समाज कार्य का ध्येय और उद्देश्य - Aim and Objectives of Social Work

समाज कार्य का ध्येय और उद्देश्य - Aim and Objectives of Social Work

समाज कार्य का ध्येय और उद्देश्य - Aim and Objectives of Social Work

दी अमेरिकन काउंसिल ऑन सोशल वर्क एजुकेशन (सी. एस. डब्ल्यू. ई.) के शैक्षिक नीति तथा प्रस्थापन मानकों के प्रस्तावना में कहा गया है कि समाज कार्य व्यवहार मानवीय कल्याण को बढ़ाने, अवसरों, संसाधनों तथा लोगों की उनके वातावरण में क्षमता के सुदृढीकरण द्वारा तथा मानवधिकारों तथा जीवन की गुणवत्ता को सीमित करने वाली दशाओं में सुधार करने वाली नीतियों तथा सेवाओं के सृजन द्वारा प्रोत्साहित करता है। समाज कार्य व्यवसाय गरीबी, दमन तथा विभेदीकरण को समाप्त करने के लिए कार्य करती है। समाज कार्य व्यवसाय समस्त विश्व में सामाजिक तथा आर्थिक न्याय की प्राप्ति हेतु कार्य करती है। व्यक्ति एवं समूह के पर्यावरण के परिप्रेक्ष्यको तथा मानव-विविधता के प्रति आदर से निर्देशित होकर यह मानव कल्याण के लिए कार्य करती है।







समाज कार्य के उद्देश्यों को निम्न लिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है।


• मानवीय कल्याण को बढ़ावा देना, निर्धनता, सामाजिक अन्याय तथा दमन समाप्त करने की कोशिश करना।


• व्यक्तियों, परिवारों, समूहों संगठनों तथा समुदायों की सामाजिक क्रियाशीलता तथा अंत क्रियाओं को बढ़ाना।


• लक्ष्य प्राप्ति, संसाधनों के विकास तथा समस्या की रोकथाम व उन्मूलन करना। 


● ऐसी सामाजिक नीतियों सेवाओं तथा कार्यक्रमों का निर्माण व कार्यान्वयन करना, ताकि बुनियादी मानवी जरूरतों को पूरा तथा मानवी क्षमताओं के विकास को संबल प्रदान किया जा सके।


● पैरवी वकालत तथा सामाजिक और आर्थिक न्याय को प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक या राजनैतिक संक्रियाओं द्वारा नीतियों सेवाओं तथा संसाधनों का अनुवर्तन करना


• समाज कार्य व्यवहार को प्रोत्साहित करने वाले शोध ज्ञान तथा कौशल को विकसित करना।


• विभिन्न संस्कृतियों के संदर्भ में समाज कार्य व्यवहार को विकसित करना तथा प्रयुक्त करना। 






बहुत समय से समाजकार्य अपनी पेशागत समस्या तथा पहचान के मुद्दे को लेकर संघर्षरत है इसका कारण व्यक्तिगत या सामूहिक क्रियाशीलता तथा सामाजिक नीतियों के दोहरे से केंद्रण है। विशेषकर उत्तरी अमेरिका में व्यवहार के व्यापक क्षेत्र के अर्थ को समाज कार्य समेकित रूप में अपनी पहचान को और पैना करने में असमर्थ रहा है। समाजकार्य के प्रति समाज की दोहरी भावना के कारण ऐसे कारकों का योगिकीकरण हुआ है। चूंकि समाजकार्य का मूल जड़ मानवता में समाहित है तथा यहलोगों को पीड़ा या कष्ट में नहीं देखना चाहता साथ-ही-साथ समाज में कुछ ऐसे लोग भी है जो अपनी यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं तथा समाज में साधन विहिन लोगों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं प्रदान करते हैं। ऐसे साधन विहीन लोगों, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से निधित सेवाओं हेतु एक स्पष्ट जनादेश के अभाव का नेतृत्व किया है, को संसाधन और शक्ति प्रदान किए जाएँ समाज कार्य की अपनी अभिलाषाओं तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने में ये गत्यात्मकताएँ गंभीर रुकावटों के तौर पर रही हैं।






सामाजिक कार्यकर्ता के लिए समाजकार्य के क्षेत्र में काफ़ी विस्तार हुआ है, ज्ञान की गहराई के साथ-साथ बहुत सारे कौशल भी हैं, जिनका उपयोग वह अपने व्यावहारिक कार्य में कर सकता है। साथ ही समाजकार्य में विशेषीकरण भी बढ़ा है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि वैविध्य तथा विशेषीकरण के क्षेत्रों को वर्गीकृत करने की क्रमबद्ध तथा सुसंगत योजना नहीं होगी तो विशेषीकरण से व्यसाय की एकता को खतरा पैदा हो सकता है।







