विश्व इतिहास - world history

विश्व इतिहास - world history

विश्व इतिहास - world history


उन्नीसवीं सदी तक इतिहासकार एक देश के इतिहास का निरूपण किया करते थे। इसके बाद यातायात के साधन बढ़े, देशों के बीच व्यापार बढ़ा, फलस्वरूप इतिहासकारों की दृष्टि व्यापक होकर महाद्वीपों के इतिहास लिखे जाने लगे। उदाहरण के लिए यूरोप का इतिहास, एशिया का इतिहास, अफ्रीका का इतिहास आदि। बीसवीं सदी में यह प्रक्रिया अधिक विकसित हुई। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में तीव्र विकास से विभिन्न महाद्वीप नजदीक आ गए। विभिन्न महाद्वीपों में विभिन्न देशों की राजनीति, आर्थिक तथा व्यापारिक संबंध आपस मेइतने उलझते गए कि किसी भी देश का इतिहास उचित तरीके से समझने के लिए वैश्विक दृष्टि आवश्यक हो गई। इस संदर्भ में प्रो. एल्टन का यह प्रतिपादन कि सभी बेहतर ऐतिहासिक लेखन विश्व का इतिहास ही होता है, क्योंकि विश्व के एक भाग का अध्ययन करते समय विश्व का विचार करना ही होता है।" वैश्विक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। वर्तमान में तो सर्वत्र वैश्वीकरण के प्रवाह के कारण किसी भी एक देश का प्रदेश का अथवा महाद्वीप का भी एकाकी विचार संभव ही नहीं








विश्व इतिहास उदारवादी दृष्टिकोण वाले इतिहासकारों की देन है और अंतरराष्ट्रीय स्नेह, सद्भावना एवं विश्वबंधुत्ववाद के अंतर्गत लिखा गया है। इसका जन्म यूनानी संस्कृति के रोमन जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के फलस्वरूप हुआ। विश्व इतिहास वास्तव में राष्ट्रीय इतिहास है जिसका नेता संपूर्ण राष्ट्र अथवा जाति थी। इस इतिहास के समर्थकों में विशुद्ध बुद्धिवादी पोलीबस का नाम विशेष आदर के साथ लिया जाता है जिस पर व्यूसीडायडीज और अरस्तू की गहरी छाप पड़ी थी और जो कार्य कारणवाद के सिद्धांत पर राजनीतिक घटनाओं और युद्धशास्त्रीय विवेचन में ही विशेष रुचि रखते थे।


इतिहास में एक समय ऐसा भी आया था जब उग्र राष्ट्रीयता की भावना ने विश्व युद्ध की भेरी बजा दी, फलस्वरूप बहुत कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो गया। तब मानव समाज की रक्षा के लिए विश्व संस्थाओं की आवश्यकता अनुभव की गई और हेग न्यायालय, राष्ट्रसंघ, संयुक्त राष्ट्रसंघ आदि की स्थापना कर विश्वबंधुत्ववाद को जागृत करने का इतिहासकारों ने प्रयास किया था। यहीं से विश्व इतिहास लिखने की और लोगों का ध्यान गया अथवा इसके पूर्व किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया था, किंतु 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब लोगों ने विश्वभ्रातत्ववाद के सिद्धांत को स्वीकारा तब इतिहासकारों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत की। सर वाल्टर रेले ने प्रथमतः इसके लिए प्रयास किया था। उनके अतिरिक्त एच. जी. वेल्स (आउटलाइन्स ऑफ हिस्ट्री) हेगल, स्पेंगलर, आयन्बी (दि स्टडी ऑफ हिस्ट्री, 12 भाग), आदि ने भी प्रयास किया। कालांतर में विथेल्म के वाल्टर गोट्ज, गुस्टेव क्लोज, लुइम हल्फेन, हेनकी बेर, पं. जवाहरलाल नेहरू आदि ने उपयुक्त विश्व इतिहास प्रस्तुत किया। विलियम ड्ररण्ट का स्टोरी ऑफ सिबिलाइजेशन भी इस दिशा में सशक्त प्रयास है।






