अनुशासन के मुख्य तत्व - key elements of discipline

अनुशासन के मुख्य तत्व - key elements of discipline

प्रत्येक अनुशासन का एक अध्ययन क्षेत्र होता है। जैसे कि हम देखते हैं समाजशास्त्र एक अनुशासन है तब उसका अपना अध्ययन का एक क्षेत्र भी है, जिसमें मानव तथा समाज का अध्ययन किया जाता है। इसके अंतर्गत सामाजिक संबंधों समूह समुदाय तथा सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन भी शामिल है अनुशासन की दूसरी विशेषता यह है कि इसे एक विभाग का दर्जा मिलना चाहिए तथा उसे अकादमिक क्षेत्र में मान्यता मिलनी चाहिए। जैसे कि हम जानते हैं भारत में समाज शास्त्र का उभार अंग्रेज़ों के आने के बाद हुआ इसके लिए यहाँ के विश्वविद्यालयों में समाज शास्त्र के विभाग खोले गए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाजशास्त्र को इसका दर्जा दिलाने का श्रेय इमाइल दु ख को जाता है।






अनुशासन की तीसरी विशेषता यह है कि इसके पास सिद्धांत और ज्ञान का ढाँचा (Body of


Knowledge) पर्याप्त होना चाहिए। समाजशास्त्र के ही उदाहरण से हम इसे भी समझेंगे समाजशास्त्र के


पास अपना एक ज्ञान का ढाँचा है, जिसमें लगातार परिवर्तन दिखाई देते हैं। साथ ही विभिन्न सिद्धांतों एवं दृष्टिकोण (मार्क्सिस्ट, सावयाविक, यांत्रिकीय) ने समाजशास्त्र के ज्ञान को और भी पुष्ट किया है। अनुशासन की चौथी विशेषता है समस्या के अध्ययन व जाँच के लिए एक सामान्य प्रणाली का होना। यह किसी भी अनुशासन की महत्वपूर्ण विशेषता है समाजशास्त्र के अंतर्गत अध्ययन के लिए उसकी एक खास प्रणाली है, जिसमें तथ्य जुटाने तथा तथ्यों का मूल्यांकन एवं विश्लेषण के लिए उपयोग में लाया जाता है। तथ्य संकलन के लिए विभिन्न तरीके जैसे साक्षात्कार अवलोकन आदि उपलब्ध है। साथ ही इसके विश्लेषण के लिए सांख्यिकीय सारणियाँ तथा एस. पी. एस. एस. उपलब्ध है।







अनुशासन की पाँचवी विशेषता यह है कि इसके लिए शोध, व्यवहार तथा ज्ञान में योगदानकर्ता के रूप में सम्मानजनक स्थिति में पहुंचे हुए लोगों की संख्या अनुशासन में तथा अनुशासन के बाहर भी होनी चाहिए। जैसे कि हम देखते हैं समाजशास्त्र के पितामह के रूप में काट को माना जाता है, जिन्होंने समाजशास्त्र की नींव रखी इसके बावजूद इमाइल दुर्खिम कार्ल मार्क्स विल्फ्रेड पेरेटो आदि विश्वस्तरीय विद्वानों के बावजूद भारतीय परिदृश्य में जीएस, घुर्ये, एम. एन. श्रीनिवासन, एच. सौ. दूबे आदि लोगों के शोधों, सिद्धांतों ने समाज शास्त्र को एक सम्ममजनक स्थिति में पहुंचाया है


इसके बावजूद एक अनुशासन के लिएशिक्षित समाज द्वारा सहयोग प्राप्त होना आवश्यक शर्त मानी जाती है। यह गौण विशेषता होने के बावजूद भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज के शिक्षित वर्ग ही अनुशासन को आगे बढ़ाने का कार्य करता है ऐसे वे ही इसकी उपेक्षा करेंगे, तो इसकी सामाजिक मान्यता पर प्रश्नचिन्ह लगेगा।






अनुशासन की दूसरी गौण विशेषता यह है किइसके अध्ययन में रुचि लेने वाले लोगों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए। जैसे कि हम भारतीय परिदृश्य में देखते हैं, संस्कृत भाषा को सीखने, पढ़ने तथा रुचि लेने वाले लोगों की संख्या लगातार कम होती जा रही है इसका असर यह है कि आम लोग इसको भूलने लगे







इसके साथ ही अंतिम विशेषता के रूप में अनुशासन की शुरुआत से लेकर आयु भी मायने रखती है जैसे कि दर्शनशास्त्र के बारे में हम देखते हैं यह सबसे पुरानी ज्ञानशाखा मानी जाती है। इस कारण इसे अत्यधिक महत्त्व प्राप्त है।