इंग्लैंड में समाज कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Work in England
इंग्लैंड में समाज कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Work in England
प्रत्येक समाज विषमताओं का समाज है जहाँ प्रत्येक स्तर पर विभिन्नता नजर आती है। इसी समाज में निर्धन तथा निराश्रयी व्यक्ति रहते हैं और समाज का कोई-न-कोई सदस्य ऐसे व्यक्तियों की सहायता किसी न किसी रूप में करता आया है। प्रत्येक समाज अपने निर्धन, वृद्ध व मंदबुद्धि सदस्यों को सामाजिक व आर्थिक मदद प्रदान करता आया है। समाज कार्य मानवता का ऐसा रूप है जो निरंतर एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज कर रहा है और दिनों-दिन नए-नए आयामों की ओर अग्रसर है। अन्य देशों की भाँति यूरोप में भी समाज कार्य को धर्म व धार्मिक संस्थाओं द्वारा ही जोड़कर प्रारंभ किया गया है।
यूरोप/यूनाइटेड किंगडम (इंग्लैंड) में किस प्रकार से समाज कार्य का विकास हुआ इसे निम्नवत बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।
इंग्लैंड में समाज कार्य के इतिहास को मुख्यतः निम्नलिखित भागों के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा रहा हैं.
1. दान का युगा
2. आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता का काल
3. सामुदायिक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल
4. श्रम कल्याण के आधार पर सहायता का काल
5. सुधारात्मक सेवाओं के आधार पर सहायता का का
6. बेवरिज रिपोर्ट
दान का युग
इंग्लैंड के लोग धार्मिक संस्थाओं में परस्प सहायता प्रदान करने की भावना रखते थे। ईसाई धर्म में निर्धन व्यक्तियों की सहायता करना, ईश्वर की कृपा समझा जाता है। चौदहवीं शताब्दी तक निर्धन व्यक्तियों को दान देना पुण्य का काम समझा जाता था। साथ ही धार्मिक संस्थाओं द्वारा सभी से चंदे की अपील की जाने लगी। जनता भी प्रोत्साहित होकर इसका निर्वाह करने लगी धार्मिक संस्थाओं, गिरिजाघरों, मठों तथा अनाथाश्रमों में अपंग एवं असहाय लोगों की सहायता की जाने लगी। निर्धन व्यक्ति धार्मिक प्रचारकों तथा धार्मिक गुरूओं द्वारा दान प्राप्त करने में संलग्न रहे। निर्धनों की सहायता का उत्तरदायित्व मुख्य पादरियों, स्थानीय पादरियों और पादरियों के नीचे के तीसरे स्तर नाम से संबोधित किए जाने वाले अधिकारियों द्वारा किया जाता था।
ईसाई धर्म को राजधर्म का स्तर प्राप्त होने के साथ-साथ मठों में निर्धनों के लिए संस्थाएँ स्थापित की गई, जो अनाथों, वृद्धों रोगियों और अपगों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करती तथा बेघरों को शरण देती थी। निर्धनों की सहायता के एक ऐतिहासिक उल्लेख के अनुसार 1839 में इंग्लैंड तथा वेल्स की 1,53,57,000 जनसंख्या में निर्धनों पर किया जाने वाला व्य 44,06,907 पाउंड था। 15 वीं शताब्दी में बहुत सी संस्थाएँ धनी व्यक्तियों और राज परिवारों के सदस्यों द्वारा दिए गए धन से बनाए गए कोष से चलाई जा रही थी। भोजन का दैनिक वितरण मठों के दरवाजों पर होता था और बेघर व्यक्तियों को मठों में शरण मिलती थी। परंतु निर्धनों की सामाजिक दशाओं को बदलने के लिए कुछ नहीं किया जाता था जिससे उनको पुनः आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता का काल
14 वीं शताब्दी तक आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना पुण्य का कार्य समझा जाता था। चर्च का प्रमुख उद्देश्य ही गरीबों को दान देना और उनकी सहायता करना था। चर्च के काफ़ी प्रयत्नों के
बावजूद भी गरीबों और बेसहारों की स्थिति में कोई संतोषजनक परिवर्तन नजर नहीं आया। चर्च द्वारा अनेकानेक प्रयत्न किए गए, किंतु कोई स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे जरूरतमंदों की सहायता कर उनका निश्चित विकास किया जा सके।
