आधुनिक भारतीय इतिहास का स्रोत सामग्री - Source material of modern Indian history
आधुनिक भारतीय इतिहास का स्रोत सामग्री - Source material of modern Indian history
इतिहासकार द्वारा इतिहास लेखन हेतु सर्वप्रथम स्रोतों की खोज की जाती है। स्रोतों के संकलन के उपरांत वर्ण्य विषय के अनुसार इतिहासकार आवश्यक स्रोतों का चयन करता है। चयनित स्रोतों के उपयोग के पूर्व इतिहासकार उनका मूल्यांकन करता है। मूल्यांकन द्वारा स्रोतों की प्रामाणिकता की जांच की जाती है। स्रोतों की खोज, संकलन, चयन एवं मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरकर उनके आधार पर लिखा गया इतिहास ही प्रामाणिक इतिहास होता है।
स्रोत सामग्री का संकलन
स्रोतों की खोज के उपरांत इतिहासकार उन स्रोतों से तथ्यों का संकलन करता है। तथ्य इतिहास लेखन का सर्वप्रमुख आधार है। अधिकांश विद्वानों ने तथ्य को इतिहास की रीढ़ माना है। तथ्य शाश्वत एवं पवित्र होता है, अतः यह परिवर्तन से परे होता है। स्रोत से प्राप्त तथ्यों से विभिन्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। सर जान क्लार्क महोदय ने इतिहास की तुलना गूदेदार फल से की है। उनके अनुसार तथ्य इस इतिहास रूपी फल की गुठली होता है, जिसमें फल का बीज निहित होता है। उन्होंने तथ्य से निकाले गए विभिन्न निष्कर्षों को फल का गूदा कहा था, जो जायकेदार तो हो सकता है मगर उसमें उत्पादन क्षमता नहीं होती। अतः उनका मानना था कि इतिहास के तथ्य तो स्थिर व निश्चित होते हैं मगर निष्कर्षों की स्थिति बालू की दीवार की तरह होती है, जो कभी भी रह सकती है। तथ्य एक ही होता है मगर विभिन्न इतिहासकार उससे अलग-अलग निष्कर्ष निकालते हैं। तथ्यः अपरिवर्तनीय रहता है। तथ्य किसी एक निष्कर्ष से बँधा हुआ न होकर स्वतंत्र है। इस संबंध में सीपी. स्काट ने लिखा है- “तथ्य पवित्र है, मतव्यों पर कोई बंधन नहीं इतिहास की वैज्ञानिक अवधारणा 19वीं शताब्दी की देन है। पाश्चात्य इतिहासकारों का एक समूह 'तथ्य संप्रदाय' अर्थात् तथ्यवादियों का था। इनका स्पष्ट मानना था कि इतिहास एक विज्ञान है, चूँकि विज्ञान का प्रमुख आधार प्रामाणिक स्रोतों से संकलित तथ्य होता है, अतः तथ्यवादी इतिहासकार इतिहास को तथ्यों का समूह मानने लगे। इसी कारण 1 9वीं शताब्दी को तथ्यों की शताब्दी माना गया। मि. ग्रेण्ड ग्राइड ने लिखा था, "मुझे तथ्य चाहिए और जीवन में हमें केवल तथ्यों की आवश्यकता है। उनका मानना था कि इतिहास में अधिकाधिक तथ्यों का समावेश होना चाहिए। 19वीं सदी के चौथे दशक में राँके (Ranke) महोदय ने तथ्यों के बचावत प्रस्तुतीकरण पर बल दिया।
इस तरह स्रोतों एवं उनमें अंतर्निहित तथ्यों के संकलन पर जोर दिया जाने लगा। विषय से संबंधित स्रोत किसी भी स्थान देश एवं भाषा में हो सकते हैं, अत: इनका संकलन एक श्रमसाध्य कार्य है। यह कार्य एक समर्पित इतिहासकार ही कर सकता है। स्रोतों के संकलन में एक माह एक वर्ष अथवा दस वर्ष भी लग सकते हैं। अतः इतिहासकार को स्रोतों के संकलन में धैर्य रूपी अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है। राहुल सांकृत्यायन का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने मध्य एशिया का इतिहास लिखने हेतु लगभग 20 वर्ष तक न केवल स्रोत सामग्री ही संकलित की अपितु विभिन्न भाषाएँ भी सीखीं। उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हुए हमें स्रोत सामग्री के चयन हेतु हर संभव प्रयास करना चाहिए
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