उत्तरी एवं दक्षिण अमेरिका में समाज कार्य तथा समाज कल्याण का विकास - Development of Social Work and Social Welfare in North and South America

उत्तरी एवं दक्षिण अमेरिका में समाज कार्य तथा समाज कल्याण का विकास - Development of Social Work and Social Welfare in North and South America

उत्तरी एवं दक्षिण अमेरिका में समाज कार्य तथा समाज कल्याण का विकास - Development of Social Work and Social Welfare in North and South America

उत्तरी अमेरिका में समाज-कार्य को संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में देखा जा सकता है। उत्ती अमेरिका में समाज कल्याण नीतियाँ तथा अभ्यास अनेक रूपों में समान ही नजर आते हैं। उत्तरी अमेरिका में समाज कार्य के क्षेत्र में किस प्रकार की वृद्धि हुई इसका वर्णन निम्नवत है संयुक्तराज्य अमेरिका प्रारंभ में संयुक्तराज्य अमेरिका में समाज कार्य का रूप एक औपचारिकतापूर्ण था। वास्तव में इसका रूप उस समय सामने आया जब निर्धनों के साथ काम कर रहे व्यक्तियों को शिकागो, इलिनॉयस के स्कूल ऑफ सोशल इकोनॉमिक्स' द्वारा प्रथम बार संबोधित किया गया। आज हम समाज कार्य द्वरा व्यक्ति को उसकी समस्या का सामना करना सिखाते हैं और उसको इस प्रकार से सशक्त बनाते है कि वह खुद अपनी समस्या का समाधान कर सके। 


संयुक्तराज्य अमेरिका में कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण कार्य समाज कार्य की दृष्टि से देखे जा सकते हैं 


• 1624 में वर्जीनिया कॉलोनी द्वारा अक्षम सैनिकों तथा नाविकों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए एक कानून का निर्माण किया गया।


• 1642 में एलिजाबेथ द्वारा निर्धन कानून पर सर्वप्रथम प्रकाश डाला गया


• 1650 में 'प्रोटेस्टेंट वर्क एथिक्स' का निर्माण किया गया जो कि स्वानुशासन, मितव्ययिता तथा कठोर श्रम एवं बेरोजगार और पराश्रित व्यक्तियों हेतु कार्य करता था।


•1692 में मैसाचुसेट्स गृह विहिन बच्चों के लिए एक इकरारनामा लागू किया किया गया, जिसमें ऐसे बच्चों को अन्य परिवारों के साथ रखा जाता था, जिससे ऐसे बच्चों का भरण-पोषण उचित ढंग से हो सके। 


• 1776 में एक घोषणा पत्र तैयार किया गया, जिसे संयुक्तराज्य स्वाधीनता घोषणा पत्र के नाम से जाना गया।


• 1813 में एक कनेक्टिकट बाल श्रम कानून पारित किया गया, जिसमें यह प्रावधान रखा गया कि ओ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और कारखानों इत्यादि में कार्य करते हैं ऐसे बच्चों हेतु संपूर्ण पढ़ाई की व्यवस्था की जाएगी।


• 1830 में 'द नेशनल नीग्रो सम्मेलन का समागम किया गया, जिसका उद्देश्य नागरिक अधिकार, स्वास्थ्य तथा महिलाओं के कल्याण हेतु विमर्श प्रारंभ करना था


• 1843 में द न्यूयॉर्क एसोशिएशन की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य गरीबों की दशा में सुधार करता था।


• 1848 में स्त्री अधिकार की स्थापना की गई, जिसमें स्त्रियों के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों का सम्मेलन का कार्य किया जाता था जो मतदान के अधिकार, शिक्षा एवं रोजगार पर आधारित था।


•1874 में प्रथम बार परामर्श देने तथा आवश्यकता ग्रस्त व्यक्तियों की सहायता हेतु आर्थिक अनुदान देने वाली प्रथम दान संगठन सोसायटी की स्थापना की गई। 


• 1895 में शिकागो स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की स्थापना की गई।


• इसका कार्य मुख्य रूप से गरीबों के साथ कार्यरत व्यक्तियों के लिए कार्यक्रम आयोजित करना था।