मिनाहन तथा पिंकस (1977) के अनुसार, समाजकार्य के संकेंद्रण को श्रेणीबद्ध करने के कुछ उदाहरण सुसंगत योजना के अभाव को दर्शाते हैं। समाजकार्य की प्रणालियों, जैसे-वैयक्तिक सेवा कार्य, सामूहिक सेवा कार्य, सामुदायिक संगठन समाज कल्याण प्रशासन, समाजकार्य अनुसंधान सामाजिक क्रिया,अभ्यास के क्षेत्रों, समस्या क्षेत्रों, जनसंख्या समूहों रीतिविधिक क्रियात्मकता, भौगोलिक क्षेत्रों, लक्ष्य का आकार परिणाम तथा विशिष्ट उपचार अभिव्यंजनाओं द्वारा विभाजित किए जा रहे हैं। विगत शताब्दी में औद्योगीकृत देशों में समाजकार्य कारण या क्रियाशीलता पर्यावरण सुधार या वैयक्तिक परिवर्तन तथा सामाजिक उपचार या सीधी सेवा पर अपने प्रचलन में अस्थिर रहा है। अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो पर्सन इन इनवायरमेंट (पर्यावरणगत व्यक्ति) के ढाँचे, जिसका समाज कार्य उपयोग करता है, पर विचार करें तो कभी-कभी व्यक्ति अधिक शक्तिशाली संकेंद्रण के रूप में दिखाई देता है तो कभी पर्यावरणा एक व्यवसाय के रूप समाजकार्य प्रत्यावर्तनीय है फिर भी अवधारणात्मक साँवा स्थिर बना रहा। विशेषीकरण के क्षेत्र के संदर्भ में समाविश होने की इसकी इच्छा के साथ द्विगुणित होने पर यह प्रवाह तथा एक संभ्रांतिक पहचान के रूप में पाणित हुआ है।





पॉपल (1995) का कहना है कि समाजकार्य अपने प्रमुखत्वकी पुष्टि के लिए अधिक अपवर्जक हो रहा है। यह सामाजिक कार्यकर्त्ता के शीर्षक को सीमित करता है और उन व्यक्तियों के लिए 'समाजकार्य' क्या कहा जाए, जिनके पास समाज औपचारिक समाजकार्य का प्रमाण-पत्र है, लेकिन ये निश्चित कार्य संपादन करते हैं तथा निश्चित भूमिका निभाते हैं।





भारत में समाजकार्य अपने विकास के एक बिंदु पर है, जहाँ सभी निश्चित मुद्दे विमर्शित हैं। मंडल (1989) लिखते हैं कि भारत में चिकित्सकीय कार्य तथा मनः चिकित्सकीय समाजकार्य का प्रारंभ स्वतंत्रता के बाद प्रारंभ हुआ। यह अन्य विशेषीकरण क्षेत्रों यथा परिवार तथा बाल कल्याण तथा अपराध शास्त्र एवं सुधारात्मक प्रशासन द्वारा अनुगमित हुआ देशों का आर्थिक विकास ज्ञान के प्रसार पर निर्भर करता है।





इस समय मंडल ने यह निष्कर्ष निकाला कि पश्चिमी समाजकार्य शिक्षण आज भी भारतीय समाज के लिए प्रासंगिक है। साथ ही ऐसे निरोधक तथा शीर्षक आधारित समाजकार्य अभ्यास पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो अधिकतम मानव कल्याण कर सके। शांति एजाज ने 1989 में 'इंटरनैशनल सोशल वर्क नामक शोध पत्रिका में भारत में वैयक्तिक सेवा कार्य की प्रकृति के बारे में लिखा, 'भारत में स्वदेशीकरण के अनुकरण के कारण वैयक्तिक सेवा कार्य की भूमिका अल्प ही रही, इसने लोगों का ध्यान कम ही आकर्षित किया। सामाजिक विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रबलन स्थानांतरित होता हुआ दिखाई देता है। भारत में विकासात्मक और आर्थिक समस्याओं के अतिरिक्तनगरीय समस्याएँ, पारिवारिक समस्याएँ, व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याएँ भी है, जिनसे पूरा भारत घिरा हुआ है।"








