अंतरा अनुशासनिकता की शोध प्रक्रिया - Interdisciplinary research process
अंतरा अनुशासनिकता की शोध प्रक्रिया - Interdisciplinary research process
अंतरा अनुशासनिकता की शोध प्रक्रिया को साधारणतः निम्न चरणों में वर्गीकृत किया जाता हैं
1. शोध समस्या
सकता हैसामाजिक समस्याओं की प्रकृतिअथवा किसी सामाजिक घटना को समझना एवं उस समस्या जनित घटना को क्या क्यों, कैसे, कब आदि के रूप में तार्किक प्रश्न रख कर उसका अपने अनुसंधान के लिए शोध समस्या के रूप में चुनाव करना प्रथम चरण होता है। में
2. औचित्य का निर्धारण
शोध समस्या में शोध के प्रश्न को उल्लेखित करना और उसकी प्रकृति के आधार पर यह समझना कि शोध के प्रश्न अंतरा अनुशासन का निर्धारण कर रहे हैं अथवा नहीं। अर्थात किए जाने वाले शोध के प्रश्न अलग-अलग विषयानुशासनों की परिधि के तहत हैं अथवा उनके परिधि से बाहर परे हैं।
3. उपयोगी अनुशासनों की सूची
यदि शोध समस्या के प्रश्न का दृष्टिकोण अलग-अलग विषयानुशासनों को निर्धारित करता है, तो सबसे पहले उन विषयानुशासनों की सूची बना ली जाती है। इसके बाद उनके ज्ञान मीमांसा अर्थात अवधारणा सिद्धांत प्रविधि आदि का सहारा लेकर शोध कार्य आरंभ करना होता है
4. शोध साहित्य की तलाश
इसके बाद शोध को एक निश्चित दिशा प्रदान करने वाले शोध साहित्य की तलाश की जाती है, जिनमें पुस्तकों, लेखों व इंटरनेट आदि की सहायता ली जाती है। यदि शोध समस्या अंतरा अनुशासनिकता को निर्धारित करता है, तब अंतरा अनुशासनिक दृष्टिकोण से संबंधि साहित्यों की तलाश की जाती है।
5. उपयोगी अनुशासनों से प्राप्त अवधारणाओं
सिद्धांतों और विधियों का परिष्करण जब शोध समस्या का क्षेत्र अंतरा अनुशासन के परिप्रेक्ष्य से संबंधित होता है, तो ऐसे में उसके अध्ययन के लिए उपयोगी अनुशासनों के ज्ञान मीमांसा अथवा अवधारणाओं सिद्धांतों व प्रविधियों को लेकर समन्वय के द्वारा पदों का परिष्करण कर लिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि अंतरा अनुशासनिक शोध समस्या को समझने के लिए सभी अनुशासनों के ज्ञान क्षेत्र की सहायता से व्याख्या सरलता से की जा सकती है और साथ ही प्राप्त तथ्य भी अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय व तार्किक होते हैं।
6. समस्या से संबंधित प्रत्येक आनुशासनिक अंतर्दृष्टि की पहचान
किसी भी समस्या के संबंध में यह देखा जाता है कि समस्याकिन ज्ञानानुशासनों के अध्ययन क्षेत्र से संबंधित है। इस प्रकार से समस्या को बेहतर ढंग से समझने के अवसर अधिक होते हैं। समस्या के दृष्टिकोण के अनुरूप विषयानुशासनों की अंतर्दृष्टिकी पहचान करके समस्या के प्रति निवारण एवं व्याख्या की जाती है।
7. अंतर्दृष्टियों के बीच संघर्ष और उनके स्रोतों की पहचान
प्राप्त किए गए विषयानुशासनों के दृष्टिकोण और शोध समस्या के मध्य संघर्ष हो सकता है क्योंकि किसी घटना के प्रति सभी विषयानुशासनों के दृष्टिकोण एक समान नहीं होते हैं। अलग अलग दृष्टिकोण होने के कारण संघर्ष पैदा हो जाते हैं इस हालात में उनके संघर्ष को पैदा करने वाले दृष्टिकोणों के स्रोत क्या है? और कहाँ है? आदि प्रश्नों के उत्तरों की तलाश की जाती है।
8. समान धरातल की रचना
शोध समस्या के समाधान के लिए यह आवश्यक होता है कि विषयानुशासनों की अंतर्दृष्टियोंको एक समान धरातल पर लाया जाए, जिससे कि वे अपने विषय क्षेत्र में रहकर शोध समस्या की व्याख्या अथवा समस्या का निवारण कर सके और उनमें किसी प्रकार से अंतर्दृष्टियों को लेकर हस्तक्षेप या संघर्षना हो।
9. अंतर्दृष्टियों का एकीकरण
विभिन्न विषयानुशासनों की अंतर्दृष्टियों को उनके विषय क्षेत्र में रखकर व समान धरातल पर लाने के पश्चात उनकी अंतर्दृष्टियोंका एकीकरण किया जाता है। इससे घटना की व्याख्या करने में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न नहीं होती और किसी घटना की व्याख्या हर परिप्रेक्ष्य से कर अध्ययन के नए क्षेत्र का निर्माण भी किया जा सकता है।
10. अंतरा अनुशासनिक समझ का विकास एवं परीक्षण
अंतरा अनुशासन को समझने के लिए उसकी विशेषताओं अथवा लक्षणों को समझना पड़ेगा। जैसे कि अंतरा अनुशासन का प्रमुख कार्य ज्ञान का एकीकरण और दो अथवा दो से अधिक ज्ञान अनुशासनों को साथ लेकर विचार करने की पद्धति को विकसित करना है। यहाँ ज्ञान के एकीकरण का तात्पर्य किसी विशिष्ट समस्या की समझ अथवा बौद्धिक प्रश्न के लिए प्रासंगिक अनुशासनों की पहचान व उनके आनुशासनिक अंतर्दृष्टिका समिश्रण कर वास्तविकता में किसी घटना के परीक्षण से है।
शोध समस्या में शोध के प्रश्न को उल्लेखित करना और उसकी प्रकृति के आधार पर यह समझना कि शोध के प्रश्न अंतरा अनुशासन का निर्धारण कर रहे हैं अथवा नहीं। अर्थात किए जाने वाले शोध के प्रश्न अलग-अलग विषयानुशासनों की परिधि के तहत हैं अथवा उनके परिधि से बाहर परे हैं।
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