•1917 में मेरी रिचमण्ड द्वारा सोशल डाइग्नोसिस" पुस्तक का प्रकाशन किया गया जो कि सिम्मण्ड फ्रॉयड के कार्यों से प्रभावित थी, जिसके माध्यम से सेवार्थी की समस्या को समझकर उसका समाधान प्रस्तुत करना था।


• 1950 में दी सोशल सिक्योरिटी एक्ट 1935 संशोधन के पश्चात प्रस्तुत हुआ, जिसके माध्यम से पूर्णत: अक्षम व्यक्तियों, विशेषकर बच्चों और उन संबंधियों को जिनके साथ जरूरतमंद बच्चे रहे हैं, उनको सहायता प्रदान करना था। 


• 1960 एन. ए. एस. डब्लू. द्वारा प्रथम आचार संहिता अंगीकार की गई।


• 1965 में वृद्धों के कल्याण एवं चिकित्सकीय देखभाल हेतु ग्रेट सोसाइटी' कार्यक्रम को प्रारंभ किया गया।


इस प्रकार से उपर्युक्त कानूनों के निमार्ण के द्वारा संयक्तराज्य अमेरिका के समाज कार्य को समझा जा सकता है।

दक्षिण अमेरिकी में समाज कार्य तथा समाज कल्याण का अगर हम संक्षिप्त परीक्षण करें तो हम पाते हैं कि दक्षिण अमेरिकी में इसका प्रारंभिक यूरोपीय प्रभाव स्पेन और पुर्तगाल से व्युत्पन्न हुआ हैं न कि इंग्लैंड, फ्रांस या जर्मनी से स्पेन और पुर्तगाल इन दो राज्यों की सांस्कृतिक तथा राजनीतिक संरचनाएँ 16वीं शताब्दी में अपनी बुलंदियों पर थी इन शक्तियों ने विस्तृत रूप में लेटिन अमेरिका में अपने औपनिवेशिक दौर में अपनी सांस्कृतिक तथा सामाजिक संरचनाओं को प्रत्यारोपित किया। जब हम अमेरिका में इन शक्तियों का परीक्षण करते हैं तो पाते है कि ये शक्तियों वास्तव में सत्तावादी नौकरशाहियाँ थीं, जो समाज में सामाजिक प्रणाली को परिवर्तित नहीं करना चाहती थी। इसका कारण यह था कि ये शक्तियाँ अभिजात्य वर्ग जैसे भूस्वामी, उद्योगपति तथा सेनाधिकारी इत्यादि इनके लिए कार्य करते थे तथा ये प्रत्यक्ष रूप से उनके लाभों के लिए कार्य करती थी। अतः इन सामाजिक प्रणाली में व्यापक बदलाव न लाकर अपनी सांस्कृतिक और राजनैतिक संरचना को घोपना चाहते थे तथा यहाँ के लोगों के जीवन स्तर को बदलने के लिए ज्यादा इच्छुक नहीं थे। खास तौर से पुर्तगाली उपनिवेश का लक्ष्य दोहरा था स्पेन व पुर्तगाल के राजा पोप की नई दुनिया के क्षेत्रीय विभाजन को स्वीकार करते थे। 


पुर्तगाली उपनिवेश के दोहरे लक्ष्यइस प्रकार थे 


1. पुर्तगाली बस्तीका सूजन को अपने निर्यात से राजा के व्यवसाय में बढ़ोतरी करे। 


2. ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार


ब्राजील में उपनिवेशी काल के दौरान का पुर्तगाली समाज वंश परंपरा पर आधारित राजा के अधीन अपने अधिकारों का उपयोग करता था तथा ये कुलीन तंत्रात्मक नेतृत्व पूर्णतः कठोरतापूर्वक धार्मिक तंत्र पर आधारित था। सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाई समाज थी तथा ये मित्र संबंधों पर आधारित थी।


