहार के आधार पर यह पता लगता है कि वह क्या सोच रहा है? उसके चिंतन का स्तर क्या है?
चिंतन प्रक्रिया का संबंध भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों से होता है।
• चिंतन का प्रमुख उद्देश्य किसी समस्या का समाधान
करना होता है। अतः इसमें प्रयत्न एवं श्रुति की प्रक्रिया शामिल होती है।
● चिंतन की एक निश्चित दिशा होती है क्योंकि यह लक्ष्य
निर्देशित होता है।
• चिंतन में भाषा तथा प्रतीकों का भी उपयोग होता है।
विद्यार्थियों आपने अक्सर अनुभव किया होगा कि सोचते-सोचते कभी कभी हम अपने मन कुछ
कुछ बोलने भी लगते हैं अर्थात् भाषा का प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार दिखायी एवं
सुनायी देने में वाली प्रतिभाओं का उपयोग भी हम सोचने में करते हैं।
चिंतन के प्रकार (TYPES OF THINKING)
1. स्वली चिंतन (Autistic thinking)
• स्वली चिंतन का तात्पर्य ऐसे चिंतन से होता है जिका संबंध कल्पनाओं से होता है। स्वली चिंतन में व्यक्ति की इच्छाएँ तथा विचार ही कल्पनाओं के रूप में अभिव्यक्ति होते हैं। विभिन्न प्रकार के स्वप्न तथा इन स्वप्नों में दिखने वाले दृश्य साथ ही व्यक्ति की अभिलाषाएँ स्वली चिंतन के उदाहरण हैं मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा कोई छात्र यदि यह कल्पना करता है कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने के पश्चात वह किसी प्रसिद्ध मेडिकल कॉलेज में एड्मिशन लेगा तथा पढ़ाई पूरी करने के पश्चात वह एक बहुत बड़ा हॉस्पिटल खोलेगा, बहुत से लोगों की सफलता पूर्वक चिकित्सा करने पर उसका देश विदेश में नाम होगा तथ वह खूब सारा पैसा कमायेगा तो यह स्वली चिंतन का उदाहरण होगा। इस तरह के चिंतन का कोई वास्तविक आधार नहीं होता है साथ ही इसका संबंध किसी भी प्रकार की समस्या के समाधान से नहीं होता है।
• स्वली चिंतन का कोई वास्तविक आधार न होने के कारण कई
बार व्यक्ति अपने उददेश्य से भटककर भी चिंतन करना। प्रारम्भ कर दकता है जिससे उसके
समय व ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। जिस समय का सदुपयोग वह अपने उद्देश्य की
पूर्ति हेतु प्रयत्न करने में कर सकता था उस समय को वह यूँही व्यर्थ कल्पनाओं में
बिता देता है।
2. यथार्थवादी चिंतन (REALISTIC THINKING)
यथार्थवादी चिंतन का तात्पर्य ऐसे चिंतन से होता है, जिसका संबंध व्यक्ति के वास्तविक जीवन से होता है। यथार्थवादी चिंतन व्यक्ति की समस्याओं का समाधान करने में मदद करता है। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति बस में बैठकर मात्रा कर रहा है और अचानक बस रुक जाती है तब वह विभिन्न प्रकार से सोचना प्रारम्भ कर देता है कि कहीं ड्राइवर ने कोई एक्सीडेंट तो नहीं कर दिया है, कहीं बस का डीजल तो नहीं खत्म हो गया है, कहीं बस के इंजन में कोई खराबी तो नहीं आ गयी है, कहीं पहिये का टायर तो नहीं फट गया है, आदि आदि। इस प्रकार व्यक्ति समस्या उत्पन्न करने में संभावित विभिन्न कारणों पर चिंतन करने के पश्चात मुख्य कारण तक पहुँचता है तथा निश्चित करता है कि बस इस कारण से ही बन्द हुई है, फिर वह प्रस्तुत समस्या के समाधान का प्रयास करता है। इस प्रकार का चिंतन यथार्थवादी चिंतन का उदाहरण है।
यथार्थवादी चिंतन के प्रकार (TYPES OF REALISTIC THINKING)
अभिसारी चिंतन (Convergent thinking)
इस तरह के चिंतन को निगमनात्मक चिंतन (डेडक्टिव थिंकिंग) भी कहा जाता
है। अभिसारी चिंतन का प्रतिपादन सर्वप्रथम जाय पॉल गिल्फोर्ड ने किया। अभिसारी
चिंतन चिंतन का एक ऐसा प्रकार है, जिसमें व्यक्ति बहुत सारी जानकारियों तथा तथ्यों का
विश्लेषण करके किसी एक उत्तर को खोजता है। अर्थात् किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचता
है। विद्यालयों में विद्यार्थियों द्वारा किया जाने वाला चिंतन, जिसके आधार पर वे विभिन्न पुस्तकों को पढ़कर जानकारियाँ एकत्र करते फिर
अपने लिए उपयोगी जानकारी तक पहुँच जाते हैं तथा अध्यापकों द्वारा पूछे गये