पं. नेहरू के विश्व इतिहास की झलक को काफी सराहा भी गया है। टायन्बी ने विश्व सभ्यताओं को एक साथ देखने का प्रयास बहुत ईमानदारी से किया है। स्पेंगलर के शब्दों में, 'विश्व इतिहास अनंत निर्माणों और पुनर्निर्माण तथा मनुष्यों के अद्भुत उत्थान और पतन का चित्रपट है। वहाँ हम स्पेंगलर को इतिहास को यांत्रिक, भौगोलिक और शारीरिक व्याख्याओं का संगम प्रस्तुत करते हुए पाते हैं। वे यूरोप को इतिहास का केंद्रस्थल नहीं मानते, अपितु पूरे विश्व को साथ लेते हैं और विश्व संस्कृतियों का अध्ययन करते हैं। हेगल ने कॉन्ट और हेरदर की तरह विश्व इतिहास का समर्थन किया है। उनके अनुसार विश्व का इतिहास एक बुद्धिसंगत प्रक्रिया है। अपनी इस मान्यता में हेगल का कहना है कि विश्व इतिहास की मूल प्रवृत्तियाँ मानव स्वतंत्रता का विकास है।



डॉ. गोविन्दचन्द्र पाण्डेय का कहना है प्रत्येक युग की ऐतिहासिक घटनाएँ चेतना द्वारा प्रभावित होती हैं और वे चेतना विश्व मस्तिष्क को प्रभावित करके अपने अनुरूप कार्य करने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित तथा बाध्य करती है। विश्व इतिहास की यही वैचारिक आचारिक प्रेरणा है, जिससे विश्वात्मा विश्व चेतना में परिवर्तित हो जाती है, जिसे वह विश्व इतिहास के रूप में जानते हैं।


इस तरह के विश्व इतिहास लेखन के प्रयास, व्यापक दृष्टि रखने वाले कुछ लेखकों द्वारा बीसव सदी में किए गए दिखाई देते हैं। एच. जी. वेल्स का विश्व इतिहास पर ग्रंथ प्रसिद्ध है। वह पूरा नहीं हो 



सका विल इयूरंट का सभ्यता का इतिहास (History of Civilizations) नामक बृहद्रग्रंथ वैश्विक इतिहास का बेहतर उदाहरण है।


कई खंडों में प्रकाशित


उपरोक्त के अतिरिक्त इतिहास विषय के विविध अन्य क्षेत्र भी हैं, जिनका भी अध्ययन होना चाहिए, जिससे इतिहास के प्रत्येक क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त किया जा सके जैसे विधायी इतिहास, सैनिक इतिहास, राजनयिक इतिहास, संसदीय इतिहास, औपनिवेशिक इतिहास कामनवेल्स का इतिहास, विचारों का इतिहास, कला का इतिहास इत्यादि अनेक प्रकार के इतिहास के क्षेत्र हैं।






भूतकालिक समाज संस्कृति एवं सभ्यता का चित्रण करना ही इतिहास का उद्देश्य होता है। किसी भी संस्कृति एवं सभ्यता से संबंधित भौगोलिक दशा वातावरण, आर्थिक व्यवस्था, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक, संवैधानिक कानून, न्याय व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था आदि का विवरण इतिहास में आवश्यक हो जाता है। इतिहासकार से अपेक्षा की जाती है कि इन सभी विषयों का उचित विवरण समाज के समक्ष प्रस्तुत करे। यदि संस्कृति एवं सभ्यता का क्षेत्र विस्तृत है तो इतिहासकार के लिए इन सभी प्रश्नों का उत्तर देना संभव नहीं है। इसीलिए आधुनिक इतिहासकारों ने इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का वर्गीकरण किया है। इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का यह वर्गीकरण वैज्ञानिक युग की देन है। ऐतिहासिक अन्वेषण की आधुनिक विधियों ने इतिहास के सामान्य ज्ञान की अपेक्षा विशिष्ट ज्ञान की उपादेयता को सिद्ध किया है। परिणामस्वरूप इतिहास का विभाजन न केवल प्राचीन मध्ययुगीन तथा आधुनिक काल में किया गया है बल्कि इसके अंतर्गत अनेक छोटी-छोटी शाखाओं पर शोध करके इतिहासकारों ने विशिष्ट ज्ञान प्राप्त किया है। इस प्रकार इतिहास का अध्ययन क्षेत्र निरंतर विकसित होता जा रहा हैं।