1349 में किंग एडवर्ड ने यह आदेश पारित किया कि प्रत्येक स्वस्थ शरीर वाला व्यक्ति कोई-न-कोई कार्य अवश्य करेगा, जिससे लोगों की बेरोजगारी को कम किया जा सके। एडवर्ड द्वारा किया गया यह प्रथम प्रयास था, जिसमें यह बात निकलकर सामने आई कि गरीबी के लिए व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार है तथा इसके लिए किसी दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार से इस नियम द्वारा सक्षम को काम करने के लिए बाध्य किया गया।
1561 में हैनरी नियमावली में भिक्षा माँगने वालों के लिए पंजीकरण आवश्यक कर दिया। इस कानून के अंतर्गत महापालिका अध्यक्ष तथा न्यायाधीशों के लिए यह आदेश जारी किया गया कि वे ऐसे आवश्यकता ग्रस्त व्यक्तियों (जैसे-बुद्ध, निर्धन, अनाथ इत्यादि) के प्रार्थना पत्रों की जाँच करें जो वास्तविक रूप से काम करने में अक्षम है। यह इस प्रकार का पहला अधिनियम था, जिसके द्वारा जरूरतमंदों के प्रति जिम्मेदारी का आभास हो सके।
1536 में गरीबों एवं जरूरतमंदों की सहायता के लिए एक सरकारी योजना का भी निर्माण किया गया। जिसमें यह नियम बनाया गया कि गरीबों का उनकी चैरिटियों में पंजीकरण अवश्य हो लेकिन वे वहाँ कम-से-कम 3 वर्षों से रह रहे हो। स्वस्थ शरीर वाले भिक्षा मांगने वाले व्यक्तियों को काम करने के लिए बाध्य किया गया तथा जो 5 से 14 वर्ष के आय के बीच में ऐसे बच्चे जो वेकार एवं आवारा घूमते थे उनको उनके माता-पिता के साथ प्रशिक्षण दिया जा सके, ऐसा प्रावधान किया गया 1572 में 'एलिजाबेथ क्वीन' ने गरीबों की सहायता के लिए एक सामान्य कर लगा दिया। साथ-साथ नया कानून पालन करने हेतु ओबरसियर नियुक्त किए गए। यह भी मान लिया गया कि सरकार ऐसे व्यक्तियों को आश्रय प्रदान करेगी जो स्वयं अपनी सहायता करने में असमर्थ है 11576 में सुधारगृह (House of corrections) बनाए गए जहाँ पर ऐसे व्यक्तियों को रखा गया जो काम करने के लिए सक्षम थे किंतु कार्य नहीं कर रहे थे। खास कर युवकों को ऐसे काम करने के लिए बाध्य किया गया। 1601 में धनहीनों के लिए एक कानून बना जो कि 43 ए एलिजावेथ के नाम से जाना जाता था। इस कानून में निर्धनों को 3 वर्गों में विभाजित कर दिया गया, जिसमें सर्वप्रथम पुष्ट शरीर वाले निर्धन शक्तिहीन निर्धन, आश्रित बच्चों को शामिल किया गया। पुष्ट शरीर वाले निर्धन (Abuc Bodied Pear) इसके अंतर्गत ऐसे निर्धनों को रखा गया जो कि हष्ट-पुष्ट हो एवं कार्य करने योग्य हों। इनसे सुधारगृहों में काम लिया जाता था। कोई भी व्यक्ति इन्हें भिक्षा नहीं दे सकता था। यदि कोई व्यक्ति कार्य के लिए मना कर देता उसे कारागृह में डाल दिया जाता था। शक्तिहीन निर्धन के अंतर्गत वे व्यक्ति आते थे जो रोगी, वृद्ध, अंधे, बहरे, गूंगे, लंगडे पागल हो और महिलाएं, जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे, इसके अंतर्गत आते थे। ये लोग काम करने में असमर्थ होते थे। ऐसे व्यक्तियों के लिए बाहर से सहायता का प्रबंध किया गया था, जिससे इनकी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे रोटी भोजन, वस्त्र, मकान आदि को पूरा किया जा सके आश्रित बच्चे ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता नहीं थे या फिर उनके माता-पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था या फिर इतने गरीब थे कि उनके माता-पिता उनकी सहायता नहीं कर सकते थे ऐसे बच्चे उन नागरिकों को दे दिए जाते थे जो उनका भरण-पोषण कर सके। इस प्रकार से वह कानून अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं सार्थक साबित हुआ। इसके अलावा लॉ ऑफ़ सेटेलमेंट 1662 का कानून बना 1795 में 1662 के कानून का पुनः संशोधन किया गया। ये कानून सामाजिक समूह कार्य के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 1832 में निर्धन कानूनों की प्रशासनिक तथा व्यावहारिक कार्यविधि संबंधी जाँच करने के लिए एक राजकीय आयोग बनाया गया। इस आयोग की प्रमुख सिफ़ारिश निम्नानुसार थी।