1888 में ब्राजील अपनी स्वतंत्रता तक इन्हीं सांस्कृतिक दासता के अधीन था। यहाँ के लोगों में अन्य अमेरिकियों की अपेक्षा दासता की भावना अधिक थी। इसका कारण यह था कि यहाँ सार्वजनिक शिक्षा की उपेक्षा की गई थी तथा इस उपेक्षा को भी न्याय संगत बनाने की कोशिश की जा रही थी जिसके परिणाम स्वरूप इनमें आर्थिक असमानता के साथ-साथ सामाजिक तथा राजनैतिक क्षेत्रों में अन्य अमेरिकियों की भाँति विकास नहीं हो सका, जबकि विविध मौलिक समूहों तथा अप्रवासियों वाले एक देश अर्जेंटाइना में ईश्वर, परिवार, गृह-भूमि तथा स्वतंत्रता पर आधारित एक ऐसी संस्कृति विकसित हुई जो चारों ओर से ब्राजील की अपेक्षा समृद्ध थी। ब्राजील में औपनिवेशिक युग का प्रभाव काफी लंबे समय तक बना रहा क्योंकि 17 वीं सदी में उत्तरी अमेरिका में स्थापित हो रहे लोकतंत्र की दक्षिणी अमेरिका में नकल नहीं की गई। एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों की भाँति लैटिन अमेरिका लंबे समय तक विकासशील देशों का भाग माना जाता रहा है। इस क्षेत्र के विकास के अवरोधक कारकों में संयुक्तराज्य पर इसकी निर्भरता, सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक गिरावट का एक समयावधि के बीच बने रहना साथ ही साथ सैनिक अधिनायक बाद का उदय था। एक परिणाम के रूप में यहाँ के एक वर्ग का मानना है कि जन निर्धनता एवं सामाजिक न्याय की उपलब्धि बिना विदेशी नियंत्रण की उदारता के प्राप्त नहीं की जा सकती। इन बातों के प्रभाव से सामाजिक कार्यकर्ता को यह स्वीकार करने में मदद मिली कि नेतृत्व प्रदान किए बिना परिवर्तन नहीं हो सकता। बेशक विकास सामाजिक समस्याओं में अर्थपूर्ण सुधार का अनिवार्य मार्ग से फलस्वरूप इसने समाजकार्य की एक पुनअवधारणात्मकता का नेतृत्व किया। शुरुआती रूप से संयुक्तराज्य शैक्षणिक तथा व्यावसायिक अभ्यासों का मॉडल, वैयक्तिक सेवाकार्य, सामूहिक सेवा कार्य तथा सामुदायिक संगठन पर जोर देने वाली अवधारणाओं से दूर हट गया और स्वदेशी सामाजिक वास्तविकताओं एवं बेहतर तुलनात्मक अवधारणा की ओर उन्मुख हुआ। 1953 क्यूबाई क्रांति तथा 1970 में चिली में एलेण्ड शासन के प्रारंभ से सामाजिक कार्यकर्ता वह निर्णय करने में असमर्थ थे कि सामाजिक परिवर्तन जिन्हें वे अपरिहार्य समझते थे को सुधार क्रांति के माध्यम से प्राप्त करना चाहिए।


1960 से लेकर 1970 के मध्य को समाज कार्य शिक्षा में पुर्नअवधारणात्मक काल के रूप में जाना गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपने देशों के विकास के लिए सामाजिक समस्यझो तथा निक्रियता को समाप्त करते हुए सामाजिक समानता की प्राप्ति में योगदान दिया। वहीं ऐतिहासिक भौतिक वादियों का मानना था कि, सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका निर्धन को दमन से मुक्ति तथा सामंतवाद से मुक्ति के लिए सहायता करना है। 1992 में दी लैटिन अमेरिका एसोसिएशन ऑफ स्कूल्स ऑफ सोशल वर्क के अध्यक्ष मारिया लोरेना मोलीना ने प्रस्ताव किया कि प्राध्यापक कक्षा के अंदर तथा बाहर दोनों स्थानों पर आर्थिक असमानता, राजनीतिक तथा सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं तथा समाज में विविधता से संबंधित भेदभाव किए बिना मानवीय वचनबद्धता भी दोहराते हुए विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त ज्ञान तथा मूल्य प्राप्त करने की अनुकूल स्थिति का सृजन करा साथ ही न्यपूर्ण समाजों के सृजन और संरक्षण तथा मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए के निरंतर प्रयासरत रहे।