समाजकार्य और विशेष तौर पर वैयक्तिक सेवा कार्य ऐसी समस्याओं के निराकरण पर बल देता है। वैयक्तिक सेवा कार्य को सामाजिक उपचार के रूप में प्रभावकारी होने के लिए भारत में लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक तत्वों तथा विभेदों को अवश्य ही अंतर्निहित करना चाहिए। पश्चिमी समाजकार्य और भारत में समाजकार्य अगर इन दोनों की दिशा और प्रस्थिति के साथ अधिक नया बनने के लिए हमें दो लेखों, जो क्रमश: 2002 तथा 2003 में प्रकाशित है, को देखना पड़ेगा। पहला लेख दि फ्यूचर ऑफ सोशल वर्क प्रैक्टिस' जो एलिजाबेथ क्लॉर्क द्वारा लिखित है, वे उस समय यू. एस. में नेशनल एसोसिएशन ऑफ सोशल वर्कर्स की तत्कालीन अधिशासी निदेशक थीं। इस लेख में क्लर्क लिखती हैं कि प्रतिबिंब वेतन तथा प्रतिपूर्ति के मुद्दों के अतिरिक्त भविष्य में अमेरिकी समाजकार्य अभ्यास का सामना, एक सामयिक भूषिता में नई जरूरतों को पहचानने तथा प्रतिक्रियात्मकता से होगा। यह राजनीतिक तथा सामाजिक रूझान के ज्ञान की अपेक्षा करता है। क्लॉर्क उदाहरण देकर कहती हैं कि कंजर्वेटिव गवर्नमेन्ट तथा सीमित संसाधनों के समयों में राजनीतिक समाजकार्य तथा संक्रियावाद की अत्यधिक आवश्यकता होगी। क्लार्क यह पुर्वानुमान लगाती है कि कुछ जनसंख्या अन्यों से अधिक सामाजिक तथा आर्थिक रूप से जख्मी रहना जारी रखेंगे तथा उनकी आवश्यकताएं भविष्य में और घनीभूत होंगी। जर्जर संसाधन विहिन वृद्ध व्यक्ति ऐसे समूह के एक उदाहरण है। देखभाल की सुलभता में वृद्धि के साथसाथ विभेदों से द्विगुणित स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाना होगा। लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए सामाजिक अभिकरणों को स्थापित करने की जरूरत होगी तथा अधिक से अधिक सामुदायिक तथा निजी संसाधनों को वसूल करने का भी प्रयास करना होगा। एक व्यावसायिक सेवा सुपुर्दगी से हटकर इसमें समेकित सेवा की प्रकृति होगी जिसके अंतर्गत सामाजिक कार्यकर्त्ता सूचना और प्रविधि को पहुंचाने में अपनी भूमिका अदा करेंगे। क्लार्क का विश्वास है कि विधिक समाजकार्य तथा सामूहिक समाजकार्य के विशेषीकरण क्षेत्रों में वृद्धि होगी तथा यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समाजकार्य अभ्यास सामाजिक और आर्थिक विकास में समाजकार्य व्यवसाय की भूमिका के रूपांकन में सहायता करेंगे।






वहीं दूसरे लेख में मातृसेवा संघ .इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वर्क के संकाय सदस्य अजित कुमार ने सोशल वर्क इन इंडिया ए ब्राइट फ्यूचर नामक शीर्षक के माध्यम से लिखा है कि सामाजिक समस्याओं की देखभाल हेतु बाजार के विकास एवं औद्योगिक आधार विस्तार पर एक विश्वास रहा है। फिर भी इस प्रकार के विकास ने इतिहास की कुछ जटिलताओं के साथसाथ जाति, धर्म, भाषा इत्यादि जैसे भेद-भावों पर भी विजय प्राप्त की गई है। वे प्रतिवेदित करते हैं कि निरक्षरता निर्धनता, शिशुमृत्यु बेरोजगारी, कुपोषण, निराश्रयिता व्यापक स्तर पर समाज में विद्यमान हैं, साथ ही भ्रष्टाचार तथा औद्योगिक संरचना में अक्षमता ने जनसमूहों तथा बुनियादी संसाधनों को सुलभ जल तथा मार्ग की अनिर्मिति में योगदान दिया है। वे यह प्रश्नउठाने हैं कि क्या समाज कार्य के लक्ष्य समाज में विद्यमान अभाव व असमानता के रूप में प्रदर्शित किए जाएंगे और संसाधनों के संग्रहण तथा निवेश की प्राथमिकीकरण की राज्य की क्षमता उत्तरोत्तर क्षीण होगी। अजित कुमार यह निष्कर्ष निकालते हैं कि संभव है कि बाजार में आर्थिक वृद्धि का परिणाम निर्वासन होगा जिसे वे 'रद्ध वस्तु' या वे व्यक्ति जो औद्योगिकीकरण से लाभान्वित नहीं होते, सामाजिक कार्यकर्ताओं की देखभाल हेतु विकासके अन्य रूप में संदर्भित होते हैं। बहरहाल वे कहते हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता लोगों की समस्याओं जो संरचनात्मक शक्तियों के कारण उत्पन्न होती है के उन्मूलन में एक सीमित भूमिका निभा पाने में सक्षम होंगे।