स्पिनहम लैण्ड तरीके के अंतर्गत दी जाने वाली आंशिक सहायता को कम किया जाए।
सहायता चाहने वाले सभी समर्थ प्रार्थियों को कार्यगृहों में रखा जाए।
• केवल रोगी, वृद्ध, अशक्त एवं नवजात शिशु ओसहित विधवाओं को ही बाहर सहायता
• विभिन्न पेरिसो में सहायता संबंधी प्रशासन का एक निर्धन कानून संघ के रूप में समन्वय हो। निर्धन सहायता प्राप्त करने वालों की स्थिति समुदाय में निम्न वेतन पाने वाले मजदूरों की तुलना में कम हो।
• नियंत्रण के लिए केंद्रीय परिषद की स्थापना की जाए। 14 अगस्त, 1834 में एक नया निर्धन कानून'द न्यू पूअर लॉ लाया गया, किंतु इससे भी कोई खास सफलता प्राप्त नहीं हुई। सन 1847 में निर्धन कानून कमीशन के स्थान पर निर्धन कानून बोर्ड गठित किया गया, जिसका कार्य निर्धनता के कारणों तथा सामाजिक सुधार के प्रभावशाली साधनों के लिए किए गए कारणों का निरीक्षण करना था। 1834 के नवीन गरीब कानून के प्रति एडविक चाइविक ने असंतोष प्रकट किया। इस कारण से आयोग के स्थान पर परिषद का गठन किया गया और एडविक चाइविक को इसका महा आयुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने निर्धनता के कारणों की खोज करने का प्रयत्न किया। सामाजिक सुधार के प्रभावशाली साधनों की खोज की। आवास गृहों की कमी के कारण कई लोग एक साथ पलंग पर सोते थे, जिससे बाल अपराध, लड़ाई-झगड़ा, अनैतिकता, छुआछूत की बीमारी बढ़ती थी। पीने के पानी के कारण भी लोग बीमार होते थे अतः इस कारण चाइविक ने अपना ध्यान स्वास्थ्य की ओर अधिक आकृष्ट किया। उन्होंने संक्रामक रोग से बचने के लिए एक कार्यक्रम बनाया जिसमें निःशुल्क टीके लगाए जाने लगे, पाक तथा बगीचों को बनाने में रुचि दिखाई। अतः उनके प्रयास के परिणामस्वरूप सन 1898 ई. में जन स्वास्थ्य एक्ट की स्थापना हुई। चाइविक इसके सदस्य बने। अतः समूह कार्य के इतिहास में चाइविक का नाम भी लिया जाता है। औद्योगिक क्रांति के आने से समाज के अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ। किंतु इसके साथ साथ अनेक समस्याओं का भीजन्म हुआ। इस प्रकार की समस्याओं से निपटने के लिए क्रिश्चियन सोसायटी तथा श्रम संघ ने महत्वपूर्ण कार्य किए। 1844 में चार्टिस्टों ने पहला सहकारी भंडार खोला जिसके मालिक श्रमिक थे। इस प्रयास के उपरांत अन्य नगरों में भी इस प्रकार के प्रयास किए गए। चार्टिस्ट की शक्ति में कमी होने पर फ्रेडरिक हेल्सन मारिस, चार्ल्स क्रिम्सके तथा जे एम. लुडलो के निर्देशन में मजदूरों की शैक्षणिक आध्यात्मिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधार करने का प्रयास किया गया। श्रमिकों के लिए रात्रि पाठशालाएँ खोली गई। कैनन सेमुअल अगस्टस वाटनेट 1937 ई. में लंदन के हाइट चौपल स्थित सेंट जूड गिरजाघर में उस क्षेत्र में रहने लगे जिसमें निर्धन रहते थे। वे उनके पादरी बने। बाटनेट ने पाया कि हाइट-चौपल के 8000 निवासियों में अधिकांशतः दिनदुखी असहाय, अपाहिज, बेकार थे। वे दुर्गंध युक्त जगहों में रहते थे। उनकीदशा अत्यंत ही दयनीय थी। वाटनेट आक्सफोर्ड तथा केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गए तथा उनको वहाँ के लोगों के दयनीय स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने विद्यार्थियों को इनके वैयक्तिक अध्ययन (Case Work) तथा शैक्षिक सहायता देने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रयास से विश्व का प्रथम व्यवस्था गृह बना। इस व्यवस्था गृह के तीन मुख्य उद्देश्य थे.
