What is POSDCoRBEF - पोस्डकॉर्ब क्या हैं?
What is POSDCoRBEF - पोस्डकॉर्ब क्या हैं? - POSDCORB
योजना अथवा नियोजन (Planning)
योजना बनाना अथवा नियोजन उनके कार्यों की रूपरेखा तैयार करना है जिन्हें निष्पादित किया जाना है तथा उद्यम के लिए निर्धारित प्रयोजन की प्राप्ति हेतु पद्धति अथवा विधि को अपनाना है। नियोजन एक दृष्टिकोण, एक अभिवृत्ति और एक धारणा है जिसके अनुसार हमारे लिए अपने भाग्य का पहले से ही अनुमान करना, भविष्यवाणी करना, मार्गदर्शन करना और नियंत्रण करना सम्भव होता है। समाजिक नियोजन सक्षम, प्रभावी और जवाबदेह बनाने में मदद करता है। नियोजन हमारे वांछित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक है। कोई समाज कल्याण कार्यक्रम शुरू करने अथवा कोई अनुसंधान आरंभ करने से पहले रचनात्मक सूचना के साथ तथा जानकार व्यावसायिकों के साथ परामर्श करके उपयुक्त नियोजन बहुत जरूरी है। ‘क्या’, ‘कैसे’, और ‘क्यों' के उत्तर समाज कल्याण योजनाओं और कार्यक्रमों के सम्बन्ध में बेहतर विचार आवश्यक है।
नियोजन की प्रक्रिया में निम्नलिखित सोपानों का पालन करना जरूरी है -
1. उपयुक्त प्रयोजन तैयार करना
2. समस्या की पहचान करना
3. मौजूदा तथ्यों को इकट्ठा करना और समझना
4. उपलब्ध, तथ्यों का विश्लेषण करना शाति
5. उपयुक्त पद्धति तैयार करना
6. लक्ष्यों को संगठित करना और प्राथमिकताओं का पता लगाना
7. संसाधनों की खोज करना
8. अन्य विकल्प ढूंढना
9. सोचे गए अनेक विकल्पों के परिणामों की भविष्यवाणी करना
10. योजना तैयार करना
11. योजना की निष्पादित करना
12. परिणाम का मूल्यांकन करना और अधिक प्रभाविता के लिए पद्धतियाँ पुन: तैयार करना
संगठन ( Organisation)
डिमोक एवं डिमोक (1664) ने संगठन को परिभाषित किया है कि संगठन एक एकीकृत पूर्ण निकाय को निर्मित करने के लिए परस्पर निर्भर भागों को व्यवस्थित रूप से एक करता है जिसके माध्यम से प्राधिकार समन्वय और नियंत्रण का इस्तेमाल एक निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किया जाता है... संगठन, संरचना और मानव सम्बन्ध दोनों है। संगठन की तुलना मानवीय शरीर से की जा सकती है। जैसे मानव शरीर में विभिन्न अंग होते हैं जैसे श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र प्रजनन तंत्र। इन सभी के अलग अलग कार्य होते हैं और ये मुक्त रूप से कार्य करते हैं तथा ये संयुक्तरूप से भी कार्य करते हैं और शरीर को सही और स्वस्थ्य रखते हैं। हर्बर्ट (1960) ने बताया है कि संगठन उन व्यक्तियों को प्रभावित करता है जो अलग-अलग ढंग से कार्य करते हैं -
1. संगठन कर्मचारियों के मध्य कार्य आबंटित करता है। कार्मियों को उनकी क्षमताओं के अनुसार संगठन में विशेष कार्य दिया जाता है।
2. संगठन मानव व्यवहार सृजित करता है और बेहतर कार्य करने के लिए कर्मचारियों की मदद करने हेतु कार्यविधियों को नियोजित करता है।
3. संगठन उर्ध्वगामी व अधोगामीतथा परस्परप्राधिकार का अनुकरण करता है इससे निर्णयन के सुचारू प्रवाह में मदद मिलती है।
4. सभी तक पहुँचने के लिए संगठन संचार प्रणाली का अनुकरण करता है।
5. ज्ञान, कौशल और निष्ठा प्रदान करके संगठन अपने सदस्यों का मार्गदर्शन और उन्हें शिक्षित करता है। प्रशिक्षण बेहतर ढंग से कार्य करने और संगठन की जरूरतों के अनुसार निर्णय लेने में मदद करता है।
अत: संगठन केवल स्वरूप ही नहीं है, बल्कि वास्तव में यह लोगों के लिए स्वरूप को स्वीकृत करता है
जो निर्देश देते हैं, संगठित करते है और जो संस्थाके प्रयोजनों को प्राप्त के लिए वास्तव में कार्य करते हैं। संस्था व्यवस्थित रूप से चले, इसलिए संगठन की योजना बनाने कि मान्यताएँ निम्नलिखित हैं -
