प्राचीन काल में समाज कार्य का विकास - Development of social work in ancient times
प्राचीन काल में समाज कार्य का विकास - Development of social work in ancient times
प्राचीन काल में समाज कार्य आधुनिक समाज कार्य से एकदम भिन्न था। पूर्व में समाज कार्य व्यवस्थित नहीं था और इसे केवल व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्तिहत किया जाता था। समाज कार्य को अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा किया जाता था और ये संस्थाएं लोगों के जीवन पर अपना प्रभाव डालती थीं। प्रो. राजाराम शास्त्री ने वैदिक काल की सामुदायिक समाज की व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस व्यवस्था में समुदाय की आवश्यकताओं को पूरा करने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति का था। व्यक्ति की आवश्यकताओं को सामूहिक प्रयास से पूरा किया जाता था। इस काल में विशिष्ट सहायता की आवश्यकता रखने वाले व्यक्तियों का उत्तरदायित्व शासक धनी तथा साधारण समुदाय के सदस्यों द्वारा आपस में बाँट लिया जाता था। (शास्त्री, 1970)
प्राचीन काल में सहायता का कार्य धर्म के आधार पर था। मंदिरों और आश्रमों की स्थापना संत महात्मा के लिए निवास स्थान, मंदिरों में रहने वालों के लिए भोजन कपड़े आदि अन्य वस्तुओं के द्वारा समाज कार्य किया जाता था। जिनके पास स्वयं का घर नहीं था, उन्हें मंदिरों में रखने की व्यवस्था थी। जो वृद्ध एवं बीमार हो, उनकी सहायता करने का उत्तरदायित्व भार जाति और समुदाय परिषदों पर था। Garg/. मठों और मंदिरों के माध्यम से समूह सहायक की परंपरा का संचालन किया जाता था। संघ तथा गण शब्द ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में समूह कार्य को प्रतीत करते थे।
आगे चलकर संघ का नाम बौद्ध भिक्षुओं ने अपनाया जो अपने आपको सामूहिक रूप से भिक्षु संघक थे। पौराणिक कथाओं से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में दो प्रकार की संन्यासी बस्तियों थी प्रथम आवास और दूसरा आराम। ऐसीबस्तियों को गाँव के बाहर बनाया जाता था, जिसे भिक्षु स्वयं बनाते थे और उनकी मरम्मत स्वयं करते थे। इसे आवास कहा जाता था। जब कोई धनी व्यक्ति इन भिक्षुओं को दान में देता था तथा उसकी स्वयं देखभाल करता था उसे आराम' कहा जाता था। आराम की सभी संपत्ति सामूहिक होती थी। इसका उपयोग संघ में सभी सदस्य द्वारा किया जाता था। संघ को दी जाने वाली कोई भी संपत्ति किसी भी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से अधिकार में नहीं ली जा सकती थी। बोधिसत्व ने मगध में ही गाँव के तीस व्यक्तियों को एकत्र किया और गाँव की भलाई एवं उन्नति के लिए कार्य करने को प्रेरित किया, जिससे गाँव की सड़कों का निर्माण, बांधों का निर्माण तालाब आदि कार्यों को किया गया। मौर्य वंश के काल में जनता को ध्यान में रखते हुए उनकी भलाई के लिए अनेक सामूहिक कार्यों को किया गया। (मिश्र, 2008)| हड़प्पा संस्कृति से लेकर बौद्ध काल तक जनता की भलाई के लिए उपदेश दिए। जाते थे।
मौर्य काल में भी जनता की भलाई के लिए उपदेश दिए गए। अशोक ने भी कहा कि सहायता के लिए मेरी प्रजा किसी भी समय मुझसे आकर मिल सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी प्राचीन काल में गुरुजनों द्वारा शिक्षा देने की परंपरा कोदेखा जा सकता है। बौद्ध काल में शिल्प संघों का निर्माण कर आर्थिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान की गई। लोगों को आभास हो गया कि संयुक्त रूप से कार्य करके अधिक धन अर्जन किया जा सकता है। अतः प्राचीन काल में इन समस्त उपर्युक्त उदाहरणों के माध्यम से समाज कार्य को समझा जा सकता है। मध्य काल में इसके अंतर्गत अनेक परिवर्तन दिखेंगे।
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