परीक्षणात्मक शोध के कारक परिणाम की वैधता - Validity of the Factors Result of the Experimental Research
परीक्षणात्मक शोध के कारक परिणाम की वैधता - Validity of the Factors Result of the Experimental Research
कारक परिणाम प्राप्त करते समय दो प्रकार की वैधता पर ध्यान देना चाहिए -
पहली, आंतरिक वैधता और
दूसरी बाह्य वैधता ।
आंतरिक वैधता से तात्पर्य उस विश्वास से है जो अध्ययन के कारण परिणाम यथार्थ रूप से समझते हैं कि क्या एक परिवर्ती दूसरे का कारण है। यदि कारकता की तीन स्थितियाँ पूर्ण कर ली जाती है तो ये माना जाता है कि कारक परिणाम की आंतरिक वैधता है। बाह्य वैधता का आशय उस मात्रा से है जहां तक अध्ययन के कारक परिणाम को सामान्यीकृत किया जा सकता है। कैम्पबेल और स्टेनली (1963) तथा कुक और कैम्पबेल (1971) द्वारा आंतरिक वैधता के लिए कई खतरों का उल्लेख किया गया है -
1) इतिहास -
इतिहास के खतरे का तात्पर्य उन घटनाओं से है जो परीक्षण के क्रम में होती हैं। य कहा जाता है कि ये घटनाएँ उस परीक्षण के लिए खतरा है जो लम्बे समय तक चलता रहता है और जो घटनाओं के आश्रित परिवर्ती को प्रभावित करने की स्वीकृति प्रदान करता है।
2) परिपक्वता -
समय गुजरने के साथ परीक्षण के विषय/व्यक्तियों में कई बदलाव परिलक्षित होते हैं। परीक्षण के विषय में ये बदलाव परिपक्वता के बदलाव कहे जाते हैं। यदि इनमें से कोई भी बदलाव आश्रित परिवर्ती में होते हैं तो ये स्वतंत्र परिवर्ती के प्रभाव को भ्रमित कर सकते हैं।
3) परीक्षण -
पुनरावर्ती परीक्षण कई बार परीक्षण किए जाने वाले परिवर्ती में बिना किसी संगत सुधार के प्रदर्शन को संवर्धित कर देता है। प्रदर्शन में बदलाव से आश्रित परिवर्ती में बदलाव हो सकता है जो बदलाव वास्तव में पुनरावर्ती मापन के कारण है किसी स्वतंत्र परिवर्ती के प्रभाव के कारण नहीं।
4) सांख्यिकीय अवनति -
यदि विषय के अंक बहुत ज्यादा अथवा बहुत कम हो तो किसी भी समय सांख्यिकीय अवनति का खतरा पैदा हो सकता है। जब इन चरम मसलों को फिर से मापा जाता है तो इसमें अंक अत्यधिक कम होगा। मोटे तौर पर, उनमें औसत अंक की ओर अवनति की प्रवृत्ति निहित होती है।
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