निर्धनों की शिक्षा और संस्कृति का विकास करना। सामाजिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता के संबंध में विद्यार्थी तथा व्यवस्था गृह के अन्य निवासियों को जानकारी देना। सामाजिक तथा स्वास्थ्य समस्याओं का निराकरण और सामाजिक विधि निर्माण में व्यापक हितों की सामान्य जागृति उत्पन्न करना। इन उद्देश्यों को बढ़ाने के अतिरिक्त, सांस्कृतिक प्रभाव भी डालना था। अतः भाषण तथा वाद-विवाद, गोष्ठियों आदि का आयोजन करना भी शामिल था।
• निर्धनों की दशा सुधारने हेतु सामाजिक सुधार करना अत्यंत आवश्यक होता है अतः इस संबंध में विद्यार्थियों तथा व्यवस्था गृह के अन्य निवासियों को जानकारी देना है।
समस्याओं के निराकरण और सामाजिक विधि निर्माण में व्यापक परिवर्तन हेतु सामाजिक तथा स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति लोगों में जागृतिउत्पन्न करना। समूह कार्य के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यदि हम ध्यान आकर्षित करें तो इसका विकास व्यवसाय के रूप में 20 वीं शताब्दी में ही प्रारंभ हुआ है। परंतु इसके सिद्धांतों तथा व्यावहारिक दक्षताओं का उपयोग बहुत पहले से होता चला आ रहा है। इसी विकास क्रम में चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन सोसायटी (Charity Organization Society) ने अपनी विशेष भूमिका अदा की।
जॉन एडम्स हिल तथा डिवाइन आदि ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने मानवीय आवश्यकताओं की ओर
लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन्होंने उन सामाजिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जो
सामाजिक वातावरण से उत्पन्न होती थी। किंतु जैसे जैसे सामाजिक समस्याएँ गंभीर होती गई सामाजिक
संगठनों ने भी सेवाओं में परिवर्तन करना प्रारंभ कर दिया। अब समूहों की सहायता व्यक्तिसंगठित होकर करने लगे, जिससे समस्याओं के हल खोजने में सहायता मिली। इस कार से इंग्लैंड में आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता उपयुक्त कानूनों एवं नियमों के माध्यम से समूह कार्य के रूप में की जाती थी। 3. सामुदायिक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल
सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत लगभग 500 से अधिक स्वास्थ्य अभ्यागतों की नियुक्ति की गई, जो रोगों को रोकने का प्रबंध करते थे। इसी तारतम्य में 1886 में बीमार तथा अपंग बच्चों के लिए अपंग बालकों का सहायता संघ (Invalid children And Association) बनाया गया। इसके कुछ ही दिनों के बाद विद्यालय बच्चे-देखभाल कमेटी (स्कूल चिल्ड्रन केअर कमेटी) तथा क्षय रोगियों के लिए डिस्पेंसरी खोली गई।
1895 में मिस स्टेवार्ट को रॉयल फ्री हॉस्पीटल में अल्मोनर के रूप में नियुक्त किया गया। इसी अल्मोनर के प्रयास से चिकित्सीय समाज कार्य का प्रारंभ हुआ। भोजन के क्षेत्र में भी एक नया प्रावधान 1906 में पास किया गया जिसे The Proposition of meal act के नाम से भी जाना जाता है, जिससे भोजन का प्रावधान अधिनियम भी कहा जाता है। इस अधिनियम के पास होने के पश्चात विद्यालय में निःशुल्क स्वल्पाहार की सुविधाएँ प्रदान की गई।
1844 ई. में यंग मैन क्रिश्चन एसोसिएसन (Young men's Christian association) की स्थापना जॉर्ज विलियम्स नामक बस विक्रेता ने समस्त युवक और युवतियों को इस उद्देश्य के साथ प्रेरित करने के लिए की कि वे ईसाई जीवन पद्धति पर चलने की प्ररेणा प्राप्त कर सके। सन 1860 में एक महिला द्वारा टैस
