आधुनिक भारतीय इतिहास का स्रोत सामग्री का चयन - Selection of source material of modern Indian history

आधुनिक भारतीय इतिहास का स्रोत सामग्री का चयन - Selection of source material of modern Indian history

आधुनिक भारतीय इतिहास का स्रोत सामग्री का चयन - Selection of source material of modern Indian history

स्रोतों के संकलन की प्रक्रिया में एक परेशानी यह भी होती है कि आवश्यक स्रोतों के संकलन के साथ-साथ अनावश्यक स्रोत भी संकलित हो जाते हैं। स्रोतों के संकलन के उपरांत इतिहासकार को व विषय के अनुरूप स्रोतों के चयन की प्रक्रिया से गुजरना होता है। स्रोतों के संकलन की तुलना में आवश्यक स्रोतों के चयन की प्रक्रिया में सकार को अत्यधिक सावधानी, कौशल, ज्ञान एवं कूदर्शिता का प्रयोग करना पड़ता है। स्रोतों के संकलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण संकलित तथ्यों में से आवश्यक स्रोतों का चयन होता है। एक इतिहासकार का पुनीत कर्तव्य है कि वह अपने द्वारा संकलित स्रोतों के भंडार में से मात्र आवश्यक स्रोतों का चयन करें और अपनी व्याख्या के माध्यम से समसामयिक रुचि के अनुरूप चयनित स्रोतों की व्याख्या को समसामयिक रुचि के अनुरूप इतिहास लेखन को व्याख्या प्रधान बनाने के लिए स्रोतों का चयन अत्यधिक महत्वपूर्ण है।






जो इतिहासकार स्रोतों का चयन न कर संकलित सभी स्रोतों को अपने इतिहास में स्थान देते हैं, वे अपने वर्ण्य विषय के साथ न्याय नहीं कर पाते। आवश्यक स्रोतों के चयन के बिना लिखा गया इतिहास असंगत एवं बोझिल हो जाता है। यह भी समझ में नहीं आता कि आखिर इतिहासकार क्या सिद्ध करना चाहता है। इतिहासकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि असंगत विचार जन सामान्य को नहीं समझाए जा सकते, क्योंकि मानव मस्तिष्क की संरचना कुछ इस प्रकार से हुई है कि वह केवल तर्कसंगत विचारों को ही ग्रहण कर सकता है। अतः इतिहासकार को चाहिए कि वह असंगत तथ्यों का परित्याग करे एवं तर्कसंगत तथ्यों का चयन कर इतिहास लिखे जो कि पाठक के लिए बोधगम्य एवं ग्राह्य हो ।


आवश्यक स्रोतों के चयन के लिए इतिहासकार को चाहिए कि अपने लेखन से संबंधित उसके विचार स्पष्ट हो और वह किसी प्रश्न का उत्तर देने के ख्याल से आवश्यक ऐतिहासिक तथ्यों का चयन करे। प्रो. लैगलोई (Langlois) एवं साइनोबो ने इस तारतम्य में लिखा है, यदि इतिहास पर तथ्यों के ढेर में खो जाने की दुविधा व्याप्त हो तो अन्य विज्ञानों की तरह उसे प्रश्नोत्तर की प्रक्रिया से लिखना चाहिए" इतिहासकार अपने इतिहास को प्रश्नोत्तर परिकल्पनाओं द्वारा मुख्य धारा से भटकने से रोक सकता है। इस संबंध में प्रो गोटवाक ने भी लिखा है- "जब इतिहासकार तथ्यों को इकठ्ठा कर लेखन के चरण पर पहुँचता है, तो उस समय तक प्रश्नवाचक परिकल्पना या विषय वस्तु स्पष्ट हो जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो उसे लेखन स्थगित कर देना चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि वह किसी निष्कर्ष पर क्यों नहीं पहुंचा।"






स्रोतों के चयन में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इतिहासकार को अपने पूर्वग्रहों से ऊपर उठकर स्रोतों का चयन करना चाहिए। स्रोतों के चयन में अपनी रुचि के स्थान पर सत्यान्वेषण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपने मन के विपरीत सत्यान्वेषण हेतु स्रोतों का चयन कर इतिहासकार को वृहद दृष्टिकोण का परिचय देना चाहिए। स्रोत पवित्र होते हैं, इतिहासकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह अपनी व्याख्या द्वारा स्रोतों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत न करो निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि इतिहासकार को स्रोतों के चयन में पूर्ण निष्ठा वैज्ञानिक दृष्टि, कौशल एवं तर्कशक्ति का परिचय देना चाहिए।