प्रश्नों का समाधान करते हैं। अभिसारी चिंतन में गति परिशुद्धता तथ तर्कणा का
विशेष महत्व है। अभिसारी चिंतन का प्राथमिक उददेश्य कम से कम समय में सर्वश्रेष्ठ
तार्किक उत्तर तक पहुंचना होता है। एक अभिसारी चिंतक प्रायः ऐसी जानकारियों के
एकत्रीकरण का प्रयास करता है अर्थात ऐसे ज्ञान को प्राप्त करता है जिसका उपयोग वह
भविष्य में आने वाले समस्याओं के समाधान में करता है। अभिसारी चिंतन में हम
सामान्य से विशिष्ट की ओर जाते हैं, जब किसी प्रदत्त नियम के
आधार पर हम विशिष्ट निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब हमारा चिंतन अभिसारी चिंतन के
प्रकार का होता है। अभिसारी चिंतन का केन्द्र बिन्दु किसी समस्या का समाधान करना
होता है, इसके लिए हम विभिन्न साक्ष्य व तथ्य एकत्र करते हैं,
उनका विश्लेषण करते हैं। और समस्या का समाधान करते हैं। इस तरह के
वितन में व्यक्ति अपनी जिन्दगी के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में प्राप्त अनुभवों को
एक साथ मिलाकर उसके आधार पर एक समाधान खोजता है। ऐसे चिंतन द्वारा जिस समस्या का
समाधान होता है, उसका एक निश्चित उत्तर होता है।
अपसारी चिंतन (DIVERGENT THINKING)
अपसारी चिंतन का प्रतिपादन सर्वप्रथम जॉय पॉल गिलफोर्ड ने किया।
अपसारी चिंतन में किसी भी समस्या का समाधान करने हेतु विभिन्न जानकारियाँ, साक्ष्य
व तथ्य एकत्र किये जाते हैं फिर इन जानकारियों साक्ष्यों व तथ्यों के आधार पर
अलग-अलग तरीकों से समस्या समाधान किया जाता जाता है। अपसारी चिंतन सामान्यतः
स्वतंत्र व स्वैच्छि होता है। जिसमें हमारा मस्तिष्क अव्यवस्थित रूप से समस्या
समाधान के उपाय खोजता है। और विभिन्न तरीकों से समस्या समाधान करता है। अपसारी
चिंतन का प्रयोग सामान्यतः ओपन इन्डेड प्रश्नों के समाधान में किया जाता है।
जिसमें उत्तरदाता अपने अनुसार कोई भी उत्तर देने के लिए स्वतंत्र होता है उत्तर
देते समय वह विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता
रचनात्मक चिंतन (CREATIVE THINKING)
रचनात्मक चिंतन चिंतन की एक सकारात्मक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति
दिये गये तथ्यों में कुछ नये तथ्य जोड़कर एक निष्कर्ष तक पहुँचता है। विज्ञान
साहित्य और कला का विकास रचनात्मक चिंतन का ही परिणम है। हिन्दी के शब्द जानने
वाले तो करोड़ों हैं परन्तु इन्हीं शब्दों के अनुपम प्रयोग से कुछ लोग बड़े कवि तथा
कलाकार बन जाते हैं। पेड़ से पके फल टूटकर जमीन पर गिरते तो बहुतों ने देखा था
परन्तु न्यूटन ने इसी साधारण सी घटना से गुरुत्वाकर्षण का नियम निकाला। हाँडी में
उबलते पानी और वाल्म को देखकर जेम्स वॉट ने रेल के इदंजन का अविष्कार कर दिया। ये
सब रचनात्मक चिंतन के ही परिणाम हैं। किसी भी व्यक्ति का रचनात्मक चिंतन उसके लिए
एक आश्चर्यजनक घटाना हो सकती है। पेड़ से जमीन पर गिरते फल तथा उबलते हुए पानी की
भाप से ढक्कन हिलते बहुतों ने देखा परन्तु गुरुत्वाकर्षण का नियम न्यूटन ने ही तथा
भाप के इंजन का अविष्कार जेम्स वॉट ने ही किया। रचनात्मक चिंतन करने वाले व्यक्ति
की कल्पनाओं में इतनी नवीनता तथा सहजता होती है कि वह विभिन्न वस्तुओं के असाधारण
उपयोग बता सकता है।
आलोचनात्मक चिंतन (EVALUATIVE THINKING)
इस तरह के चिंतन में व्यक्ति किसी वस्तु, घटना या
तथ्य की सच्चाई को स्वीकार करने के पहले उसके गुण-दोष की परख कर लेता है। हमारे
समाज में कुछ व्यक्ति तो ऐसे होते हैं जिन्हें किसी घटना या वस्तु के बारे में जो
कुछ भी कहा जाता है, उसे वे सही समझकर मान लेते हैं तब ऐसा
कहा जाता है कि इस तरह के व्यक्ति में आलोचनात्मक चिंतन की शक्ति कम है। दूसरी तरफ
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें कुछ घटना या वस्तु के बारे में कहने पर गुण-दोष
परखते हैं और तब उसे सही या गलत मानते हैं। व्यक्ति में इस तरह के चिंतन को
आलोचनात्मक चिंतन (Evaluative thinking) कहा जाता है।
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