'अलो-क्लब' की स्थापना कनेक्टीकट में की गई, जिसे चर्च महिला समूह के नाम से जाना जाता है। इस क्लब के माध्यम से खेल-कूद, नृत्य, संगीत नाटक आदि अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का प्रबंध था। इसी के परिणाम स्वरूप अन्य क्लबों की भी स्थापना इस उद्देश्य के साथ की जाने लगी कि इसमें बच्चे भाग ले सकें और उनकी दशाओं में सुधार हो सकें।
1865 में ही कॉमन्स समाज की स्थापना सुविधाओं के लिए एवं पाकठैद्यानों की स्थापना के लिए की गई। इस कॉमन्स समाज का उद्देश्य ऐसे लोगों की मुख्य रूप से सहायता करना था जो मानसिक रूप से कमजोर हैं और जिनको रहने के लिए स्थानों का अभाव है।
1844 में पहला सहकारी भंडार चार्टिस्टो द्वारा रोजडेल में खोला गया जिसके मालिक श्रमिक थे। मानवतावादी रॉबर्ट ओवेन ने सहकारी उपभोक्ता भंडारों को प्रारंभ कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने ऐसे औद्यौगिक समुदाय की स्थापना की जहाँ पर कम कीमत पर स्वास्थ्य एवं आवास सुविधाएँ दी जाती थी जो स्वच्छता से भरपूर थी। मजदूरों तथा उनके परिवारों के लिए खेल के मैदान के साथसाथ पुस्तकालय एवं अन्य मनोरंजन की सुविधाएँ उपलब्ध 1889 में दातव्य सहायता संगठन एवं भिक्षावृत्ति दमन समिति का गठन हुआ। इसका नाम बदलकर दातव्य संगठन समिति कर दिया गया।
20 वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैंड में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई। मुख्य रूप से यह बेरोजगारी खानों में काम करने वाले मजदूरों में बढ़ने लगी थी इस बेरोज़गारी के कारण इन कोयला खानों के श्रमिकों व उसके परिवारों ने निर्धन सहायता मांगना आरंभ कर दिया। इस समस्या के समाधान के लिए 1905 में लाई जार्ज हेमिल्टन की अध्यक्षता में निर्धन कानून एवं दुःख निवारण शाही आयोग का गठन किया इस आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि पुअर लॉ यूनियन और संरक्षकों के मंडल के स्था पर कांउटी कौंसिल स्थापित की जाए, जिससे स्थानीय सहायता प्रशासन द्वारा कम की जा सके
1908 में वृद्धों के लिए वृद्धावस्था पेन्शन कानून पारित हुआ, जिसमें राष्ट्रीय पेन्शन तथा निःशुल्क उपचार की व्यवस्था की गई। 1909 में श्रम कल्याण अधिनियम पारित किया गया। भिक्षावृत्ति समाप्त करके उनके स्थान पर चिकित्सालय खोले गए और भेद वृद्धि या मानसिक भेदता की स्थिति वाले रोगी को ठीक किया गया 1925 में विधवा अनाथ एवं वृद्धावस्था अंशदायी पेशन अधिनियम पारित किया गया।
श्रम कल्याण के आधार पर सहायता का काल
इंग्लैंड में सन 1802 ई. में स्वास्थ्य एवं सदाचार कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत दिनभर में 2 घंटे काम करना निश्चित कर दिया गया जो प्रातः 6 बजे से लेकर 9 बजे रात तक कार्य कर सकते थे तथा बच्चों से रात में काम लेना बंद कर दिया गया। 1833 में डाक, कारखाना अधिनियम बना उस समय कारखानों में 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम कराना वर्जित कर दिया गया। 13 वर्ष के बच्चे दिन में सिर्फ 9 घंटे तथा पूरे सप्ताह के अंतर्गत 48 घंटे काम कर सकते थे। इस समय तक निरीक्षकों की नियुक्ति भी केन्द्रीय तथा राष्ट्रीय कार्यालय के अंतर्गत करना प्रारंभ कर दी। कारखाना अधिनियम में सुधार करते हुए 1847 में एक आदेश जारी किया गया कि औरतें तथा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रत्येक दिन में अधिक से अधिक काम 10 घंटे का काम कर सकते।
सुधारात्मक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल
जेल की दशाओं में सुधार करने के लिए श्रीमती एलिजाबेथ फ्राई नाम की महिला ने जेल के अंदर बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से एक विद्यालय की शुरुआत की और अध्यापक के रूप में जेल में बंद अपराधी औरतों में से एक का चुनाव किया गया। प्रौढ़ महिलाओं के लिए जेल में नई-कढ़ाई का काम भी उनके द्वारा शुरू किया गया। बाल अपराधियों के सुधार हेतु सन1912 में काल अधिनियम पास हुआ। 1950 में दूसरा काल अधिनियम पास किया गया तथा इस अधिनियम के तहत काल समितियाँ एवं काउन्टी काउंसिल बनाई गई जिसका उत्तरदायित्व काल का भी देखभाल करना था।
