नियोजन के प्रकार - Types of Planning

नियोजन के प्रकार - Types of Planning

नियोजन के प्रकार - Types of Planning 

 भौतिक नियोजन 


उपलब्ध भौतिक संसाधनों के आधार पर नियोजन के लक्ष्यों को भौतिक वस्तुओं के रूप में व्यक्त किया जाता है तो उसे भौतिक नियोजन के नाम से जाना जाता है। सड़क के लिए लम्बाई, भवन की संख्या, इत्यादि।


वित्तीय नियोजन 


इसमें योजना के विभिन्न मदों पर व्यय का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। व्यय कितना और किस रूप में होगा इसका निर्धारण महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में होता है। भौतिक नियोजन और वित्तीय नियोजन परस्पर आश्रित होते हैं। उदाहरणार्थ यदि सड़क बनानी है, इसकी लम्बाई बढ़ायी जाएगी तो वित्तीय लागत भी बढ़ेगी। रूपये के अवमूल्यन, बाजारभाव मजदूरी आदि का प्रभाव इस नियोजन पर पड़ता है। जो पूर्वानुमान के बाहर भी हो सकता है।






संरचनात्मक नियोजन 


संरचनात्मक नियोजन को क्रांतिकारी नियोजन भी कहा जाता है। इसके अंतर्गत समाज की सम्पूर्ण संरचना में परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है। समाज के सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक ढाँचे में परिवर्तन लाने के लिए नवीन पद्धतियों का विकास करते हुए प्रयोगात्मक परीक्षण किया जाता है जिसके फलस्वरूप सामाजिक एवं आर्थिक व्यवहार के नये आयाम स्थापित होते हैं तथा रूढ़िवादी व्यवस्था समाप्त होती है। उदाहरण के रूप में महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा और उनके प्रयोग को समझा जा सकता है। गांधी की वर्धाया सेवाग्राम परियोजना के साथ-साथ उनके ग्राम स्वराज के सपने को प्रयोग रूप में इस नियोजन को परीक्षित किया जा सकता है। आदर्श समाज व्यवस्था के लिए ऐसे कई प्रयोग किए गए है।


प्रकार्यात्मक नियोजन 


प्रकार्यात्मक नियोजन के अंतर्गत सामाजिक व्यवस्था के अभावो को जो विकास कार्य में बाधक होता है, दूर करने का प्रयास किया जाता है। प्रकार्यात्मक नियोजन का संरचनात्मक नियोजन से घनिष्ठ संबंध होता है। दीर्घकालीन कार्यान्वयन के बाद संरचनात्मक नियोजन का रूपांतरण प्रकार्यात्मक नियोजन में हो जाता है। सामाजिक संरचना में जब परिवर्तन होता है तो सुधार की आवश्यकता होती है। समाज की संरचना में सुधार के लिए पहले संरचनात्मक नियोजन किया जाता है। भारत में छुआछूत समाज की संरचना में मौजूद था इसे विधि द्वारा निषिद्ध माना गया। फिर विभिन्न सुधारात्मक तथा निरोधात्मक नियोजन के द्वारा व्यवस्था में विद्यमान कुरीतियों को धीरे-धीरे समाप्त करने हेतु प्रकार्यात्मक नियोजन किया गया।











सुधारात्मक नियोजन


विकास की प्रक्रिया में अवरोधों को दूर करने के लिए सुधारात्मक नियोजन किया जाता है। इसमें राज्य का हस्तक्षेप होता है। सुधारात्मक नियोजन के अंतर्गत निजी उत्पादकों एवं विनियोजकों को सहायता तथा निर्देशन प्रदान किया जाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रण किया जाता है। सुधारात्मक नियोजन का लक्ष्य आर्थिक अस्थिरता को दूर करना होता है किंतु राज्यअर्थव्यवस्था में आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप नहीं करता।


विकासात्मक नियोजन


विकासात्मक नियोजन के अंतर्गत भौतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक उन्नति का प्रयास किया जाता है। आवश्यकतानुसार दूसरे सामाजिक राजनीतिक, प्रशासनिक एवं समाज के विभिन्न संरचनाओं में परिवर्तन किये जाते है।


विकास की ऐसी प्रक्रिया में संसाधनों की मैंपिंगकी जाती है। ये संसाधन प्राकृतिक और मानवीय हो सकते हैं। प्राकृतिक संसाधन की अलब्धता के पर्यावरणीय विश्लेषण में उसके संरक्षण का भी नियोजन शामिल है। मानवीय संसाधन की योग्यता क्रम के आधार पर मैंपिंग की जाती है। उपयोग लागत का अनुमान संसाधनों के उपयोग की वरीयता/आवश्यकताओं के वरीयता क्रम के आधार पर किया जाना चाहिए। आज संतुलित सतत और स्थायी विकास पर जोर दिया जाने लगा है क्योंकि असंतुलित विकास क्षेत्रीय विषमता को जन्म देता है। क्षेत्रीय हिंसा, नक्सलवाद इसका परिणाम माना जाता है। विकास एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है स्थायी विकास का मूल्यांकन विकास के परिणाम के आधार पर किया जाता है। सिंचाई के लिए बांध बनाया जाना अनिवार्य है लेकिन इससे जंगल नष्ट हो, बाढ़ आए तो फिर यह विकास स्थायी परिणाम का नहीं माना जा सकता है। दीर्घकालीन योजना के प्रस्तुत करने के बाद उसे अल्पकालीन सहायक योजना में विभाजित किया जाता है। कृषि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, यातायात आदि के विकास से रोजगार सृजन और जीवन स्तर में सुधार का लक्ष्य पूरा होता है। 






प्रजातांत्रिक नियोजन


प्रजातांत्रिक नियोजन जन सहभागिता एवं जन सहयोग पर आधारित होता है। यह नियोजन निम्नस्तर से प्रारंभ होकर उच्च स्तर की तरफ बढ़ता है। प्रजातांत्रिक नियोजन की सफलता राष्ट्र की जनसंख्या, उसकी शिक्षा, जागरूकता एवं अनुशासन के स्तर पर निर्भर करता है।


तानाशाही नियोजन


तानाशाही नियोजन फासिस्ट नियोजन के नाम से जाना जाता है। इस नियोजन में उत्पादन के सभी अंगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है। निजी क्षेत्र में केवल अधिकृत सीमित संपति रह जाती है। उत्पन्दन, उपभोग, विनिमय तथा वितरण सभी पर राज्य का अधिकार होता है। योजना के लक्ष्यों को केन्द्रीय नियोजन समिति निर्धारित कर देती है।


योजना के कार्यकाल को निश्चित कर दिया जाता है। तानाशाही नियोजन में निर्धारित मानदण्डों का पालन किया जाता है।