i. प्राधिकार और उत्तरदायित्व
ii. प्रत्यायोजन और विकेंद्रीकरण
iii. जनसंपर्क
iv. संप्रेषण अथवा संचार
v. समन्वय
vi. अनुवीक्षण, पूर्व-मूल्यांकन और मूल्यांकन
vii. पर्ववेक्षण और नियंत्रण
viii. कार्मिक प्रबंध
ix. वित्तीय प्रबंध
x. समुदाय सहभागिता
स्टाफिंग ( Staffing )
विकास कार्य के लिए तीन महत्वपूर्ण तत्व मनुष्य धन और सामग्री हैं। इन तीनों मनुष्य सर्वाधिक में महत्वपूर्ण तत्व है क्योंकि मनुष्य उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा का निर्धारण करते हैं। ये कार्मिक ही होते हैं जो समाज कल्याण के प्रयोजनों के लिए कार्य करने हेतु धन और सामग्री का इस्तेमाल करते हैं। यह माना जाता है कि प्रभावी प्रशासन संगठन संसाधनों और योग्यतथा समर्पित कार्मिको का जोड़ है। यदि संगठन में स्टाफ अच्छा है, तो सीमित धन और सामग्री के साथ भी, संगठन अच्छे कार्य का निष्पादन कर सकता है, परन्तु स्टाफ प्रभावी नहीं है तो सर्वोत्तम धन और सामग्री और पर्याप्त धन होने पर भी इष्टतम प्रयोजनों को प्राप्त नहीं किया सकता है।
निर्देशन करना ( Staffing )
निर्देशन, निर्णय करने की सतत प्रक्रिया है तथा उद्यम का मार्गदर्शन करने के लिए इसमें विशिष्ट और सामान्य आदेश तथा निर्देश सम्मिलित होते हैं। निर्देशन को स्टाफ सदस्यों की जरूरतों के अनुसार सीखने में उनकी मदद करने, उनके ज्ञान और कौशलों का इस्तेमाल करने तथा उनकी क्षमताओं और योग्यताओं को सुधारने की प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है जिससे कि वे अपने कार्य की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को कुशलतापूर्वक निभा सकें।
निर्देशन के लिए आवश्यक घटकों का उल्लेख नीचे किया गया है -
1. उचित कार्य के उचित व्यक्ति की पहचान करना।
2. अपने कार्य में रूचि विकसित करने के लिए स्टाफ को प्रेरित करना।
3. नए स्टाफ सदस्यों को कार्य सिखाना।
4. स्टाफ सदस्य की जानकारी को देखकर कार्यनिष्पादन का मूल्यांकन करना।
5. प्रशासनिक परिवर्तनों का पालन करना और स्टाफ को काम पर लगाना जिससे कि वे अच्छे से अच्छा कार्य कर सकें।
6. कार्य को समय पर समाप्त करने के लिए स्टाफ को पुरस्कृत करना और बेहतर तरीके से कार्य करने के लिए अन्यों की मदद करना।
7. अच्छी भावना और टीम कार्य स्थपित करना जिससे कि दिए हुए कार्य को कुशलतापूर्वक बुद्धिमत्तापूर्वक और उत्साहपूर्वक समाप्त किया जा सके।
समन्वय ( Coordination )
समन्वय, कार्य के दोहरेपन और अतिव्याप्तिकी रोकथाम सुनिश्चित करता है जिससे कि सामाजिक विकास क्षेत्र में प्रशासनिक प्रयत्न, संसाधन, स्टाफ कार्य निरर्थक न जाएं। समन्वय समाज कार्य संस्थाओं के कुशल और किफायती कार्य संचालन को सुनिश्चित करने के लिए काफी जरूरी है। भारत एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ विविध भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। इस प्रकार इसकी समस्याएं भी विभिन्न प्रकार की हैं और इन समस्याओं को केवल सरकार ही नहीं सुलझा सकती क्योंकि इन सामाजिक समस्याओं को निजी सार्क की भी जरूरत होती है और संभावयह ये समस्याएं जटिल होती है। इसका अभिप्राय इष्टतम लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सहयोग और सामंजस्य प्राप्त करना है। समन्वय का अभिप्राय उपक्रम के प्रयोजन को प्राप्त करने के लिए व्यवस्थित रूप से विभिन्न भागों का एकत्रीकरण हैं। अत: देश की सामाजिक समस्याओं पर काबू पाने के लिए सभी संस्थानों के साथ समन्वय के साथ कार्य करना आवश्यक है। समन्वय के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं -
1. समन्वय, कार्य के दोहरेपन और परस्पर व्यापन की रोकथाम करता है।
2. समन्वय उन बाधाओं को दूर करने में मदकरता है जो समाज कल्याण क्षेत्र में काम करने के दौरान आती हैं।
3. यह समाज कल्याण संस्थाओं द्वारा इस्तेमाल किए जानेवाले संसाधनों पर कम खर्च करने में मदद करता है। संसाधनों का आदान-प्रदान अच्छा उपयोग और अच्छे उत्पादन में मदद करता है।
4. संसाधनों के वहन में खर्च को कमतर किया जा सकता है।
5. समन्वय से समाज कल्याण संस्थाओं के मध्य प्रतिस्पर्धा कम से कम होगी।
6. समन्वय, सामाजिक समस्याओं के निवारण में संयुक्तप्रयासों में मदद करेगा और इससे सामाजिक समस्याओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। क्योंकि इसके लिए अत्याधिक जनशक्ति का इस्तेमाल होगा।
समन्वय दो चरणों पर हो सकता है कि समन्वय संस्था के अंदर होना चाहिए। विभिन्न विभागों स्टाफ सदस्यों के मध्य अच्छा समन्वय होना आवश्यक है। संस्था के भीतर सभी के मध्य खुला संप्रेषण होना जरूरत है जिससे कि संस्था के परिणाम और उत्पादन इष्टतम उद्देश्यों के अनुसार हों। दूसरे स्तू पर, विभिन्न समाज कल्याण संस्थाओं के मध्य समन्य होना अनिवार्य है।
रिपोर्टिंग ( Reporting )
रिपोर्टिंग का अभिप्राय उचित अभिलेख रखना और लोगों को सूचित करना है। कार्यकारी, पर्यवेक्षकों और अधीनस्थों को क्या हो रहा है इसके बारे में सूचित करता है और निरीक्षण अनुसंधान और अभिलेखों के माध्यम से इस प्रकार की सूचना का प्रबंध करने के लिए जिम्मेदार होता है। समाज कल्याण प्रशासन सभी प्रकार के अभिलेखों के देख-भाल के लिए उत्तरदायी होता है। प्रशासन सभी फाइलों की देख-भाल करता है।
बजट व्यवस्था ( Budget )
समाज कल्याण संस्था का वित्तीय प्रशासन बजट-व्यवस्था में निहित है। यह संस्था के विकास के लिए संसाधन उत्पन्न करने, विनियम और आबंटन से संबन्धित है। संस्था धन राशियों, अंशदानों है जो एक विशेष अवधि के लिए उत्पन्न किए गए धन के अनेक स्रोतों को उस धन से संचालित किए गए क्रिया कलापों तथा कार्यक्रमों को प्रदर्शित करता है। बजट के प्रयोजन निम्न हैं -
1. संस्था की वित्तीय जरूरतों को समझना।
2. धन किस प्रकार इस्तेमाल किया जाएगा, इसके बारे में बताता है।
3. यह सभी स्टाफ सदस्यों के लिए एक मार्गदर्शक है कि अनेक उपशीर्षों के अंतर्गत धन किस प्रकार इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
4. समुदाय और सेवार्थियों निधि के स्रोतों और धन किस प्रकार खर्च किया गया है इन सब पर फोकस किया जाना चाहिए।
5. संस्था के प्रयोजनों और इन प्रयोजनों को पूरा करने के लिए योजना का मूल्यांकन करता है।
6. बेहत्तर बजट निर्माण समीक्षा और निर्णायन प्रस्तुत करता है।
मूल्यांकन ( Evaluation )
मूल्यांकन अनेक समय अवधियों- साप्ताहिक, मासिक, अर्थवार्षिक और वार्षिक अवधियों में किया जा सकता मूल्यांकन अनेक समूहों द्वारा किया जा सकता है अर्थात आंतरिकसंस्था मूल्यांकन निधियन संस्थाएं और बाहरी मूल्यांकन समूह।
प्रतिपुष्टि ( Feedback)
आवधिक प्रतिपुष्टि किसी भी कार्यक्रम और परियोजना का एक बहुत जरूरी कदम है। प्रतिपुष्टि सफलताओं की फिर से जांचपड़ताल करके संगठन की मदद करती है और यदि कुछ गलत हो तो उसमें सुधार करने की उपयुक्त कार्रवाई करती है। प्रतिपुष्टि मात्र संगठन अथवा परियोजना को सुदृढ़ करने में मदद करती है। यह बेहतर परिणाम प्राप्ति हेतु निधियों के पुनविनियोग को सक्षम बनाता है। प्रतिपुष्टि किसी परियोजना अथवा संस्था की निरंतरता को पूरी तरह से सुनिश्चित करती है
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