इंग्लैंड में 20वीं शताब्दी के पूर्व समूह कार्य का उद्देश्यसामाजिक चेतना तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना था। परंतु 1920 के पश्चात इसका उपयोग व्यक्ति के व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन तथा उसके विकास के लिए किया जाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड के शिक्षा मंत्रालय द्वारा युवा सेवाओं के रूप में समूह समाज कार्य को मान्यता प्राप्त हुई। युवाओं के प्रशिक्षण में समूह कार्य का ज्ञान कराया जाने लगा और इस संदर्भ में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे और इसके साथ ही 1960 तक जो समूह कार्य शिक्षा अपर्याप्त थी 1960 के बाद इसमें व्यापक परिवर्तन हुआ और अनेक विद्यालयों महाविद्यालयों/ विश्वविद्यालयों में समूह कार्य शिक्षा में तेजी से विस्तार हुआ। अत: इस प्रकार से इंग्लैंड में सामाजिक समूह कार्य के ऐतिहासिक विकास को मुख्य बिंदुओं द्वारा प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है एवं यह भी स्पष्ट किया गया है कि इंग्लैं में किस प्रकार से कानूनों का निर्माण हुआ और उन्हें किस प्रकार से प्रभावी बनाने के लिए समयानुसार उसमें परिवर्तन किया गया।
वेवरिज रिपोर्ट
1941 में इंग्लैंड ने समाज के क्षेत्र में चलने वाली समस्त कल्याणकारी योजनाओं में सुधार करना प्रारंभ कर दिया। इस आधार पर लार्ड विलियम बेवारज की अध्यक्षता में एक सामाजिक बीमा एवं इससे संबंधित विभाग का निर्माण किया गया जिसे Inter-department commission on social Insurance and Allied Service के नाम से जाना जाता है। इस आयोग ने सामाजिक सुरक्षा से संबंधित कार्यक्रमों की विस्तृत योजना को प्रस्तुत किया, जिसमें
सामाजिक बीमा
जन सहायताबच्चों के लिए आवश्यक भत्ते व्यापक निशुल्क स्वास्थ्य व पुर्नवास सेवाएँ एवं
पूर्ण रोजगार का अनुरक्षण
इस प्रकार इस आयोग द्वारा मुख्य पांच कार्यक्रमों के लिए योजनाओं का निर्माण किया गया जिसमें व्यापक स्तर पर कार्य किया गया। लेकिन साथ में यह आयोग द्वारा यह भी कहा कि सामाजिक सुरक्षा एवं आवश्यकताओं के साथसाथ चार और दानव है, जिसने समाज को जकड़ कर रख लिया है इन दानव से समाज को छुटकारा दिलवाना भी समाज कार्य का मुख्यलक्ष्य है। ये दानव हैं
रोग (Disease)
अज्ञानता ( Ignorance)
मलीनता (Squalor)
निष्क्रियता (Idleness)
इस प्रकार से इस रिपोर्ट द्वारा इन चार दानवों के खिलाफ भी योजना का निर्माण प्रारंभ कर दिया। बेवरिज रिपॉट के आधार पर ही 1944 में अपंग व्यक्ति कानून का निर्माण किया गया। इस कानून हेतु वाणिज्य तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों को निर्देश दिया गया कि वे अपगों को रोजगार मुहैया कराएं। 1944 में ही पेंशन तथा राष्ट्रीय बीमा मंत्रालय का गठन किया गया। 1945 में परिवार भत्ता कानून बनाया गया। 1946 में राष्ट्रीय बीमा कानून बनाया गया जिसके अधीन स्वास्थ्य अपंगता एवं वृद्धावस्थाबीमा इत्यादि योजाएं बनाई गई। इस प्रकार सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों में कई बार आवश्यकता पड़ने पर परिवर्तन किया गया। अतः इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर बनाया गया The Social Security Benefit Act 1975 इंग्लैंड की जनता के लिए व्यापक सामाजिक सुरक्षा के आयामों को प्रस्तुत करता है।
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